Ganesh Chalisa: बुधवार के दिन पूजा में जरूर करें गणेश चालीसा का पाठ, सारे विघ्न दूर करेंगे विघ्नहर्ता

  • Authored by: टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल
  • Updated Jul 19, 2022, 01:08 PM IST

Ganesh Chalisa Path: बुधवार के दिन भगवान श्रीगणेश की पूजा के लिए खास माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से पूजा करने के साथ ही गणेश चालीसा का पाठ करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से विघ्नहर्ता गणेश प्रसन्न होते हैं और आपके सारे विघ्न हर लेते हैं।

Ganesh Chalisa: बुधवार के दिन पूजा में जरूर करें गणेश चालीसा का पाठ, सारे विघ्न दूर करेंगे विघ्नहर्ता

Ganesh Chalisa Path On Wednesday: भगवान श्रीगणेश को सभी देवी-देवताओं में प्रथम पूजनीय स्थान प्राप्त है। हिंदू धर्म में सभी देवी-देवताओं की पूजा के लिए वार समर्पित होते हैं। जैसे भगवान शंकर के लिए सोमवार का दिन, हनुमान जी की पूजा के लिए मंगलवार का दिन, सूर्य देव के लिए रविवार और शनिदेव के लिए शनिवार का दिन समर्पित होता है। इसी तरह भगवान श्रीगणेश की पूजा और व्रत के लिए बुधवार का दिन समर्पित होता है। इस दिन स्नान आदि करने के बाद भगवान गणेश की विधिवत पूजा करने से भगवान गणेश प्रसन्न होकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। बुधवार के दिन पूजा-पाठ और व्रत के साथ ही श्रीगणेश चालीसा का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है। गणेश चालीसा का पाठ करने से भगवान गणेश प्रसन्न होकर बुद्धि-विद्या का आशीर्वाद देते हैं और भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इसलिए गौरी पुत्र गणेशजी की पूजा में बुधवार के दिन गणेश चालीसा का पाठ जरूर करें।

गणेश चालीसा पाठ

जय गणपति सद्गुण सदन कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण जय जय गिरिजालाल॥

जय जय जय गणपति राजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥

जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

राजित मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट सिर नयन विशाला॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विधाता॥

ऋद्धि-सिद्धि तव चँवर डुलावे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगल कारी॥

एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा।

अतिथि जानि कै गौरी सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥

गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥

बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥

शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं। सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आए शनि राजा॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥

गिरजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥

कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥

नहिं विश्वास उमा कर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहऊ॥

पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक शिर उड़ि गयो आकाशा॥

गिरजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्ह्यों लखि सुत को नाशा॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाए। काटि चक्र सो गज सिर लाए॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ शंकर डारयो॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥

चले षडानन भरमि भुलाई। रची बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सकै न गाई॥

मैं मति हीन मलीन दुखारी। करहुं कौन बिधि विनय तुम्हारी॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। लख प्रयाग ककरा दुर्वासा॥

अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

दोहा

श्री गणेश यह चालीसा पाठ करें धर ध्यान।

नित नव मंगल गृह बसै लहे जगत सन्मान॥

सम्वत् अपन सहस्र दश ऋषि पंचमी दिनेश।

पूरण चालीसा भयो मंगल मूर्ति गणेश॥

(डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। टाइम्‍स नाउ नवभारत इसकी पुष्‍ट‍ि नहीं करता है।)

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