Times Now Navbharat
live-tv
Premium

Pet Parenting का नया दौर, जहां बेजुबानों को मिलता है परिवार जैसा प्यार

Pet Parenting: आज के टाइम में पेट्स सिर्फ पालतू नहीं, बल्कि हमारे फेवरेट साथी और फैमिली का हिस्सा हैं। इंसानों और पेट्स का रिश्ता सिर्फ मालिक और जानवर का नहीं बल्कि प्यार, अपनापन और परिवार का है।

Image
बढ़ रहा है पेट्स पैरेंटिंग का ट्रेंड (फोटो: Hobbsgo/AI)
Authored by: prabhat sharma
Updated Aug 3, 2026, 09:47 IST
Follow on Google News

Pet Parenting: आजकल पेट्स पैरेंट शब्द खूब सुनने को मिल रहा है। इसमें होता ये है कि लोग खुद को अपने कुत्ते या बिल्ली का मालिक नहीं, बल्कि उनके मम्मी या पापा कहते हैं। सोशल मीडिया पर इस ट्रेंड से जुड़े तमाम वीडियो और पोस्ट आए दिन वायरल होते ही रहते हैं। लेकिन अगर आप सोच रहे हैं कि ये नए जमाने का ट्रेंड है, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। पालतू जानवरों को परिवार का हिस्सा मानने की सोच कोई नया फैशन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही परंपरा है।

करीब 2 हजार साल पहले रोम में एक छोटे मेलिटन मिनिएचर कुत्ते को दफनाया गया था। उसकी कब्र पर लिखा था-

'हेलेना के लिए, जो मेरी गोद ली हुई बेटी थी, एक ऐसी आत्मा जो अनोखी और सम्मान के योग्य थी।'

ध्यान देने वाली बात ये है कि यहां पालतू जानवर को 'गोद ली हुई बेटी' कहा गया। यानी उस परिवार ने उसे अपने बच्चे की तरह माना था। यह छोटा सा संदेश बताता है कि इंसानों और पेट्स का रिश्ता सिर्फ मालिक और जानवर का नहीं बल्कि प्यार, अपनापन और परिवार का रहा है।

150-200 ईस्वी की मेलिटन मिनिएचर कुत्ते की कब्र (फोटो: Instagram)

150-200 ईस्वी की मेलिटन मिनिएचर कुत्ते की कब्र (फोटो: Instagram)

क्यों बढ़ रहा है पेट्स पैरेंटिंग का ट्रेंड

आज के समय में लोगों के लिए डॉग या कैट सिर्फ पालतू जानवर नहीं, बल्कि घर के सबसे प्यारे मेंबर बन चुके हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि लोगों का अपने पेट्स के साथ भावनात्मक जुड़ाव पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गया है। भागदौड़ भरी जिंदगी में पेट्स तनाव कम करने, अकेलापन दूर करने और हर दिन खुश रहने की एक बड़ी वजह बन जाते हैं। सोशल मीडिया ने भी इस ट्रेंड को काफी बढ़ावा दिया है, जहां लोग अपने पेट्स की प्यारी तस्वीरें और वीडियो शेयर करना पसंद करते हैं। पेट्स पैरेंटिंग अपनाने से लोगों को भावनात्मक और मानसिक रूप से कई फायदे मिलते हैं, जिनमें शामिल हैं-

  • अकेलेपन को कम करना
  • तनाव से राहत मिलना
  • बच्चों को जिम्मेदारी सिखाना
  • घर में खुशियों का माहौल बनना
  • मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होना

इंडियाज फर्स्ट डायरेक्ट-टू-पेट न्यूट्रिशन कॉमर्स प्लेटफॉर्म HobbsGo के को-फाउंडर्स क्षितिज वर्मा और उर्वशी श्रीवास्तव ने पेट पैरेंटिंग से जुड़े तमाम सवालों के जवाब दिए हैं।

बढ़ रहा है Pet Parenting का ट्रेंड (फोटो: Hobbsgo)

बढ़ रहा है Pet Parenting का ट्रेंड (फोटो: Hobbsgo)

1- एक जिम्मेदार पेट पैरेंट बनने के लिए किन बातों का ध्यान रखना सबसे जरूरी है?

क्षितिज वर्मा ने बताया- जिम्मेदार पेट पैरेंटिंग का मतलब सिर्फ अपने पालतू को खाना और पानी देना नहीं है, बल्कि यह एक लंबे समय की जिम्मेदारी है। एक पेट आपके जीवन का हिस्सा बनता है और यह जिम्मेदारी अक्सर 10 से 15 साल तक चल सकती है। इसलिए पेट को घर लाने से पहले उसकी जरूरतों को समझना बहुत जरूरी है। सबसे पहले अपने पेट की बुनियादी जरूरतों को समझें। उसकी उम्र, नस्ल, वजन और एक्टिविटी लेवल के हिसाब से सही पोषण, रोजाना एक्सरसाइज और साफ-सुथरा माहौल देना जरूरी है। हर पेट की जरूरत अलग होती है, इसलिए उसके हिसाब से ही उसकी देखभाल करनी चाहिए।

दूसरा, एक तय रूटीन बनाना बहुत जरूरी है। खाने का समय, घूमने का समय और सोने की जगह अगर तय हो, तो पेट का व्यवहार और स्वास्थ्य दोनों बेहतर रहते हैं। तीसरा, नियमित रूप से पशु चिकित्सक (वेटरिनरी डॉक्टर) से जांच करवाना और टीकाकरण समय पर कराना कभी नहीं छोड़ना चाहिए। कई बीमारियों को शुरुआत में ही पहचान लिया जाए तो उनका इलाज आसान हो जाता है।

चौथा, अपने पेट को समझने की कोशिश करें। डॉग और कैट अपनी बॉडी लैंग्वेज के जरिए बहुत कुछ बताते हैं। उनके व्यवहार, आवाज और छोटी-छोटी गतिविधियों को समझना जरूरी है। सबसे जरूरी बात है बजट प्लानिंग। पेट के खाने, ग्रूमिंग, डॉक्टर की फीस, खिलौने, एक्सेसरीज और अचानक आने वाले मेडिकल खर्चों के लिए हर महीने एक तय रकम अलग रखनी चाहिए। और आखिर में, अपने पेट को सिर्फ एक जानवर या प्रोडक्ट की तरह नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह समझें। असली जिम्मेदार पेट पैरेंटिंग की शुरुआत यहीं से होती है।

2- क्या डॉग्स को इंसानों का खाना खिलाना सही है? उनकी पोषण जरूरतें कैसे अलग होती हैं?

उर्वशी श्रीवास्तव ने बताया - छोटा जवाब है ज्यादातर मामलों में नहीं। हमारे घर का खाना, जिसमें ज्यादा नमक, मसाले, तेल, प्याज, लहसुन या चीनी होती है, डॉग्स के पाचन तंत्र के लिए नहीं बना होता। कुछ चीजें जैसे चॉकलेट, अंगूर, प्याज, लहसुन, किशमिश और पकी हुई हड्डियां डॉग्स के लिए खतरनाक और जहरीली हो सकती हैं। डॉग्स की पोषण जरूरतें इंसानों से काफी अलग होती हैं। उन्हें अपने स्वास्थ्य और ऊर्जा के लिए संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों की जरूरत होती है।

डॉग्स के आहार में शामिल होना चाहिए:

  • अच्छी गुणवत्ता वाला प्रोटीन (जैसे चिकन, मछली और अंडा), जो मांसपेशियों और ऊर्जा के लिए जरूरी है।
  • सही मात्रा में फैट, जो त्वचा और बालों की सेहत के लिए फायदेमंद होता है
  • सीमित मात्रा में कार्बोहाइड्रेट।
  • जरूरी विटामिन और मिनरल्स, जैसे कैल्शियम और फॉस्फोरस का सही संतुलन।

एक 10 किलो वजन वाले एक्टिव डॉग को रोजाना लगभग 400 से 500 कैलोरी की जरूरत हो सकती है। हालांकि, यह उसकी नस्ल, उम्र और एक्टिविटी लेवल पर निर्भर करता है। हर पेट की जरूरत अलग होती है। इसलिए HobbsGo ऐप में पेट का प्रोफाइल बनाकर उसकी जरूरत के हिसाब से कैलोरी गाइडेंस दी जाती है। अगर कभी घर का कुछ खिलाना हो, तो बिना नमक और मसाले के उबला हुआ चिकन, उबला अंडा या सादा चावल कभी-कभी ट्रीट के तौर पर दिया जा सकता है। लेकिन रोजाना का खाना हमेशा संतुलित पेट फूड होना चाहिए। अगर आपके पेट को एलर्जी या कोई मेडिकल समस्या है, तो उसकी डाइट का फैसला हमेशा अपने वेटरिनरी डॉक्टर की सलाह से ही करें।

Pet Parenting का नया दौर (फोटो: Hobbsgo)

Pet Parenting का नया दौर (फोटो: Hobbsgo)

3. जो लोग पहली बार डॉग या कैट को घर लाने की सोच रहे हैं, उन्हें पेट पैरेंटिंग शुरू करने से पहले किन बातों की तैयारी करनी चाहिए?

उर्वशी श्रीवास्तव ने बताया - पेट को घर लाने से पहले खुद से कुछ सवाल जरूर पूछें और उनके जवाब ईमानदारी से दें।

1. क्या आपकी लाइफस्टाइल पेट के हिसाब से सही है?

अगर आप दिन में 10 घंटे घर से बाहर रहते हैं, तो आपके लिए हाई-एनर्जी डॉग ब्रीड सही विकल्प नहीं हो सकती। वहीं, कैट्स थोड़ी इंडिपेंडेंट होती हैं, लेकिन उन्हें भी प्यार और ध्यान की जरूरत होती है।

2. क्या आपका घर पेट के लिए तैयार है?

पेट लाने से पहले घर को पेट-फ्रेंडली बनाएं। खुले बिजली के तार, जहरीले पौधे और ऐसी छोटी चीजें जिन्हें पेट निगल सकता है, उन्हें हटा दें। पेट के लिए एक अलग जगह तय करें, जहां उसका बेड, खाने के बर्तन और आराम करने की जगह हो। कैट के लिए लिटर बॉक्स और स्क्रैचिंग पोस्ट की जरूरत होती है।

3. क्या आपका बजट तैयार है?

एक पेट की देखभाल में हर महीने लगभग 3 हजार से 8 हजार रुपये तक खर्च हो सकते हैं। इसमें खाना, ग्रूमिंग, ट्रीट्स, डॉक्टर की फीस और एक्सेसरीज शामिल हैं। इसके अलावा अचानक आने वाले मेडिकल खर्चों के लिए इमरजेंसी फंड भी होना चाहिए।

4. क्या परिवार के सभी लोग तैयार हैं?

घर में सभी लोगों की सहमति होना जरूरी है। पेट एक जिम्मेदारी है, इसलिए उसे सिर्फ किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं बनाना चाहिए।

5. पहले हफ्ते के लिए जरूरी चीजें तैयार रखें-

  • उम्र के हिसाब से सही खाना और खाने के बर्तन
  • बेड या क्रेट
  • कॉलर, लीश और आईडी टैग (डॉग्स के लिए)
  • लिटर बॉक्स और स्क्रैचिंग पोस्ट (कैट्स के लिए)
  • बेसिक खिलौने
  • आसपास के वेटरिनरी डॉक्टर का संपर्क नंबर

पेट को घर लाने के बाद शुरुआती 24 घंटे किसी का घर पर रहना बेहतर होता है। पेट खरीदने से पहले उसे गोद लेने (एडॉप्ट करने) के विकल्प पर भी जरूर विचार करें। भारत में कई डॉग्स और कैट्स अच्छे घर की तलाश में हैं। इंडी पेट्स हों या रेस्क्यू किए गए जानवर, उन्हें भी प्यार और परिवार की जरूरत होती है। पहला महीना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। रात में रोना, घर में एक्सीडेंट हो जाना या नए माहौल में एडजस्ट करने में समय लगना सामान्य है। धैर्य रखें और अपने पेट को समय दें।

4. डॉग और कैट की हेल्थ के लिए नियमित वेट विजिट, ट्रेनिंग और ग्रूमिंग कितनी जरूरी है?

क्षितिज वर्मा ने बताया- तीनों चीजें-वेट विजिट, ट्रेनिंग और ग्रूमिंग पेट की अच्छी सेहत के लिए बेहद जरूरी हैं। ये मिलकर आपके पेट की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सेहत को बेहतर बनाते हैं।

वेट विजिट

पपी और किटन को पहले साल में हर 3 से 4 हफ्ते में वेट के पास ले जाना पड़ सकता है। इस दौरान टीकाकरण, डिवॉर्मिंग और उनकी ग्रोथ की जांच की जाती है। वयस्क पेट्स के लिए साल में कम से कम एक बार पूरा हेल्थ चेकअप जरूरी है। वहीं, 7 साल से ज्यादा उम्र वाले सीनियर पेट्स की जांच हर 6 महीने में करानी चाहिए। नियमित वेट विजिट से बीमारियों को शुरुआत में ही पहचाना जा सकता है, जिससे इलाज आसान और कम खर्चीला हो जाता है। अगर पेट में एलर्जी, त्वचा की समस्या, पाचन संबंधी परेशानी या व्यवहार में बदलाव नजर आए, तो सोशल मीडिया या इंटरनेट पर निर्भर रहने की बजाय हमेशा वेटरिनरी डॉक्टर से सलाह लें।

ट्रेनिंग

ट्रेनिंग का मतलब सिर्फ सिट या शेक हैंड सिखाना नहीं है। यह आपके और आपके पेट के बीच बेहतर कम्युनिकेशन और भरोसा बनाने का तरीका है। बेसिक ओबीडिएंस ट्रेनिंग, सोशलाइजेशन, लीश ट्रेनिंग और कैट्स के लिए लिटर ट्रेनिंग जरूरी होती है। ट्रेनिंग से पेट मानसिक रूप से एक्टिव रहता है और व्यवहार से जुड़ी समस्याएं कम होती हैं। हमेशा पॉजिटिव रिइंफोर्समेंट का इस्तेमाल करें, जैसे ट्रीट देना या प्यार से तारीफ करना। पेट को मारना या डराना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे उसका भरोसा टूट सकता है और आक्रामक व्यवहार बढ़ सकता है।

ग्रूमिंग

ग्रूमिंग सिर्फ पेट को सुंदर दिखाने के लिए नहीं होती, बल्कि यह उसकी हेल्थ का हिस्सा है।

  • नियमित ब्रशिंग से बालों में गांठ, त्वचा संक्रमण और ज्यादा बाल झड़ने की समस्या कम होती है।
  • नहाने का समय नस्ल के हिसाब से तय करें। कुछ डॉग्स को 3 से 4 हफ्ते में और कुछ को महीने में एक बार नहलाना पर्याप्त होता है।
  • हर 3 से 4 हफ्ते में नाखून काटना जरूरी है, क्योंकि लंबे नाखून चलने में परेशानी पैदा कर सकते हैं।
  • कानों की सफाई, दांतों की देखभाल और आंखों की सफाई भी रूटीन का हिस्सा होनी चाहिए।

कैट्स खुद को साफ रखने के लिए ग्रूमिंग करती हैं, लेकिन लंबे बालों वाली कैट्स के लिए नियमित ब्रशिंग और कभी-कभी नहलाना जरूरी होता है। मानसून के मौसम में ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए, क्योंकि गीले बालों में फंगल इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। HobbsGo पर वॉश एंड गो, फुल ग्रूमिंग, मेडिकेटेड वॉश, डी-मैटिंग और डी-शेडिंग जैसी सेवाएं उपलब्ध हैं, जिनमें पिकअप और ड्रॉप की सुविधा भी दी जाती है। हालांकि, घर पर नियमित ब्रशिंग और नाखूनों की जांच करना भी उतना ही जरूरी है।

प्यार के साथ जिम्मेदारियों को निभाना भी जरूरी (फोटो: Hobbsgo)

प्यार के साथ जिम्मेदारियों को निभाना भी जरूरी (फोटो: Hobbsgo)

डॉग कैसे बने हमारे दोस्त

ये कहानी काफी दिलचस्प है। पहले इतिहासकारों का मानना था कि इंसानों ने जंगलों से भेड़ियों के बच्चों को पकड़कर उन्हें पाला और धीरे-धीरे उनकी नस्ल बदलकर कुत्ते बनाए। लेकिन इस सिद्धांत पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि भेड़ियों को पालतू बनाना आसान काम नहीं है। वे काफी चालाक होते हैं और कैद से निकलने के रास्ते ढूंढ लेते हैं। साथ ही, उन्हें इतना शांत और इंसानों के साथ रहने लायक बनाने में कई पीढ़ियां लग जातीं।

इतने लंबे समय तक जंगली जानवरों को इंसानी बस्तियों के आसपास रखना खतरे से खाली नहीं होता। ऐसे में अब वैज्ञानिकों के बीच एक दूसरी थ्योरी ज्यादा पॉपुलर हो रही है। इसके मुताबिक, भेड़ियों ने खुद इंसानों के करीब आना शुरू किया। दरअसल, जब इंसानी बस्तियों के आसपास खाने के अवशेष मिलने लगे तो कुछ ऐसे भेड़िये वहां आने लगे जो इंसानों से कम डरते थे। जो भेड़िये ज्यादा शांत और मिलनसार थे, उन्हें खाना मिलने की संभावना ज्यादा होती थी। फिर वही भेड़िये ज्यादा संख्या में बच्चे पैदा करने लगे। यानी कह सकते हैं कि कुत्तों की कहानी में सबसे दोस्ताना जीव की जीत हुई।

शांत स्वभाव के साथ बदला डॉग्स का चेहरा

जब इंसानों के करीब रहने वाले शांत भेड़ियों की नस्ल आगे बढ़ी तो उनमें सिर्फ व्यवहार ही नहीं बदला, बल्कि उनका शरीर भी बदलने लगा। उनके बच्चे ज्यादा क्यूट दिखने लगे। उनका चेहरा थोड़ा चौड़ा हो गया और शरीर भी छोटा होने लगा। इतना ही नहीं, वे बड़े होने के बाद भी बच्चों जैसी शरारती और खेल-कूद वाली आदतें बनाए रखते थे। वैज्ञानिक इसे डोमेस्टिकेशन सिंड्रोम (Domestication Syndrome) कहते हैं।

इसका मतलब है कि जब किसी जानवर में इंसानों से डर कम होने लगता है तो उसके शरीर और व्यवहार में भी कई बदलाव आने लगते हैं।

इंसानों को ये शांत और प्यारे दिखने वाले भेड़िये पसंद आने लगे। इसकी वजह सिर्फ ये नहीं थी कि वे शिकार, सुरक्षा और सामान ढोने जैसे कामों में मदद कर सकते थे, बल्कि उनका मासूम चेहरा हमारे दिमाग में एक खास प्रतिक्रिया पैदा करता था।

End of Article