Kitaab Cafe (किताब कैफै): भारतीय साहित्य की दुनिया में आर.के. नारायण ऐसा खास नाम है जिसने अपनी रचनात्मकता में हमेशा कॉमन मैन यानि कि आम आदमी को जिया। उन्होंने साधारण लोगों की छोटी-छोटी खुशियों, परेशानियों और संबंधों को बेहद सहज ढंग से अपनी कहानियों में जगह दी। मालगुड़ी डेज हो या फिर स्वामी एंड फ्रेंड्स, द गइड हो या द इंग्लिश टीचर, हर कहानी में आर के नारायण ने आम हिंदुस्तानी की जिंदगी को अपनी स्याही और शब्दों से संवारा।
आर के नारायण की भाषा सरल थी, लेकिन उसमें भारतीय समाज की गहरी समझ और हल्का-सा हास्य हमेशा मौजूद रहता था। यही वजह है कि उनकी कहानियां हर उम्र के पाठकों को पसंद आती। उनकी रचनाओं में न कोई बनावटी नायक होता था और न ही असाधारण घटनाएं। उनके किरदार हमारे आसपास के लोग थे। उनकी कहानियों का नायक कभी डाकिया होता तो कभी मोची। उनके गढ़े किरदार हंसते थे, दुखी होते थे और जिंदगी से सीखते हुए आगे बढ़ जाते थे।
यही कारण है कि अंग्रेजी में लिखने के बावजूद उनकी कहानियों को हिंदी के पाठकों का भी खूब प्यार मिला। आज भी आर के नारायण की कहानियां पाठकों को जीवन को सरल नजर से देखने और छोटी-छोटी बातों में खुशी तलाशने का कारण देती हैं।
साल 2001 में इस दुनिया को अलविदा कह गए नारायण
कोई छापने को तैयार नहीं थी कहानी
आपको जानकर हैरानी होगी कि भारतीय साहित्य को दुनिया तक पहुंचाने वाले इस 'आम आदमी' को अपनी पहली कहानी छपवाने के लिए करीब 4 साल तक दर-दर भटकना पड़ा था। लाख कोशिशों के बाद भी भारत में उनकी कहानियां कोई छापने को तैयार नहीं हुआ। ये उन दिनों की बात है जब आर के नारायण का पूरा नाम रसीपुरम कृष्णास्वामी अय्यर नारायस्वामी हुआ करता था।
रसीपुरम ने 1931 में अपना पहला कहानियों का कलेक्शन लिख लिया था। जब भारत का कोई भी पब्लिशर उनकी किताब छापने को तैयार नहीं हुआ तो उन्होंने अपनी कहानियां लंदन के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले दोस्त किट्टू पूर्ना को भेज दीं। रसीपुरम ने किट्टू से कहा कि भारत में तो कोई इसे छाप नहीं रहा है, अगर कोई पब्लिशर वहां छाप दे तो ठीक नहीं तो वहीं थेम्स नदी में बहा देना।
रसीपुरम 1931 में लिख चुके थे अपनी पहली किताब
ग्राहम ग्रीन के हाथ लगी नारायण की स्क्रिप्ट
किट्टू ऑक्सफोर्ड में पढ़ता था जहां बड़े-बड़े साहित्यकार और जाने माने पब्लिशर्स आते रहते थे। एक दिन किट्टू को ग्राहम ग्रीन मिले। ग्राहम ग्रीन लंदन के जाने माने लेखक थे। 1935 तक वह दर्जनों किताबें लिख चुके थे। किट्टू ने ग्राहम ग्रीन को अपने दोस्त रसीपुरम के कहानियों की मैनुस्क्रिप्ट दी और कहा कि सर आपको ये एकबार जरूर पढ़नी चाहिए।
ग्राहम ग्रीन बड़े आदमी थे। उनके पास तमाम काम थे। किसी अनजान की कहानी पढ़ने के लिए समय निकालना मुश्किल था। बावजूद इसके ग्राहम ग्रीन वे रसीपुरम की कहानियां पढ़ीं। 8-10 पन्ने पढ़ने के बाद तो वो बेचैन हो उठे। बेचैनी में ही उन्होंने रसीपुरम को चिट्ठी लिखी और कहा कि वो लोग अभागे हैं जिन्होंने इन कहानियों को छापने से मना किया है।
ग्रीन ने कहा कि इन कहानियों को किसी भी हाल में छपना चाहिए। मैं लंदन के एक अपने एक प्बलिशर दोस्त से बोलकर इन्हें छपवाना चाहता हूं। ग्राहम ग्रीन ने रसीपुरम को ये भी लिखा कि किताब के लिए तुम्हें अपना नाम छोटा करना पड़ेगा। ये काफी बड़ा है- रसीपुरम कृष्णास्वामी अय्यर नारायस्वामी। जवाबी लेटर में रसीपुरम ने ग्राहम ग्रीन का धन्यवाद देते हुए आभार जताया। चिट्ठी के अंत में रसीपुरम ने लिखा- आपका आर.के.नारायण।
आर के नारायण की पहली किताब थी स्वामी एंड फ्रेंड्स
साल 1935 आ चुका था। रसीपुरम आर के नारायण हो चुके थे। इस बीच ना जाने कितनी ही बार ग्रीन और नारायण में चिट्ठी के जरिए कई मुद्दों पर बात हुई। अंत में किताब का नाम फाइनल हुआ। ग्रीन के सुझाव पर आर के नारायण ने अपनी किताब का नाम रखा- स्वामी एंड फ्रेंड्स। 1935 के जुलाई महीने में इसी नाम से आर के नारायण की पहली किताब छपी और लंदन समेत पूरे भारत में भी छा गई। यहां से भारतीय साहित्य की दुनिया को आर के नारायाण के नाम का एक ऐसा लेखक मिला जिसने इंग्लिश लिटरेचर को देश के हर आम आदमी से जोड़ दिया।
60 साल में महज एक बार मिले ग्रीन और नारायण
पहले लेटर के बाद से ही ग्राहम ग्रीन को आर के नारायण ने अपना सबसे अच्छा दोस्त, फिलॉसफर और गुरु मान लिया था। दोनों तरफ से मित्रता का समान भाव था। दोनों की दोस्ती 1991 में ग्राहम ग्रीन के निधन तक बनी रही। दोनों ने एक दूसरे को सैकड़ों बार चिट्ठियां लिखी थीं। आपको जानकर हैरानी होगी कि करीब 60 साल की दोस्ती में दोनों की मुलाकात बस एक बार हुई थी। ये साल था 1956।
आर के नारायण के सबसे बड़े गुरु थे ग्रीन
उन दिनों आर के नारायण अपनी चर्चित किताब द गाइड लिख रहे थे। हर कहानी की तरह इस कहानी पर भी उन्होंने अपने दोस्त और मेंटॉर ग्राहम ग्रीन से कई मुद्दों पर मशविरा लिया। कहानी के क्लाइमैक्स को लेकर दोनों में कुछ असहमतियां पैदा हुईं। इसे ही दूर करने के लिए आर के नारायण सीधे लंदन पहुंच गए।
जिस शख्स से वो पिछले करीब 25 सालों से सिर्फ चिट्ठियों से बात करते थे उनसे वो पहली बार मिले। इस मुलाकात में ग्राहम ग्रीन ने नारायण को समझाया कि कहानी के अंत में इसके नायक राजू को मरना चाहिए। नारायण ऐसा नहीं चाहते थे। वो अपने नायकों को नहीं मारते थे। हालांकि, जब किताब छपी तो उसका नायक गाइड राजू कहानी के अंत में मर जाता है।
आर के नारायण की द गाइड
गाइड ने मचा दिया गदर
इस किताब ने देशभर में तहलका मचा दिया। लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया। देखते ही देखते आर के नारायण की द गाइड बेस्ट सेलर बन गई। इसी किताब के लिए उन्हें भारत सरकार की तरफ से साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आर के नारायण की इसी द गाइड पर देव आनंद ने गाइड फिल्म बनाई थी जो बॉलीवुड की सबसे कल्ट फिल्म मानी जाती है।
(Note: इस आर्टिकल में दिये गए सारे तथ्य आर के नारायण की ऑटोबायोग्राफी My Days से लिये गए हैं)
