Times Now Navbharat
live-tv
Premium

Teejan Bai: नहीं गईं स्कूल तो जंगल को बना लिया गुरु, यूं तय किया खाक से फलक तक का सफर

अब तीजन बाई करीब 70 साल की हो चुकी हैं। अस्वस्थ रहती हैं। भिलाई के गनियारी गांव के पारधी टोले में वह अपने परिवार के साथ रह रही हैं। गायकी छूटने से तीजन गुमसुम सी रहती हैं। ये अलग बात है कि पंडवानी का जिक्र आते ही उनका चेहरा गुलाब के फूल की तरह खिल उठता है।

Image
Teejan Bai: पतियों को छोड़ा, बच्चों को खोया; भारतीय लोककला में क्रांति का दूसरा नाम हैं तीजन बाई
Authored by: Suneet Singh
Updated Jul 5, 2026, 09:57 IST
Follow on Google News

Teejan Bai Wiki, Bio, Life: तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के पाटन अटारी गांव में हुआ था। उस दिन तीज थी। लोक पर्व तीज पर जन्मी बेटी को सुखवती देवी और हुनुकलाल पारधी ने तीजन नाम दिया। तीजन जिस पारधी आदिवासी समुदाय से आती हैं उसे ब्रिटिश राज में 'क्रिमिनल ट्राइब' घोषित कर दिया था। आजादी के बाद पंडित नेहरू की सरकार ने उसे निरस्त किया था।

5

5

तीजन का बचपन गरीबी में बीता। वो जिस समाज से आती हैं वहां जानवरों और पक्षियों का शिकार कर बाजार में बेचा जाता है तब जाकर घर में रोटी आती थी। एक समय बाद शिकार पर पाबंदी लगी। इन लोगों पर जिंदा रहने तक का संकट आ गया। मजदूरी करके पेट पालने लगे। तीजन बाई की दाद पूरी दुनिया इसलिए भी देती है कि उन्होंने ऐसे समुदाय से निकल कर पंडवानी के ज़रिए ऊंचा और बेहद खास मुकाम हासिल किया।

पैसों के अभाव में तीन कभी स्कूल नहीं जा पाईं। उनके लिए उनके माता-पिता और पशु पक्षी ही गुरु थे। पक्षियों की आवाज, मां के लोकगीत और पिता की बांसुरी ने संगीत की दुनिया से उनका राबता करवाया। तीजन ने अपने नाना बृजलाल पारधी से नौ साल की उम्र में पंडवानी सीखना शुरू किया। हालांकि उन दिनों छत्तीसगढ़ में सिर्फ पुरुष ही पंडवानी गाया करते थे। महिलाओं के लिए पंडवानी गायन सामाजिक तौर पर प्रतिबंधित था। लेकिन तीजन ने दुनिया समाज को दरकिनार कर पंडवानी के सुरों को अपनी सांसों में ऐसा पिरोया कि आज भी यही सुर उनके जीने का सहारा हैं।

2

2

क्या होता है पंडवानी गायन (What is Pandavani)

पंडवानी छत्तीसगढ़ की प्राचीन लोककला है, जो सबल सिंह चौहान रचित महाभारत पर आधारित है। इसमें मुख्य कलाकार पांडवों की कथा गाता है और अभिनय भी करता है। बाकी की मंडली में साथी रागी हारमोनियम-तबला बजाते हैं। पंडवानी दो शैलियों में गाई जाती है। पहली वेदमती (बैठकर, शास्त्रीय) और दूसरी कापालिक (खड़े होकर, नाटकीय)। महिलाओं के लिए यह कला वर्जित थी। तीजन बाई ने कापालिक शैली चुनी और पहली महिला गायिका बनीं। लेकिन ये सफर उनके लिए कभी भी आसान नहीं रहा।

बिछड़े सभी बारी-बारी

9 साल की उम्र में पंडवानी गायन में कदन रखने के साथ ही तीजन को दुनिया समाज का विरोध झेलना पड़ा। जैसा कि बता चुके हैं कि छत्तीसगढ़ में महिलाओं को पंडवानी गाने की मनाही थी। तीजन बाहर वालों से तो तब भी लड़ लेतीं, लेकिन घर के अंदर से भी उन्हें विरोध और तिरस्कार झेलना पड़ा। रिश्ते नातेदारों ने संबंध खत्म कर लिये। घर से बेघर होना पड़ा। वह खुद कई इंटरव्यूज में बता चुकी हैं कि पंडवानी गायन से उनकी तीन-तीन शादियां टूटीं।

पंडवानी के सफर में उन्होंने काफी कम उम्र में दो बेटों को खोया। एक दत्तक पुत्री की मौत का दर्द सहा। बावजूद इसके उन्होंने पंडवानी को नहीं छोड़ा। वह कहती हैं कि ये पंडवानी ही मेरा सहारा है, यह मुझे बेड़ा पार लगाएगी।

3

3

आज कहां है तीजन बाई

अब तीजन बाई करीब 70 साल की हो चुकी हैं। अस्वस्थ रहती हैं। भिलाई के गनियारी गांव के पारधी टोले में वह अपने परिवार के साथ रह रही हैं। 2025 में उनकी तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन कर उनका हाल-चाल जाना था। गायकी छूटने से तीजन गुमसुम सी रहती हैं। ये अलग बात है कि पंडवानी का जिक्र आते ही उनका चेहरा गुलाब के फूल की तरह खिल उठता है।

End of Article