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लाडो तू लाचार नहीं... पढ़ें रिंकी राठौर की कहानी जिसे दहेज के ताने तोड़ नहीं पाए, जिसने सहना नहीं सक्षम होना चुना

कम उम्र में शादी, वर्षों का संघर्ष, अकेले बच्चे की परवरिश और सिलाई से घर चलाने के बाद रिंकी राठौर ने कैसे बनाई अपनी नई पहचान। रिंकी का यह इंटरव्यू दहेज के खिलाफ हमारी 'अब बस' मुहिम का हिस्सा है।

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दहेज से लड़ने वाली एक बेटी की प्रेरणा भरी कहानी
Authored by: Medha Chawla
Updated May 29, 2026, 17:51 IST

शादी... हर लड़की के जीवन का एक ऐसा सपना, जिसे वह बचपन से संजोती है। एक नया घर, नए रिश्ते और सम्मान से भरी एक नई शुरुआत। लेकिन क्या होता है जब यही सपना धीरे-धीरे डर, दबाव और अपमान में बदलने लगे?

'तू अपने घर से लाई ही क्या है?' एक वाक्य... जो किसी भी लड़की के आत्मसम्मान को भीतर तक चोट पहुंचा सकता है। उत्तराखंड के एक छोटे से गांव की बेटी रिंकी राठौर की कहानी भी ऐसी ही थी लेकिन इस लाडो ने हारना नहीं, लड़ना चुना। रिंकी राठौर का यह इंटरव्यू टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की दहेज के खिलाफ 'अब बस' मुहिम का हिस्सा है। यह सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं, बल्कि उन अनगिनत महिलाओं की आवाज है जो कभी न कभी तानों, दबाव और असमान व्यवहार का सामना करती हैं, लेकिन फिर भी आगे बढ़ने का रास्ता खोज लेती हैं।

कम उम्र में शादी और सपनों से भरी शुरुआत

उत्तराखंड के एक छोटे से गांव की अल्हड़ से सी लड़की - रिंकी राठौर - जो अभी जिम्मेदारी का मतलब भी नहीं समझ पाई थी, अचानक जानकारी में शादी के रिश्ते में बांध दी गई। उन युवा आंखों में तमाम सपने और खुशियां थीं । उम्मीद थी कि 'सपनों का राजकुमार' पलकों पर बैठाकर रखेगा। लेकिन शादी के दूसरे दिन ही तस्वीर बदल गई। दहेज के ताने ऐसे शुरू हुए कि उनमें नई बहू के स्वागत की रस्में भी पूरी नहीं हो पाईं।

अपने वो दिन याद करते हुए रिंकी बताती हैं कि उनकी शादी कम उम्र में हो गई थी। उम्र ऐसी थी जब ज्यादातर लड़कियां अपने भविष्य के सपने देखती हैं, लेकिन उनके जीवन की दिशा अचानक बदल गई। नए घर और नए रिश्तों के साथ उन्होंने भी एक खुशहाल वैवाहिक जीवन की उम्मीद की थी। लेकिन उनके अनुसार, शादी के शुरुआती दिनों से ही उन्हें महसूस होने लगा कि चीजें उनकी उम्मीदों जैसी नहीं हैं।

बकौल रिंकी - शादी के बाद उन्हें ऐसे कई ताने सुनने पड़े। कभी शादी के स्तर को लेकर, कभी मायके को लेकर और कभी उन अपेक्षाओं को लेकर जिन्हें वह पूरा नहीं कर पा रही थीं। धीरे-धीरे ये बातें उनके आत्मविश्वास पर असर डालने लगीं। उन्हें बार-बार यह एहसास कराया जाता था कि वह पर्याप्त नहीं हैं। कभी तुलना, कभी ताने और कभी ऐसी टिप्पणियां, जिन्होंने धीरे-धीरे उनके आत्मविश्वास को कमजोर करना शुरू कर दिया। और वह ना तो अपनी गलती समझ पाती थीं और ना ही अपने मायके वालों की।

रोज बढ़ने लगा अत्याचार

ये ताने धीरे-धीरे बड़ी मानसिक प्रताड़ना का रूप लेने लगे। अब ये दबी जुबां में नहीं, आत्म सम्मान हिला देने वाले शब्दों में कहे जाते थे। रिंकी ने बताया कि वह शादी में 8 साल तक रहीं और हर दिन, महीने के साथ उन पर प्रताड़ना बढ़ती गई। शब्दों के बाण फिर मार पिटाई में बदल गए। घर के बड़े ही नहीं, देवर तक ने उन पर हाथ उठाया। एक समय ऐसा आया था कि वह एकदम अकेली पड़ गई थीं। यहां तक कि उनके बेटे जन्म पर भी ससुराल वालों का रवैया एकदम उपेक्षापूर्ण था।

रिंकी की कहानी कई बेटियों के लिए मिसाल है

रिंकी की कहानी कई बेटियों के लिए मिसाल है

जब समझौता ही समाधान बताया गया

रिंकी कहती हैं कि जब उन्होंने अपनी परेशानियों को परिवार के सामने रखने की कोशिश की तो उन्हें अक्सर यही समझाया गया कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। वैसे भी भारतीय समाज में जब भी बेटियां ऐसे मामले उठाती हैं तो उनको आज भी यही सलाह मिलती है - घर बचाना है, थोड़ा सहन करो, शादी निभानी पड़ती है, वो तुम्हारा घर है, वहां संभालो। ऐसी ही कुछ रिंकी के साथ भी हुआ और मां-बाप ने भी उनकी तकलीफ को उस समय उतनी गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन कई बार यही सलाह किसी महिला को वर्षों तक ऐसी परिस्थितियों में रोके रखती है, जहां उसका आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य लगातार प्रभावित होता रहता है।

रिंकी बताती हैं कि प्रताड़ना के उस दौर में वह अकेले थीं, टूटी हुईं। मानसिक उपेक्षा ने उनको माइग्रेन का मरीज बना दिया। वह उदासीन रहती थीं लेकिन बस एक अच्छी बात ये थी कि उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा।

अकेले बच्चे की परवरिश और संघर्ष भरे दिन

रिंकी की जिंदगी का सबसे कठिन दौर तब आया जब उन्हें अपने बच्चे की जिम्मेदारी भी अकेले संभालनी पड़ी। उस समय ससुराल या मायके से उन्हें कोई मदद नहीं मिली। ऐसे में रिंकी ने अपनी जिंंदगी को अपने बेटे के नाम किया और एक नए हौसले के साथ किराए के छोटे से कमरे में रहकर जिंदगी को फिर से शुरू करने का फैसला किया। उनके सामने आर्थिक चुनौतियां थीं। भविष्य को लेकर अनिश्चितता थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। डटकर चुनौतियों का सामना करने का निश्चय किया।

रिंकी बताती हैं कि उस दौर में सिलाई मशीन उनकी सबसे बड़ी साथी बन गई। उन्होंने सिलाई का काम शुरू किया और उसी से घर चलाने की कोशिश की। शायद उस समय उन्हें भी नहीं पता था कि यही संघर्ष एक दिन उनकी सबसे बड़ी ताकत बन जाएगा।

सिलाई मशीन से रैंप तक का सफर

रिंकी की कहानी की सबसे खूबसूरत बात यह है कि उन्होंने खुद को परिस्थितियों की पहचान नहीं बनने दिया। धीरे-धीरे उन्होंने खुद पर काम करना शुरू किया। आत्मविश्वास लौटाया। नई चीजें सीखीं। अपने व्यक्तित्व को निखारा। फिर एक दिन उन्होंने मॉडलिंग की दुनिया में कदम रखने का फैसला किया। अपने सिले कपड़ों को रैंप पर पहनकर लोगों तक पहुंचाया। फिर एक ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लिया जहां वह टॉप की 5 कंटेस्टेंट्स में रहीं।

यह राह बेशक उनके लिए आसान नहीं थी। उम्र, समाज, जिम्मेदारियां और लोगों की राय - हर चीज उनके सामने खड़ी थी। लेकिन उन्होंने इन सबके बावजूद आगे बढ़ना चुना। इस तरह छोटे कदमों के साथ उन्होंने अपनी जिंंदगी को नए सिरे से सहेजा। अब रिंकी कमर्शल फोटोशूट करती हैं, रैंप मॉडलिंग करती हैं और आगे चल कर मॉडलिंग और गार्मेंट की दुनिया में अपना नाम बनाना चाहती हैं।कभी जिन शब्दों ने उन्हें तोड़ने की कोशिश की थी, आज वही अतीत उनकी ताकत बन चुका है। उनको एक नई उड़ान के लिए प्रेरित करता है।

बेटियों को लेकर रिंकी ने पेरेंट्स को दिया बड़ा संदेश

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बेटियों को दहेज नहीं, आत्मनिर्भरता दीजिए

रिंकी की कहानी बेशक देश की हर उस बेटी की मिसाल है जो दहेज के दानव की चंगुल में फंंसी हुई है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी सीख माता-पिता के लिए है। वह कहती हैं कि बेटियों को दहेज देने की बजाय उन्हें आत्मनिर्भर बनाइए। उन्हें शिक्षा दीजिए। कौशल सिखाइए। आर्थिक रूप से मजबूत बनाइए। उनका मानना है कि हर बेटी के पास ऐसा हुनर होना चाहिए जिसके दम पर वह जरूरत पड़ने पर अपने पैरों पर खड़ी हो सके।

रिंकी यह भी कहती हैं कि माता-पिता बेटियों को यह भरोसा जरूर दें कि अगर कभी जीवन में कठिन समय आए तो उनका परिवार उनके साथ खड़ा रहेगा। वह किसी भी मोड़ पर अकेली नहीं होंगी। सिर्फ यही बात कई विवाहित और प्रताड़ित बेटियों का जीवन बचा सकती है।

यह कहानी सिर्फ रिंकी की नहीं

रिंकी की कहानी इसलिए खास नहीं है क्योंकि वह आज मॉडलिंग कर रही हैं। यह कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने खुद को हारने नहीं दिया। बिना किसी बड़े सहारे के। बिना किसी 'परफेक्ट मौके' के। सिर्फ अपने हौसले, मेहनत और एक फैसले के दम पर। हालांकि वह यह भी मानती हैं कि बीते दिनों की टीस उनके मन में है। उनके जख्म आज भी कहीं न कहीं उतने ही हरे हैं। वो कई बार रात में बेचैन हो जाती हैं ये सोचकर कि उनकी गलती क्या थी, क्यों वो अपमान उन्होंने झेला है।

लेकिन फिर वो खुद को समेटती हैं, संभालती हैं और उठ खड़ी होती हैं खुद को ये याद दिलाते हुए कि लाडो तू लाचार नहीं है। तू कोमल है तो तू दुर्गा भी है। तू संवार सकती है तो तू संहार भी सकती है।

इस तरह रिंकी की कहानी याद दिलाती है कि कई बार जिंदगी बदलने के लिए पूरी दुनिया का साथ नहीं चाहिए होता। कभी-कभी सिर्फ एक फैसला काफी होता है - खुद को चुनने का।

और जब एक महिला खुद को चुनती है, तब सिर्फ उसकी जिंदगी नहीं बदलती... आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी बदल जाता है।

(यह लेख रिंकी राठौर द्वारा इंटरव्यू में साझा किए गए व्यक्तिगत अनुभवों और विचारों पर आधारित है।)

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