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वो यात्री: दुनिया का सबसे बड़ा घुमक्कड़ इब्न बतूता जो रेगिस्तान, समंदर और पहाड़ पार कर आया हिंदुस्तान

Great travellers of the world (Ibn Battuta Travelogue): इब्न बतूता - बॉलीवुड गाने में इस नाम को सुना तो होगा ही। यहां पढ़ें इन शख्स की कहानी भी। कौन थे इब्न बतूता, कहां से भारत आए थे, कौन सी सदी में उन्होंने यात्रा की थी और कौन कौन से देश घूमे थे। वैसे अपनी इस 'वो यात्री' सीरीज में हम ऐसे ही कुछ चुनिंदा ट्रैवलर्स की कहानी लेकर आए हैं जिन्होंने अपनी यात्राओं से कभी देश ढूंढे तो कभी संस्कृतियों के सेतु बने। लेकिन अब इतिहास में उनकी कहानी कुछ किताबों में ही दबी है। अगर आप भी ट्रैवल के शौकीन हैं और ऐसी कहानियों से जुड़ना चाहते हैं तो हमारी वो यात्री सीरीज से जुड़ जाएं।

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दुनिया का सबसे बड़ा घुमक्कड़ इब्न बतूता
Authored by: prabhat sharmaExpert view: Dr. Lakshmikant Singh
Updated Feb 23, 2026, 15:49 IST

Great travellers of the world (Ibn Battuta Travelogue): मौजूदा समय में जब हम यात्रा की बात करते हैं तो जेहन में फ्लाइट, होटल और इंस्टाग्राम रील्स ही आती है। लेकिन, जरा सोचिए 1300 के दशक में कोई 20 साल का लड़का घर से निकले और लगभग पूरी दुनिया ही घूम आए। ये कहानी है इब्न बतूता की जिसने साल 1325 में, सिर्फ 20 साल की उम्र में कुछ ऐसा कारनामा किया जिसे हर किसी को जानना चाहिए।

अपने घर मोरक्को से निकलकर इब्न बतूता की यात्रा का असली मकसद हज करना मक्का की यात्रा (इस्लाम का एक अहम फर्ज) ही था। जो सफर सिर्फ एक धार्मिक यात्रा होना था, वो इतिहास का सबसे लंबा और रोमांचक ट्रैवल एडवेंचर बन गया। हज के बाद वो रुके नहीं बल्कि दुनिया को समझने निकले। एक देश से दूसरे देश, एक शहर से दूसरे शहर और उनका सफर थमने की जगह चलता ही गया।

इस दौरान करीब 29 साल तक उन्होंने लगभग 75,000 मील की दूरी तय की थी जो उस दौर में सोच से भी परे था। आज के हिसाब से अगर देखें तो उन्होंने लगभग 44 आधुनिक देशों जितना इलाका यात्रा के दौरान कवर किया होगा।

रिस्क, रोमांच और नई-नई जगहों का अनुभव तो उनके सफर में था लेकिन, उनका सफर इतना आसान नहीं था। रास्ते में डाकुओं ने हमला किया, एक बार जहाज डूबते-डूबते बचा, और एक तानाशाह शासक ने तो लगभग उनका सिर ही कटवा दिया था। गौर करने वाली बात ये है कि उनका ट्रैवल सिर्फ जगहें देखने तक सीमित नहीं रहा था। सफर के दौरान उन्होंने कई शादियां कीं, रिश्ते बनाए और बच्चे भी हुए। मतलब वो जहां जाते, वहां की लोकल लाइफ का हिस्सा भी बन जाते थे।

दुनिया का सबसे बड़ा घुमक्कड़ इब्न बतूता

दुनिया का सबसे बड़ा घुमक्कड़ इब्न बतूता

भारत में बिताया गया समय

इब्न बतूता ने अपनी यात्रा की बड़ी मंजिल भारत में भी तय की थी उस वक्त दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद इब्न तुगलक (1325-1351) थे। मक्का में उन्होंने दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक और मुस्लिम विद्वानों की उदारता के कई किस्से सुने थे। इस वजह से उन्होंने दिल्ली के दरबार में अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया था।

सीधे रास्ते की कमी के कारण, उन्हें काफी घूम-फिर कर भारत आना पड़ा था। रेगिस्तान, समंदर और पहाड़ पार कर अंतत: 12 सितंबर 1333 को हिंदू कुश पर्वत पार करके वे इंडस नदी के पास भारत पहुंचे (हालांकि यह तारीख थोड़ी संदिग्ध मानी जाती है)।

भारत में उनका स्वागत शानदार रहा और मुहम्मद तुगलक ने उन्हें दिल्ली का काजी नियुक्त किया। इब्न बतूता ने भारत में कई वर्ष बिताए जहां उन्होंने समाज की जटिलताओं, प्रशासन और विभिन्न धार्मिक परंपराओं के बीच संबंधों को समझा।

लेकिन, सुल्तान का स्वभाव कभी-कभी अत्यंत क्रूर भी था। इब्न बतूता ने कई खतरनाक अनुभव देखे जैसे मित्रों की मृत्यु, झूठे आरोप, और लगातार खतरे देखे जिसके बाद उन्होंने महसूस किया कि भारत में उसकी स्थिति खतरे से खाली नहीं है। 1342 में सुल्तान ने जब इब्न बतूता को चीनी शासक के पास अपना राजदूत बना कर भेजा तो उन्होंने दिल्ली छोड़ने में बिल्कुल भी देर नहीं की।

द ट्रैवल ऑफ इब्न बतूता के नाम से प्रकाशित किताब में मुहम्मद इब्न तुगलक का जिक्र करते हुए इब्न बतूता ने बताया कि वह वह बहुत सख्त और कई बार निर्दयी फैसले लेने वाला शासक था। वे बताते हैं कि कई लोगों से जुर्म कबूल करवाने के लिए उन्हें जमीन पर लिटाकर उनके सीने पर लाल-गर्म लोहे की प्लेट रखी जाती थी। जब वह हटाई जाती, तो चमड़ी उधड़ जाती थी। घावों पर पेशाब और राख डाल दी जाती, ताकि दर्द और बढ़े और आखिरकार लोग डर के मारे सब कुछ कबूल कर लेते।

इब्न बतूता का भारत में बिताया गया समय

इब्न बतूता का भारत में बिताया गया समय

किताब तुहफत उन-नजर फगरैब इल-एमसार में लिखे उनका यात्रा विवरण

उनकी जिंदगी के आखिरी दौर में एक विद्वान ने उनकी कहानी लिखी उस किताब का नाम 'तुहफत उन-नजर फगरैब इल-एमसार' है जिसे रिहला यानी सफर के नाम से भी जाना जाता है। इब्न बतूता का मूल यात्रा वृत्तांत आपको रिहला किताब में मिल जाएगा। जब आप रिहला पढ़ते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे 14वीं सदी का कोई ट्रैवल व्लॉगर आपको अपनी जर्नी सुना रहा हो।

मक्का और मदीना-हज यात्रा

यात्रा की शुरुआत के बारे में उन्होंने कहा था- मैंने तंगियर (मोरक्को) से निकलकर मक्का की ओर अपनी यात्रा प्रारंभ की, ताकि इस्लाम के पांचवें स्तम्भ का पालन कर सकूं। बस यहीं से उनकी लंबी यात्रा की शुरुआत हुई। हज के बाद उन्होंने पूरे अरब, फारस और मिस्र की यात्रा की थी।

मिस्र और अफ्रीका

मक्का से लौटते समय उन्होंने मिस्र में काहिरा और अलेक्जेंड्रिया इसके अलावा अफ्रीका के पश्चिमी हिस्सों जैसे माली साम्राज्य और टिंबकटू का भी दौरा किया था। इस दौरे के बारे में उन्होंने लिखा था- माली के शासकों और वहां के बाजारों को देख मैं बहुत प्रभावित हुआ। यह यात्रा मुझे अफ्रीका के भीतर व्यापार और संस्कृति की झलक देती है।

इब्न बतूता की यात्रा का यह हिस्सा हमें बताता है कि इब्न बतूता सिर्फ धर्म और पूजा के लिए नहीं, बल्कि सीखने, व्यापारिक गतिविधियों और स्थानीय जीवन का अनुभव करने के लिए भी यात्रा करते थे।

इब्न बतूता की यात्रा

इब्न बतूता की यात्रा

दक्षिण और पूर्वी एशिया

हिंद महासागर के रास्ते इब्न बतूता ने भारत, श्रीलंका, मलदीव, बर्मा और इंडोनेशिया जैसे देशों की यात्रा की। भारत में उन्होंने दिल्ली सल्तनत के दौर में मुहम्मद बिन तुगलक के दरबार का दौरा किया था। भारत यात्रा के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा था-

'गोवा में समुद्री व्यापारियों और हिंदू राजाओं के महलों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। यहां के लोग और संस्कृति मेरे लिए बिल्कुल नई थी।'

चीन और मंगोल साम्राज्य

दुनिया की राजनीतिक और सामाजिक संरचनाओं को जानने के लिए इब्न बतूता ने चीन और मंगोल क्षेत्रों की भी यात्रा की थी। इसके बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा था- चीन के शहर और उनकी प्रशासनिक व्यवस्था देखकर लगा कि दुनिया कितनी विविध और विस्तृत है।

वापसी और रिहला का लेखन

जब इब्न बतूता वापस मोरक्को लौटे थे तब वहां के सुल्तान ने उन्हें उनके सफर की पूरी कहानी एक विद्वान के माध्यम से लिखवाने का आदेश दिया था। इब्न बतूता ने कहा था- मैंने हर शहर, हर लोगों और उनके रीति-रिवाजों का विवरण इस कागज पर उतारा, ताकि आने वाली पीढ़ियों को दुनिया की विविधता और यात्राओं का अनुभव मिल सके।

रॉस ई. डन अपनी किताब 'द एडवेंचर ऑफ इब्न बतूता' में बताते हैं कि इब्न बतूता का सफर जिज्ञासा, साहस और सीखने की भूख से भरा हुआ था और यात्रा के दौरान उन्होंने हर शहर, गांव और समुदाय में स्थानीय जीवन को समझने की कोशिश की थी।

'इब्न बतूता की यात्रा केवल जगहों की खोज नहीं थी, बल्कि अलग-अलग संस्कृतियों, समाजों और जीवनशैलियों का अनुभव भी था। सफर में खतरे और कठिनाइयां भी थीं, लेकिन यही उन्हें एक असली साहसी यात्री बनाती थीं।'

इब्न बतूता का यात्रा विवरण

इब्न बतूता का यात्रा विवरण

DAV PG College, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर Dr. Lakshmikant Singh ने इब्न बतूता की यात्रा के बारे में बात करते हुए हुए बताया कि इब्न बतूता दुनिया देखने के जुनून में निकला था। मुहम्मद बिन तुगलक के दौर में वह भारत आया और यहां के शासन और व्यवस्था को करीब से समझा। खासकर उसे सल्तनत की ‘दीवान-ए-इंशा’ यानी डाक व्यवस्था में खास दिलचस्पी थी।' डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह के अनुसार, इब्न बतूता ने भारत में रहकर यहां की संस्कृति, बाजार व्यवस्था और प्रशासन को ध्यान से देखा। खिलजी के बाजार व्यवस्था पर भी इब्न बतूता ने बेहतरीन लिखा है। हालांकि जियाउद्दीन बरनी और अफीफ सिराज जैसे इतिहासकारों ने भी तारीख-ए-फिरोजशाही में बाजार व्यवस्था का शानदार जिक्र किया है, लेकिन इब्न बतूता की नजर खास तौर पर डाक और संचार व्यवस्था पर ज्यादा रही।

डॉ. लक्ष्मीकांत कहते हैं कि अगर मध्यकालीन इतिहासकारों की बात की जाए, वो सभी लेखक जिन्होंने सल्तनत काल या मुगलकाल का इतिहास लिखा है। उसमें इब्न बतूता का लेखन सबसे निष्पक्ष माना जाता है। इसका कारण है कि वह किसी शासक से प्रभावित नहीं था। वह भारत में रहा, यहां की संस्कृति देखी-समझी और जब वह मोरक्को वापस लौटा तो उसने इसे अपनी किताब रिहला में दर्ज किया।

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