Solo Dining: कुछ साल पहले तक किसी रेस्टोरेंट में अकेले बैठकर खाने वाले कई लोगों को अजीब लगते थे। वेटर भी पूछ बैठता था - सर, कोई और आने वाला है? रेस्टोरेंट में अकेले शख्स को देख ऐसी धारणा बना ली जाती थी कि या तो उसका कोई दोस्त नहीं है, या उसका कोई ब्रेकअप हुआ है, या फिर वह किसी का इंतजार कर रहा है जो शायद आया नहीं। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। दुनिया के कई बड़े देशों की तरह भारत में भी सोलो डाइनिंग (Solo Dining) यानी अकेले बाहर जाकर खाना खाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। यह लाइफस्टाइल का हिस्सा बन रहा है।
ओपन टेबल जैसे रेस्टोरेंट बुकिंग प्लेटफॉर्म्स के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में 'सिंगल रिजर्वेशन' या 'टेबल फॉर वन' की मांग में 60 प्रतिशत से ज्यादा का उछाल आया है। डाइन अलोन का यह ट्रेंड खासकर शहरी युवाओं, प्रोफेशनल्स और सिंगल्स के बीच तेजी से पॉपुलर हो रहा है।
कैसे होते हैं सोलो डाइनर्स
रेस्टोरेंट बिजनेस का सबसे बड़ा नाम माने जाने वाले न्यूयॉर्क के डैनी मायर ने अपनी बुक 'सेटिंग द टेबल' में सोलो डाइनर्स के मनोविज्ञान को बहुत खूबसूरती से समझाया है। वो लिखते हैं कि रेस्टोरेंट में आने वाले ज्यादातर कस्टमर्स का कोई न कोई एजेंडा होता है। कोई अपने डेट को इम्प्रेस करने के लिए आता है तो कोई बिजनेस डील फाइनल करने। कोई सालगिरह का जश्न मना रहा होता है तो कोई फैमिली स्ट्रेस से छुटकारे के लिए आता है। इन सबके विपरीत सोलो डाइनर्स का अपना कोई सोशल एजेंडा नहीं होता। उसका एकमात्र एजेंडा होता है कि वह रेस्टोरेंट में मिलने वाले खाने का स्वाद ले सकते। वहां के माहौल और उस अनुभव को जी सके।
मजबूरी नहीं शौक है अकेले खाना (Photo: istock)
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि जब आप किसी के साथ बातचीत में मशगूल होते हैं, तो आपका ध्यान सामने वाले की बातों पर होता है, न कि थाली में परोसे गए भोजन की बारीकियों पर। जब आप अकेले भोजन करते हैं कि उसकी हर बारीकी पर नजर जाती है।
सोलो डाइनर्स हर एक निवाले में भोजन के टेक्सचर को महसूस करता है। रेस्टोरेंट के सर्विस फ्लो, बैकग्राउंड म्यूजिक और शेफ की कलाकारियों तक को करीब से देखते हैं। यहां तक कि वह अपने आस-पास के माहौल, जैसे दो टेबल दूर बैठे किसी कपल की पहली डेट की घबराहट या वेटर के व्यवहार को भी नोटिस करते रहते हैं। आसान शब्दों में कहें तो सोलो डाइनर रेस्टोरेंट में पूरी तरह से उपस्थित होता है। उसके लिए अकेले खाना किसी थेरेपी की तरह होता है।
क्यों बढ़ रहा है सोलो डाइनिंग का चलन?
सोलो डाइनिंग की बढ़ते ट्रेंड के पीछे सबसे बड़ा कारण है बदलती लाइफस्टाइल। आज पहले की तुलना में अधिक लोग अकेले रह रहे हैं, नौकरी के लिए दूसरे शहरों में जा रहे हैं और अपने लिए समय निकालना सीख रहे हैं। ऐसे में किसी दोस्त या परिवार के सदस्य के खाली होने का इंतजार करने के बजाय लोग खुद ही बाहर निकलकर खाना पसंद कर रहे हैं। सोलो डाइनिंग की पॉपुलैरिटी में बहुत से फैक्टर्स साथ दे रहे हैं:
सेल्फ केयर: आज की युवा पीढ़ी में जैसे सोलो ट्रैवल या अकेले फिल्में देखने का चलन बढ़ रहा है उसी तरह से अब वह सोलो डाइनिंग को भी सामान्य मानती है। ऐसे लोग अकेले भोजन करने को अपने साथ समय बिताने का तरीका मानते हैं। इसमें किसी की पसंद-नापसंद का इंतजार नहीं करना पड़ता और जो खाना चाहें, जब चाहें, खा सकते हैं।
सोलो डाइनिंग के है कई तरह के फायदे (Photo: iStock)
बदलती लाइफस्टाइल: मेट्रो शहरों में बड़ी संख्या में लोग नौकरी, पढ़ाई या करियर के कारण परिवार से दूर रहते हैं। जिस तरह से शहरी जीवन और नौकरियों का माहौल बदला है, उसमें हर किसी के लिए ये मुमकिन नहीं हो पाता कि वह काम से लौटकर घर पर खाना बना सके। ऐसे में रेस्टोरेंट में अकेले खाने की मजबूरी को झेलते हैं। धीरे-धीरे यही मजबूरी उनकी लाइफस्टाइल का हिस्सा बनती जा रही है।
एंजॉय करते हैं फ्रीडम: लगातार भागदौड़ के बीच कुछ लोग अकेले भोजन को माइंडफुलनेस का मौका मानते हैं। वे बिना फोन या किसी बातचीत के भोजन के स्वाद का मजा लेते हैं। इसके साथ ही क्या खाना है, कितनी देर बैठना है और कहां जाना है..ये सब फैसले खुद लेने का मजेदार अनुभव भी लोगों को सोलो डाइनर बना रहा है।
टेंशन फ्री डाइनिंग: कुछ लोगों के लिए अकेले शांत माहौल में खाना सामाजिक दबाव से राहत देता है। उन्हें किसी को प्रभावित करने या बातचीत बनाए रखने की चिंता नहीं रहती।
सोशल मीडिया का भी असर: इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे सोशल प्लेटफॉर्म्स का इस ट्रेंड को वायरल करने में बड़ा हाथ है। .हां लोग अपने एक्सपिरियंस शेयर करते हैं। उनके एक्सपिरियंस से दूसरे भी इन्फ्लुएंस होते हैं।
रेस्टोरेंट बिजनेस में क्रांति ला रहे सोलो डाइनर्स
पहले रेस्टोरेंट्स सोलो डाइनर्स को अपने लिए कम फायदे का सौदा मानते थे, क्योंकि वे चार लोगों की टेबल पर अकेले बैठते थे। लेकिन अब रेस्टोरेंट मालिकों को समझ आ गया है कि सोलो डाइनर काफी लॉयल कस्टमर होते हैं। अगर उन्हें एक बार अच्छा अनुभव मिल जाए, तो वे बार-बार लौटकर आते हैं और अच्छे रिव्यू भी देते हैं।
डाइन कल्चर की नई क्रांति है सोलो डाइनिंग (AI Image)
इसी कारण अब तो कई रेस्तरां और कैफे अकेले आने वाले ग्राहकों को ध्यान में रखकर अपने डिजाइन बदल रहे हैं। छोटे टेबल, बार सीटिंग, आरामदायक कोने और जल्दी सर्व होने वाले मेन्यू जैसे बदलाव किए जा रहे हैं। इससे सोलो डाइनर्स अधिक सहज महसूस करते हैं।
कई बार अकेले व्यक्ति के लिए पूरी डिश खत्म करना मुश्किल होता है, इसलिए अब मेन्यू में 'हाफ पोर्शन' या 'सोलो टेस्टिंग मेन्यू' शामिल किए जा रहे हैं ताकि वे एक ही बार में कई तरह के स्वादों का आनंद ले सकें।
कुछ जगहों पर तो कम्युनिटी टेबल्स भी बनाए जा रहे हैं, जहां चाहें तो लोग दूसरे सोलो डाइनर से बातचीत कर सकते हैं और वहां से नई दोस्ती को जन्म दे सकते हैं।
भारत जैसे देश में, जहां घर के बाहर खाना हमेशा से फैमिली या फेस्टिवल से जुड़ा रहा है, वहां सोलो डाइनिंग का बढ़ना एक बड़े सांस्कृतिक बदलाव की ओर इशारा करता है। यह बदलाव इस बात की तस्दीक करता है है कि हम अब खुद की सोहबत में सहज होना सीख रहे हैं। लोग अब यह स्वीकार करने लगे हैं कि खुश रहने के लिए हर समय किसी और का साथ जरूरी नहीं है। यही कारण है कि सोलो डाइनिंग मॉडर्न लाइफ का नया डाइनिंग कल्चर बन रहा है।
