Times Now Navbharat
live-tv
Premium

महेंदर मिसिर: जब आजादी के लिए नकली नोट छापने लगा भोजपुरी का सबसे बड़ा कलाकार, दोस्त बन जासूस ने दिया था धोखा

Mahender Misir: बिहार के सारण जिले में जन्मे महेंदर मिसिर की पैदाइश संपन्न परिवार में हुई थी। पिता शिवशंकर मिश्र जमींदार थे। परिवार ने उन्हें पहलवानी और घुड़सवारी सिखाई। ईश्वर ने उन्हें कलाकार बनाकर भेजा था।

Image
कहानी महेंदर मिसिर की
Authored by: Suneet Singh
Updated Jun 24, 2026, 17:10 IST
Follow on Google News

भोजपुरी गीत, संगीत और साहित्य का जब भी जिक्र होता है तो एक नाम बड़े अदब के साथ लिया जाता है। ये नाम है महेंदर मिसिर का। महेंदर मिसिर उस शख्सियत का नाम है जिसने भिखारी ठाकुर के रूप में भोजपुरी लोककला को उसका अपना शेक्सपियर दिया। आपको यकीन नहीं होगा लेकिन शायद ही भोजपुरी का कोई ऐसा गायक या कलाकार होगा, जिसने महेंदर मिसिर का लिखा ना जिया हो। पूरबी, निर्गुण, बिरहा, सोहर हो या फिर चैता और फगुआ, भोजपुरी लोककला की शायद ही कोई ऐसी विधा हो जिसमें महेंदर मिसिर को महारथ ना हासिल हो।

गाने सुनाने वाला पहलवान

6 मार्च 1886 को बिहार के सारण जिले में जन्मे महेंदर मिसिर की पैदाइश संपन्न परिवार में हुई थी। पिता शिवशंकर मिश्र जमींदार थे। परिवार ने उन्हें पहलवानी और घुड़सवारी सिखाई। ईश्वर ने उन्हें कलाकार बनाकर भेजा था। बचपन से ही गीत संगीत के लिए आकर्षण था। इसी आकर्षण ने महेंदर मिसिर को भोजपुरी साहित्य का जनक बना दिया। लोक कला की दुनिया में इनका क्या मुकाम है ये तो किसी से छिपा नहीं है, लेकिन अभी भी बहुत कम लोगों को पता होगा कि वह स्वतंत्रता सेनानी भी थे।

गांधी जी को देख बदला महेंदर मिसिर का मान

महेंद्र मिश्र पर पहला उपन्यास लिखने वाले रामनाथ पाण्डेय ने अपने उपन्यास 'महेंदर मिसिर' में लिखा है कि 1917 में गांधी जी ने चंपारन से जो स्वाधीनता की अलख जगाई उससे महेंदर मिसिर भी नहीं बचे थे। पहलवानी का कसा लम्बा-चौड़ा बदन और चमकता माथा, शरीर पर सिल्क का कुर्ता, गर्दन में सोने की चेन और मुंह में पान की गिलौरी भरे रहने वाले महेंदर मिसिर स्वतंत्रता सेनानियों की सोहबत में समय बिताने लगे। उनका घर आजादी के मतवालों का गुप्त ठिकाना बन गया था।

महेंदर मिसिर की जीवनी

महेंदर मिसिर की जीवनी

कलकत्ता में मिली नोट छापने की मशीन

सेनानियों के संपर्क में आने के बाद मिसिर कई दिनों तक कलकत्ता भी रहे। वहीं रहकर गीत संगीत का कार्यक्रम करने लगे। इसी क्रम में उनकी मुलाकात एक अंग्रेज से हुई। वो अंग्रेज मिसिर की कला का मुरीद हो चुका था। जब वह कलकत्ता से लंदन वापस लौटा तो मिसिर को बतौर नजराना नकली नोट छापने की मशीन दे गया। मशीन देने के साथ ही नोट छापना भी सिखा गया।

उस अंग्रेज से मिला वो तोहफा और नोट छापने की कला लेकर मिसिर अपने गांव लौट आए। यहां उन्होंने अपने भाइयों के साथ मिलकर नकली नोटों की छपाई शुरू कर दी और अपने छापे नकली नोटों से अंग्रेजी सत्ता की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़नी शुरू कर दी। बात धीरे-धीरे फैलने लगी, लेकिन किसी को यकीन नहीं हुआ कि ऐसा भी कोई कर सकता है। इस घटना का जिक्र करते हुए रामनाथ पाण्डेय ने 'महेंदर मिसिर' में लिखा है कि वो अपने सुख-स्वार्थ के लिए नहीं, ब्रिटिश हुकूमत की अर्थव्यवस्था को धराशायी करने और उसकी अर्थनीति का विरोध करने के उद्देश्य से नोट छापते थे।

जब अंग्रेजों को लगी भनक

अंग्रेजों तक जब अलग-अलग जगहों से ऐसी बातें पहुंचने लगी कि कोई नकली नोट छाप रहा है तो उन्होंने अपने खुफिया तंत्र को सक्रिय कर दिया। हर तरफ जासूस फैला दिये गए। सुंदर लाल घोष नाम का एक अंग्रेजी जासूस महेंदर मिसिर के पीछे हाथ धोकर पड़ गया। उसे नकली नोट छापने की जानकारी तो मिली मगर कोई सबूत नहीं मिल रहा था। सुंदरलाल घोष ने तय किया कि मिसिर को रंगे हाथों पकड़वाना होगा।

घोष गोपीचंद बनकर महेंदर मिसिर के घर में घुसा और करीब तीन साल तक उनका नौकर बनकर उनकी सेवा करता रहा। इन तीन सालों में गोपीचंद ने हर किसी का भरोसा जीत लिया। महेंदर मिसिर भी उसपर विश्वास करने लगे। इसी विश्वास में उन्होंने गोपीचंद से नकली नोट छापने वाली बात छिपाना जरूरी नहीं समझा। गोपीचंद ने इन तीन सालों में इतने सबूत जुटा लिये जो मिसिर की गिरफ्तारी के लिए पर्याप्त थे। हुआ भी ऐसा ही। 16 अप्रैल 1924 को गोपीचंद के इशारे पर अंग्रेज सिपाहियों ने महेंद्र मिश्र को उनके भाइयों के साथ नकली नोट छापते हुए रंगे हाथ पकड़ लिया। उन्हें 10 साल की सजा हुई।

नकली नोट छाप क्रांतिकारियों की करते थे मदद

नकली नोट छाप क्रांतिकारियों की करते थे मदद

गोपीचंद के धोखे से गिरफ्तार हुए मिसिर

महेंदर मिसिर को ताउम्र इस बात का मलाल रहा कि उन्होंने गोपीचंद पर भरोसा कर लिया। उनके मुताबिक किसी का विश्वास जीत कर उसे धोखा देने से बड़ा कोई जुर्म नहीं है। जिस गोपीचंद को वो अपना सगा समझने लगे थे उसी ने उनके साथ इतना बड़ा विश्वासघात कर डाला। इस अफसोस और गुस्से में मिसिर ने गोपीचंद के लिए एक गीत बनाया था-

"पाकल पाकल पानवा खिअवले गोपीचनवा

पिरितिया लगा के ना,

हंसी हंसी पानवा खिअवले गोपीचानवा

पिरितिया लगा के ना…

मोहे भेजले जेहलखानवा रे

पिरितिया लगा के ना"

गोपीचंद को भी तीन सालों में महेंदर मिसिर से जुड़ाव हो गया था। इस बात का इल्म उसे देर से हुआ। देर से ही सही उसने महेंदर मिसिर के इस गीत का जवाब उनके ही अंदाज में गा कर दिया:

"नोटवा जे छापि छपि गिनिया भजवला

ए महेन्दर मिसिर ब्रिटिस के कईला हलकान

ए महेन्दर मिसिर

सगरे जहानवा मे कईले बड़ा नाम

ए महेन्दर मिसिर पड़ल बा पुलिसिया से काम

ए महेन्दर मिसिर.."

जेल से रच दिया अमर उपन्यास

इस घटना के बाद काफी कुछ बदला। 10 सालों तक जेल में रहने के दौरान महंदर मिसिर ने अंग्रेजी फारसी, फ्रेंच जैसी कई भाषाएं सीखीं। जेल में रहते हुए उन्होंने कई गीत और कहानियां लिख डालीं। महेंद्र मिश्र जेलर के बीवी बच्चों को भजन एवं कविता सुनाते तथा सत्संग भी करने लगे। जेल की सलाखों के पीछे से ही महेंदर मिसिर ने भोजपुरी का पहला महाकाव्य और अपने काव्य का गौरव-ग्रन्थ "अपूर्व रामायण" रचा था।

जेल से लिखे कई अमर गीत

जेल से लिखे कई अमर गीत

लोगों ने छोड़ दिया था गोपीचंद नाम रखना

दूसरी तरफ गोपीचंद ने जिस तरह से जासूस बनकर महेंदर मिसिर को पकड़वाया था उसके बाद से तो सारन और आसपास के इलाकों में गोपीचंद नाम ही जासूस का पर्याय बन गया। लोगों ने अपने बच्चों के नाम गोपीचंद रखना छोड़ दिये। इसके अलावा एक और जो चीज बदली वो था गोपीचंद का मान।

गोपीचंद को समय के साथ लगने लगा कि जहां उसके अपनो लोग अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं वहीं कुछ पैसों के लिए वह उन्हीं का साथ दे रहा है। उसने भी अंग्रेजों की गुलामी तोड़ी और देश के करोड़ों लोगों के साथ आजादी की जंग का सिपाही बन गया।

जब बॉलीवुड में गूंजा महेंदर मिसिर का गीत

महेंदर मिसिर ने गोपीचंद के धोखे से आहत होकर जो गीत लिखा वो आज भी सुनाई देता है। कोई ना कोई भोजपुरी गायक उस गीत को गुनगुनाता जरूर दिख जाता है। बॉलीवुड भी इस गीत के मोह में फंसे बिना नहीं रह पाया। 1963 में आई फिल्म बेदसिया में मन्ना डे और महेंद्र कपूर की आवाज में यही गीत फिल्माया गया था। आप भी सुनिए वो गीत:

End of Article