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Eetha से चर्चा में लावणी: 300 साल पुराना है इतिहास, कभी युद्ध की थकान मिटाती थी इसकी ढोलकी, ऐसे बनी महाराष्ट्र की शान

श्रद्धा कपूर की फिल्म ईथा ने महाराष्ट्र की लोकनृत्य शैली लावणी को फिर चर्चा में ला दिया है। जो 300 साल पुराना इतिहास, संगीत और संस्कृति का अनमोल खजाना है। देखें लावणी क्या है, ये महाराष्ट्र की पहचान कैसे बनी।

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Eetha Shraddha Kapoor: History of Lavani
Authored by: Avni Bagrola
Updated Jun 26, 2026, 15:10 IST
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श्रद्धा कपूर की आगामी फिल्म 'ईथा' इन दिनों लगातार चर्चा में है। फिल्म की पहली झलक सामने आने के बाद से ही महाराष्ट्र की लोकसंस्कृति, खासकर लावणी को लेकर लोगों की दिलचस्पी एक बार फिर बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर कई लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर लावणी क्या है, इसकी शुरुआत कब हुई और यह महाराष्ट्र की पहचान कैसे बन गई। दरअसल, लावणी की कहानी केवल एक लोकनृत्य की कहानी नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और लोकजीवन कीऐसी विरासत है, जो करीब 300 वर्षों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित चली आ रही है।

महाराष्ट्र की संस्कृति का जिक्र हो और लावणी का नाम न आए, ऐसा शायद ही कभी होता है। लावणी सुनते ही कानों में ढोलकी की गूंजती थाप पड़ने लगती है, आंखों के सामने नौवारी साड़ी में सजी कलाकारों की मनमोहक छवि उभर आती है और वातावरण में लोकगीतों की मधुर लय घुल जाती है। यह केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत स्वर है।

आज लावणी दुनिया भर में महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन इसकी कहानी आधुनिक मंचों से बहुत पहले शुरू हुई थी। उस समय मनोरंजन के साधन सीमित थे। गांवों के मेले, धार्मिक आयोजन और सामाजिक उत्सव ही लोगों के मिलने-जुलने और मनोरंजन के प्रमुख अवसर होते थे। ऐसे माहौल में लावणी की प्रस्तुतियां लोगों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं होती थीं। ढोलकी की सधी हुई थाप, लोकगीतों की मिठास और कलाकारों के सजीव अभिनय ने इस कला को जन-जन के बीच लोकप्रिय बना दिया। समय के साथ मंच बदलते गए, लेकिन लावणी की आत्मा आज भी वैसी ही जीवंत बनी हुई है।

क्या है लावणी?

लावणी महाराष्ट्र की पारंपरिक लोकनृत्य और लोकसंगीत शैली है। माना जाता है कि 'लावणी' शब्द मराठी के 'लावण्य' से निकला है, जिसका अर्थ होता है सौंदर्य, आकर्षण और माधुर्य। यही कारण है कि इस कला में केवल नृत्य ही नहीं, बल्कि संगीत, कविता, अभिनय और भाव-भंगिमाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

लावणी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कलाकार केवल गीत पर नृत्य नहीं करते, बल्कि अपने हाव-भाव, आंखों की भाषा और अभिनय के माध्यम से पूरी कहानी दर्शकों तक पहुंचाते हैं। यही वजह है कि लावणी को केवल देखा नहीं जाता, बल्कि महसूस भी किया जाता है।

Lavani Kya Hai

Lavani Kya Hai

जब युद्ध के बाद सैनिकों की थकान मिटाती थी लावणी

लावणी का इतिहास जितना रंगीन है, उतना ही रोचक भी। बहुत कम लोग जानते हैं कि 17वीं और 18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य के दौर में इसका उपयोग केवल मनोरंजन के लिए नहीं होता था। युद्ध से लौटे सैनिकों की थकान दूर करने, उनका मनोबल बढ़ाने और उनमें नई ऊर्जा भरने के लिए भी लावणी की प्रस्तुतियां आयोजित की जाती थीं।

इतिहासकारों का मानना है कि कई बार इन गीतों के जरिए समाज और शासन से जुड़े संदेश भी लोगों तक पहुंचाए जाते थे। इस तरह लावणी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रही, बल्कि जनसंचार और लोकजागरण का भी एक प्रभावी साधन बन गई। यही कारण है कि इसका इतिहास केवल मंच तक सीमित नहीं, बल्कि मराठा इतिहास के पन्नों में भी दर्ज है।

ढोलकी की थाप ही इसकी पहचान

अगर लावणी की जान किसी एक वाद्य यंत्र में बसती है, तो वह है ढोलकी। इसकी तेज, सधी और ऊर्जावान ताल पूरे नृत्य को गति देती है। जैसे ही ढोलकी की पहली थाप गूंजती है, कलाकारों के कदम अपने आप उसी लय में थिरकने लगते हैं और दर्शकों का ध्यान मंच पर टिक जाता है। ढोलकी के साथ हारमोनियम, झांझ और तुनतुने जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र भी बजाए जाते हैं, लेकिन लावणी की पहचान आज भी सबसे ज्यादा ढोलकी की थाप से ही जुड़ी हुई है।

गीतों में बसती थी समाज की धड़कन

लावणी के गीत केवल प्रेम, सौंदर्य या विरह तक सीमित नहीं रहे। इनमें समाज की विसंगतियां, राजनीति, पारिवारिक रिश्तों की जटिलताएं, हास्य, व्यंग्य, लोककथाएं और आम लोगों के जीवन के अनुभव भी शामिल होते थे। यही वजह थी कि गांवों और कस्बों में रहने वाले लोग इन गीतों में अपने जीवन की झलक देखते थे। लावणी केवल मंच पर प्रस्तुत होने वाली कला नहीं रही, बल्कि समाज के सुख-दुख को अभिव्यक्त करने वाली लोकभाषा बन गई।

नौवारी साड़ी ने दी अलग पहचान

लावणी का आकर्षण केवल उसके गीत और नृत्य तक सीमित नहीं है। इसकी पारंपरिक वेशभूषा भी इसकी सबसे बड़ी पहचान है। नौ गज लंबी नौवारी साड़ी, बड़ी नथ, गजरा, चूड़ियां और पारंपरिक महाराष्ट्रीयन आभूषण कलाकारों की सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं।

Nauvari saree  lavani

Nauvari saree lavani

जब रंग-बिरंगी नौवारी साड़ियों में सजे कलाकार ढोलकी की ताल पर थिरकते हैं, तो ऐसा लगता है मानो महाराष्ट्र की पूरी लोकसंस्कृति एक साथ मंच पर उतर आई हो। यही दृश्य वर्षों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करता आया है।

तमाशा और लावणी का अटूट रिश्ता

महाराष्ट्र के प्रसिद्ध लोकनाट्य 'तमाशा' का नाम आते ही लावणी की याद अपने आप आ जाती है। दोनों का रिश्ता सदियों पुराना है। तमाशा के मंच पर दर्शक सबसे ज्यादा जिस प्रस्तुति का इंतजार करते थे, वह लावणी ही होती थी। यही मंच लावणी को गांवों की चौपाल से शहरों के रंगमंच और फिर राष्ट्रीय स्तर तक लेकर गया। बाद में सांस्कृतिक समारोहों और बड़े आयोजनों ने इसकी लोकप्रियता को और भी बढ़ा दिया।

Eetha Shraddha Kapoor (yashstudiosmusic)

Eetha Shraddha Kapoor (yashstudiosmusic)

क्या केवल महिलाएं ही करती हैं लावणी?

आज लावणी की पहचान मुख्य रूप से महिला कलाकारों से जुड़ी हुई है, लेकिन इतिहास कुछ अलग कहानी सुनाता है। पुराने समय में कई पुरुष कलाकार भी महिलाओं का वेश धारण कर लावणी प्रस्तुत किया करते थे। उनकी अदाकारी और भाव-भंगिमाएं दर्शकों को उतनी ही प्रभावित करती थीं, जितनी महिला कलाकारों की प्रस्तुति। यह परंपरा बताती है कि लावणी हमेशा से अभिनय, संगीत और लोकनाट्य की समृद्ध परंपरा का हिस्सा रही है।

फिल्मों ने दी नई उड़ान

समय के साथ लावणी ने सिनेमा की दुनिया में भी अपनी मजबूत जगह बनाई। मराठी फिल्मों के अलावा हिंदी सिनेमा ने भी इसे नई पहचान दी। 'माला जाऊ दे', 'हमको है इतंजार', 'अप्सरा आली' और 'वाजले की बारा' जैसे लोकप्रिय गीतों ने लावणी को नई पीढ़ी तक पहुंचाया और इसकी लोकप्रियता को नई उड़ान दी।

इन अभिनेत्रियों की लाजवाब लावणी

इन अभिनेत्रियों की लाजवाब लावणी

अब श्रद्धा कपूर की फिल्म 'ईथा' के जरिए भी लावणी एक बार फिर सुर्खियों में है। यह फिल्म नई पीढ़ी को इस लोककला के बारे में जानने की उत्सुकता दे रही है। ऐसे में यह समझना और भी जरूरी हो जाता है कि लावणी केवल फिल्मों का आकर्षक नृत्य नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोकपरंपराओं और इतिहास का जीवंत हिस्सा है।

तीन सदियों बाद भी नहीं फीकी पड़ी चमक

आज लावणी महाराष्ट्र की सीमाओं से बहुत आगे निकल चुकी है। देश के विभिन्न राज्यों में होने वाले सांस्कृतिक समारोहों, कॉलेज फेस्टिवल, थिएटर प्रस्तुतियों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी इसकी गूंज सुनाई देती है। आधुनिक दौर में इसकी प्रस्तुति का अंदाज भले बदल गया हो, लेकिन इसकी मूल आत्मा आज भी वही है।

करीब तीन सौ वर्षों का सफर तय करने के बाद भी लावणी की चमक फीकी नहीं पड़ी। ढोलकी की थाप आज भी लोगों को रोमांचित करती है, लोकगीत आज भी दिलों को छूते हैं और कलाकारों की जीवंत प्रस्तुति आज भी दर्शकों को बांधे रखती है। यही कारण है कि लावणी केवल महाराष्ट्र का एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का ऐसा अनमोल अध्याय है, जो समय के साथ और भी अधिक जीवंत होता जा रहा है।

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