मुगल बादशाह औरंगजेब के अत्याचारों से टक्कर लेने की हिम्मत गुरु तेग बहादुर ने दिखायी, जिसके बदले इस निरंकुश शासक ने दिल्ली के चांदनी चौक चौराहे पर उनका सिर धड़ से अलग करवा दिया।
गुरु तेग बहादुर की शहादत के बाद भाई जैता उनके सिर को आनंदपुर ले गए, जहां उनका अंतिम संस्कार हुआ। आज आनंदपुर में गुरु तेग बहादुर की शहादत को नमन करता शीश गंज गुरुद्वारा है।
औरंगजेब के मुगल शासन के दौरान शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली) के बाहर रकाब गंज नाम का एक गांव था, जो आज की दिल्ली में इंडिया गेट के पास पड़ता।
रकाब गंज गुरुद्वारे का अपने विशेष महत्व है। क्योंकि यहीं पर हिंद की चादर कहे जाने वाले गुरु तेग बहादुर के धड़ का अंतिम संस्कार हुआ था।
गुरु तेग बहादुर की शहादत के बाद भाई लखी शाह बंजारा उनके धड़ को लेकर किसी तरह रकाब गंज पहुंचे और उनके शव को अपने घर में रखकर घर को आग के हवाले कर दिया, इस तरह भाई लखी शाह बंजारा के घर में गुरु तेग बहादुर का अंतिम संस्कार हुआ।
भाई लखी शाह बंजारा ने अपने जिस घर में आग लगाकर गुरु तेग बहादुर के धड़ का अंतिम संस्कार किया था, वहीं पर आज रकाब गंज गुरुद्वारा खड़ा है, जो उस समय की दास्तां आज भी बयां करता है।
गुरु तेग बहादुर के बचपन का नाम त्याग मल था। करतारपुर की लड़ाई में मुगलों के खिलाफ अद्भुत साहस का परिचय देने के बाद गुरु हरगोविंद ने त्याग मल को तेग बहादुर नाम दिया था। औरंगजेब के सामने न झुककर और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्यागकर उन्होंने अपने बचपन के नाम त्यागमल को चरितार्थ किया।