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गालिब से गुलजार तक, नाम बदलकर क्यों लिखते हैं शायर, शायरों की दुनिया में क्यों खास है तखल्लुस

कई बार शायरों को तखल्लुस उनके उस्तादों से भी मिलता। दरअसल पुराने दौर में शायर बनने के लिए किसी उस्ताद से इस्लाह लेना जरूरी माना जाता था। कई बार उस्ताद ही अपने शागिर्द को नया तखल्लुस देते थे।

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शायर अपने नाम से नहीं, तखल्लुस से क्यों अमर हुए? गालिब से दाग तक की दिलचस्प कहानी
Authored by: Suneet Singh
Updated Aug 6, 2026, 13:00 IST
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"हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले"

ये मशहूर शेर है गालिब का। क्या हो अगर मैं कहूं कि ये शेर लिखा है मिर्जा असदुल्लाह बेग खां ने? एक बार को आप चौंकेंगे जरूर। हैरान मत होइए, मिर्जा असदुल्लाह बेग खां ही गालिब हैं। 'गालिब' इनका तखल्लुस है। उर्दू अदब की दुनिया में तखल्लुस ऐसी परंपरा है, जो शायद किसी दूसरी साहित्यिक विधा में इतनी मजबूत नहीं दिखती। तभी तो मोहम्मद तकी, रघुपति सहाय, अब्दुल हई, असरार उल हक या सम्पूर्ण सिंह कालरा जैसे नामों से भले लोग अनजान हों, लेकिन इन्हें मीर, फिराक, साहिर, मजाज या गुलजार कहें तो हर कोई तुरंत पहचान लेगा।

उर्दू और फारसी शायरी की दुनिया में 'तखल्लुस' किसी भी शायर का दूसरा व्यक्तित्व माना जाता है। यह उसकी पहचान है। उसका हस्ताक्षर है। कई बार तो उसकी पूरी रचनात्मक दुनिया का प्रतीक भी। यही वजह है कि मिर्जा असदुल्लाह बेग को दुनिया भले भूल जाए, लेकिन गालिब को नहीं भूल सकती।

"कहां मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहां वाइज

पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले"

यहां सोचने वाली बात ये है कि ऐसा क्या था कि इन शायरों ने अपने नाम पर तखल्लुस को तरजीह दी? क्यों वो अपनी असली पहचान मिटा कर लिखा करते थे?

तखल्लुस क्या होता है?

तखल्लुस अरबी भाषा का शब्द है। इसका हिंदी तर्जुमा है अलग होना, निकल आना या किसी पहचान को अपना लेना। फारसी और उर्दू गजल की रवायत कुछ ऐसी है कि शायर अपनी गजल के आखिरी शेर, जिसे 'मक्ता' कहा जाता है, उसमें अपना तखल्लुस इस्तेमाल करता है। शायर उसी तखल्लुस के जरिये खुद से बात करता है, खुद को समझाता है या खुद की आलोचना करता है। इसे जौक उर्फ शेख इब्राहिम की एक मशहूर गजल से समझें। गजल का पहला शेर यानी मतला है-

"अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे,

मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे"

वहीं इस गजल का आखिरी शेर (मक्ता) है-

'जौक' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला

उन को मयखाने में ले आओ सवर जाएंगे

उर्दू के प्रसिद्ध आलोचक डॉ. गोपीचंद नारंग अपनी पुस्तक Urdu Ghazal and Indian Mind में लिखते हैं कि तखल्लुस शायर के व्यक्तित्व और उसकी कविता के बीच संवाद का माध्यम बन जाता है। मक़्ते में जब शायर अपना नाम लेता है, तब वह उस नज्म के बाहर खड़ा व्यक्ति नहीं रहता। खुद उसका हिस्सा भी बन जाता है। यही बात रघुपति सहाय उर्फ फिराक के इस शेर में नजर आती है-

'गालिब' ओ 'मीर' 'मुसहफी'

हम भी 'फिराक' कम नहीं

कैसे शुरू हुई तखल्लुस की परंपरा

तखल्लुस की शुरुआत भारत में नहीं हुई। इसकी जड़ें फारसी साहित्य से जुड़ी हैं। ईरान में 10वीं-11वीं शताब्दी से ही फनकार अपने लिए साहित्यिक नाम चुनने लगे थे। बाद में यही परंपरा मध्य एशिया से होती हुई भारत पहुंची। दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में जब फारसी दरबार की भाषा बनी, तब तखल्लुस की परंपरा भी यहां आई।

उर्दू साहित्य के इतिहासकार डॉ. मुहम्मद सादिक अपनी किताब A History of Urdu Literature में लिखते हैं कि 18वीं शताब्दी तक आते-आते तखल्लुस उर्दू गजल की लगभग अनिवार्य परंपरा बन चुका था। किसी शायर की गजल अगर मक्ते में उसके तखल्लुस के बिना खत्म होती, तो उसे अधूरा माना जाता था।

"हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,

दिल के खुश रखने को 'गालिब' ये खयाल अच्छा है"

मिर्जा गालिब

मिर्जा गालिब

दूसरे अमली वजहों से परवान चढ़ा तखल्लुस

18वीं-19वीं सदी में जब हिंदुस्तान में उर्दू अदब की दुनिया अपना चरम पर थी तब एक ही शहर में दर्जनों शायर होते थे और कई बार दो-तीन शायरों के नाम भी एक जैसे निकल आते थे। ऐसे में यह समझना मुश्किल हो जाता था कि कौन सा शेर किसका है। तखल्लुस इस मर्ज का आसान दवा साबित हुई।

मिर्जा असदुल्लाह बेग खां उर्फ गालिब इसका सबसे सटीक उदाहरण हैं। उन्होंने शुरुआत में 'असद' तखल्लुस अपनाया था, लेकिन उसी दौर में एक और शायर 'असद' नाम से लिख रहे थे। साहित्यकार राल्फ रसेल Ghalib: Life and Letters में लिखते हैं कि इसी वजह से उन्होंने बाद में अपना तखल्लुस बदलकर 'गालिब' कर लिया। फिर कोई दूसरा गालिब ना हुआ।

बहुत से नगमानिगार अपने लिए ऐसा तखल्लुस चुनते जो उनके या फिर उनकी शायरी के मिजाज से मेल खाए। जैसे उर्दू के महान शायर रघुपति सहाय ने अपने लिए चुना 'फिराक'। फिराक का मतलब होता है वियोग, जुदाई या बिछड़ना। फिराक की शायरी में भी प्रेम, विरह और अकेलेपन की कहानी बार बार सुनाई देती है। यहां उनका तखल्लुस ही उनकी लिखावट की पहचान बन गया।

'फिराक' अब उसे भी याद करके क्या करेंगे हम,

जिसे भुला दिया हमने, वही अफसाना निकला

इसी तरह गीतकार और शायर अब्दुल हई ने अपने लिए 'साहिर' तखल्लुस चुना। साहिर अरबी भाषा का शब्द है। इसका अर्थ होता है जादूगर। साहिर की दुनिया में घुसेंगे तो पता चल जाएगा कि उनके शब्दों का असर ऐसा था कि यह नाम उनके व्यक्तित्व पर पूरी तरह सटीक बैठता है।

"वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन

उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा"

शायरअसली नामतखल्लुस का अर्थ
गालिबमिर्ज़ा असदुल्लाह बेगविजयी
मीरमोहम्मद तकीसम्मानित व्यक्ति
फिराकरघुपति सहायजुदाई
साहिरअब्दुल हईजादूगर
जोशशब्बीर हसन खानउत्साह
मजरूहअसरार-उल-हसन खानघायल
फानीशौकत अली खाननश्वर
कैफीसैयद अख्तर हुसैन रिजवीखुशी

कई बार शायरों को तखल्लुस उनके उस्तादों से भी मिलता। दरअसल पुराने दौर में शायर बनने के लिए किसी उस्ताद से इस्लाह लेना जरूरी माना जाता था। कई बार उस्ताद ही अपने शागिर्द को नया तखल्लुस देते थे। उस्ताद से मिला तखल्लुस उर्दू अदब की दुनिया में प्रवेश का प्रतीक होता। मसलन नवाब मिर्जा खान के उस्ताद थे शेख मुहम्मद इब्राहीम 'जौक' थे। जौक ने ही नवाब मिर्जा खान को दाग तखल्लुस दिया। वही दाग जिसे आज दुनिया दाग देहलवी के नाम से जानती है।

हजारों काम मोहब्बत में हैं मजे के 'दाग',

जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं

गीतकार और शायर मजरूह सुल्तानपुरी जिगर मुरादाबादी को अपना उस्ताद मानते थे। उनकी ही सोहबत में उन्होंने अपनी शायरी को जवान किया। मजरूह सुल्तानपुरी का असली नाम असरार उल हसन खान। पहले उन्होंने अपने लिए नासे तखल्लुस चुना था, लेकिन जिगर मुरादाबादी ने देखा कि वह तो घायल आशिकों के दिल की बात बयां करते हैं। जिगर ने असरार उल हसन खान को तखल्लुस दिया 'मजरूह'। मजरूह मतलब होता है घायल।

"मजरूह हमारे बाद अब महफिल में अफसाने बयां होंगे

बहारें हम को ढूंढेंगी न जाने हम कहां होंगे"

प्रसिद्ध साहित्यकार शम्सुर्रहमान फ़ारूकी ने अपनी किताब शेर-ओ-शो अंगेज में लिखा है कि उर्दू गजल में मक्ता और मक्ते में तखल्लुस महज रवायत भर नहीं है। यह उसके गढ़ने वाले शायर का एहसास-ए-बयां भी है। कई बार पूरी गजल के असल मायने उसी आखिरी शेर में जाकर खुलता है, जहां तखल्लुस आता है।

तखल्लुस ने इन अजीम शायरों को सिर्फ एक नई पहचान नहीं दी, उनकी नज्मों को भी एक ऐसा चेहरा दिया, जिसे समय मिटा नहीं सका। शायद इसी वजह से उर्दू अदब की दुनिया में कहा जाता है कि शायर अपने नाम से पैदा होता है, लेकिन अपने तखल्लुस से अमर होता है। तभी तो दाग कह गए हैं कि-

"कोई नाम-ओ-निशां पूछे तो ऐ कासिद बता देना,

तखल्लुस 'दाग' है और आशिकों के दिल में रहते हैं.."

End of Article