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जब Osho ने महात्मा गांधी से छीन ली थी दान पेटी, बापू ने बक्से में डलवाए थे तीन रुपये

When Osho Met Gandhi: ओशो के मुताबिक जब वह 10 साल के थे तब वह बापू से दूसरी बार मिले थे। साल था 1941। उन दिनों देश पर अंग्रेजों का शासन था और देशभर में स्वतंत्रता संग्राम अपने उफान पर था। एक दिन वह गांधी जी को देखने रेलवे स्टेशन पहुंचे। उनकी जेब में तीन रुपये थे जो उन्हें उनकी दादी ने दिये थे। वही पैसे लेकर वह स्टेशन पहुंचे थे बापू से मिलने।

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महात्मा गांधी के बड़े आलोचक थे ओशो

Mahatma Gandhi - Osho Story: आज महात्मा गांधी की 78वीं पुण्य तिथि है। 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या कर दी गई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तक ने बापू की पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की है। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा का जो रास्ता दिखाया उसे दुनिया के कई देशों ने अपनाया। अमेरिका हो या फिर रूस, वहां भी गांधी के विचारों को मानने वालों की कमी नहीं है। सात समुंदर पार के कई देशों में सालों से बापू की आदमकद प्रतिमा उनके विचारों की लोकप्रियता और स्वीकार्यता की तस्दीक करती है।

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महात्मा गांधी

महात्मा गांधी की हत्या ने करोड़ों लोगों को आहत किया था। उनके निधन पर महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि आने वाली पीढ़ियों को यकीन ही नहीं होगा कि हाड़ मांस का ये व्यक्ति कभी पृथ्वी पर चला भी होगा। वैसे बहुत से ऐसे लोग भी थे जो महात्मा गांधी के विचारों से इत्तेफाक नहीं रखते थे। उनके आलोचकों में एक चर्चित नाम रजनीश ओशो का भी रहा है। हालांकि कहा ये भी जाता है कि जिस दिन गांधी जी की हत्या हुई, उस रात वह अकेले में काफी रोए थे। उनका कहना था कि वह एक ईमानदार व्यक्ति थे।

ओशो ने अपने तमाम लेख और प्रवचनों में बापू के बारे में बहुत कुछ कहा है। एक बार तो ओशो ने महात्मा गांधी से पैसों से भरी दान पेटी छीन ली थी। इस किस्से का जिक्र वसंत जोशी ने ओशो की जीवनी 'द ल्यूमनस रेबेल लाइफ स्टोरी ऑफ ए मैवरिक मिस्टिक' में भी किया है।

जब ओशो ने गांधी जी से 'छीन' ली थी दान पेटी

बकौल ओशो उनकी महात्मा गांधी से जीवन में दो बार मुलाकात हुई थी। यहां जिस किस्से की बात हो रही रहे है वह ओशो की बापू से दूसरी मुलाकात के दौरान घटी। ओशो के मुताबिक जब वह 10 साल के थे तब वह बापू से दूसरी बार मिले थे। साल था 1941। उन दिनों देश पर अंग्रेजों का शासन था और देशभर में स्वतंत्रता संग्राम अपने उफान पर था। एक दिन वह गांधी जी को देखने रेलवे स्टेशन पहुंचे। उनकी जेब में तीन रुपये थे जो उन्हें उनकी दादी ने दिये थे। वही पैसे लेकर वह स्टेशन पहुंचे थे।

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जब गांधी जी से मिलने स्टेशन पहुंचे ओशो (Photo: AI Image)

ओशो के गांव के पास उस लोकल स्टेशन पर आने वाली ट्रेन करीब 13 घंटे लेट थी। ओशो स्टेशन पर ही बैठे रहे। ट्रेन की देरी से परेशान होकर ज्यादातर लोग वापस जा चुके थे, लेकिन ओशो हिले नहीं। स्टेशन मास्टर की नजर ओशो पर पड़ी। स्टेशन मास्टर ने देखा कि यह बच्चा सुबह से ही स्टेशन पर बैठा हुआ है। उन्होंने पूछा तो ओशो ने कहा कि उसे बापू से मिलना है। स्टेशन मास्टर ने कहा कि अच्छा ठीक है बैठे रहो, थोड़ी देर में आएगी ट्रेन।

काफी देर बाद ट्रेन स्टेशन पर पहुंची। ट्रेन में गांधी जी अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी और सचिव के साथ थे। स्टेशन मास्टर ने ओशो से कहा कि आओ चलों तुम्हें गांधी जी से मिलवाता हूं। बकौल ओशो, जब वह गांधी जी के पास पहुंचे तो बापू की नजर उनके शर्ट की जेब पर पड़ी। गांधी जी ने पूछा- जेब में क्या है? ओशो ने कहा- 3 रुपये। बापू ने अपने पास रखी दान पेटी को आगे बढ़ाया और कहा कि अपने पैसे इसमें डाल दो।

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गांधी जी ने ओशो से दान करने को कहा (Photo: AI Image)

ओशो ने इनकार किया औऱ पूछा- अपने पैसे इसमें क्यों डालूं? गांधी जी ने समझाया कि यह दान पेटी है। तुम इसमें पैसे दान करोगे तो यह गरीबों के काम आएगी। ओशो ने जेब से पैसे निकाले और पेटी में डाल दिये। पैसे डालने के बाद ओशो जाने लगे। जाते हुए उन्होंने दान पेटी उठा ली और चलने लगे। बापू ने पूछा- ये पेटी कहां ले जा रहे हो। ओशो ने मासूमियत के साथ जवाब दिया- मेरे गांव में बहुत से गरीब हैं, मैं उन्हें ये बांट दूंगा। गांधी जी और कस्तूरबा गंधी ओशो की मासूमियत पर हंसने लगे।

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और दान पेटी लेकर चल दिये ओशो (Photo: AI Image)

कस्तूरबा गांधी ने मुस्कुराते हुए कहा कि ठीक ही है ले जाओ। वैसे भी मैं इसे पत्नी की तरह इनके बगल में देख-देखकर थक गई हूं। ओशो को पता नहीं क्या सूझी। उन्होंने गांधी जी को दान पेटी लौटा दी और कहा- रख लिजिए अपनी दान पेटी, मुझे सबसे बड़े गरीब तो आप ही लग रहे हैं। आपकी पत्नी भी आपसे प्रेम नहीं करतीं।

महात्मा गांधी के लिए क्या सोचते थे ओशो

ओशो ने अपने लेखों में लिखा है कि महात्मा गांधी के व्यक्तित्व में कई ऐसी बातें थीं, जिन्हें मैं प्रेम करता था और सराहता था, लेकिन उनके जीवन-दर्शन से मैं पूरी तरह असहमत था। उनके व्यक्तित्व के कई ऐसे पक्ष थे, जिनकी मैं प्रशंसा कर सकता था, लेकिन वे अकसर अनदेखे रह गए।

मुझे उनकी सत्यनिष्ठा से प्रेम था। उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला। चारों ओर झूठ का माहौल होने के बावजूद वे अपनी सच्चाई में अडिग रहे। मैं उनकी सच्चाई से सहमत न भी होऊं, फिर भी यह नहीं कह सकता कि वे सत्यवादी नहीं थे। जो कुछ उनके लिए सत्य था, वे पूरी तरह उसी से भरे हुए थे।

यह एक अलग बात है कि मुझे उनकी सच्चाई में कोई विशेष मूल्य नजर नहीं आता, लेकिन यह मेरी समस्या है, उनकी नहीं। उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला। मैं उनकी सत्यनिष्ठा का सम्मान करता हूं, भले ही मेरी नजर में वे सत्य के वास्तविक अर्थ से अनजान थे। उस सत्य से, जिसकी ओर मैं लगातार आपको छलांग लगाने के लिए प्रेरित करता रहा हूं।

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ओशो और बापू

ओशो बापू के बारे में कहते थे वे ऐसे इंसान नहीं थे, जो मेरी इस बात से सहमत होते कि बिना सोचे समझे कुछ भी कर लो। वे एक तरह से व्यापारी स्वभाव के व्यक्ति थे। वे दरवाजे से बाहर एक कदम रखने से पहले भी सौ बार सोचते थे, छलांग लगाने की तो बात ही क्या। वे ध्यान को समझ नहीं पाए, लेकिन इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी। वे कभी किसी ऐसे गुरु से नहीं मिले, जो उन्हें नौ माइंड यानी निर्विचार अवस्था के बारे में कुछ बता सकता।

Osho सधे शब्दों में करते थे बापू की आलोचना

ओशो बापू के आलोचक तो थे लेकिन कभी भी उन्होंने उनका अनादर नहीं किया। जब भी आलोचना कि तो शब्दों का चयन बहुत सोच समझकर किया। ओशो कहते थे कि महात्मा गांधी दुनिया के सबसे साफ सुथरे अज्ञानी व्यक्ति थे। मुझे उनकी यह साफगोई और शुचिता बहुत प्रिय थी। मुझे यह भी पसंद था कि वह सभी धर्मों का सम्मान करते थे। निस्संदेह, मेरे कारण और उनके कारण अलग थे, लेकिन कम से कम वह हर धर्म के प्रति आदरभाव रखते थे।

(Note: बता दें कि महात्मा गांधी पर ओशो के विचार ओशो के लेख और उनके प्रवचनों के फाइल वीडियो से लिये गए हैं। )

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