एक दौर था जब परिवार में पिता का हुक्म आखिरी होता था। अब बच्चे और पापा पहले आपस में बैठकर बात करते हैं, तब कोई फैसला लेते हैं। 'पिता का फैसला अंतिम है' से 'बैठकर बात करते हैं' तक का सफर बहुत लंबा रहा है। इस सफर को मंजिल तक पहुंचाने काफी हद तक काम किया है हमारी Gen Z कहलाने वाली आज की युवा पीढ़ी ने।
ये जेन जी घर-परिवार के साथ ही भारत के ऑफिस कल्चर को भी पूरी तरह से बदल रही है। एक समय था जब दफ्तरों में बॉस के केबिन का दरवाजा खटखटाने से पहले लोग दो बार सोचते थे। ईमेल या एप्लीकेशन लिखते समय भी भाषा नाप तौलकर चुनी जाती थी। मीटिंग में सवाल पूछना जोखिम माना जाता था। बॉस से असहमति जताना तो और भी मुश्किल था। अगर बॉस ने कहा कि आज रात तक काम पूरा करना है, तो शायद ही कोई पूछता कि 'क्यों?' या 'क्या इसे कल करें तो चलेगा?' इस पीढ़ी ने बड़े पैमाने पर ये सब बदल कर रख दिया है।
Gen Z ने कैसे बदली तस्वीर
देश में स्टार्टअप्स, टेक कंपनियों, मीडिया हाउस, प्रोडक्शन हाउस से ई-कॉमर्स इंडस्ट्री तक में अब नई पीढ़ी मैनेजर की कुर्सी पर बैठ रही है। यह Gen Z है। वही पीढ़ी जो इंटरनेट के साथ बड़ी हुई। जिसने कॉलेज ऑनलाइन भी किया, ऑफिस भी घर से देखा और करियर की शुरुआत ऐसे दौर में की, जब वर्क लाइफ बैलेंस कोई लग्जरी नहीं, जरूरत बन चुका था।
इनकी उम्र भले कम हो, लेकिन नेतृत्व का तरीका पुरानी पीढ़ियों से काफी अलग है। ये टीम को 'रिसोर्स' नहीं, इंसान मानते हैं। ये 'क्यों नहीं हुआ?' से पहले 'कोई दिक्कत आई थी क्या?' पूछते हैं। शायद यही वजह है कि भारत में वर्कप्लेस की भाषा बदल रही है।
असहमति को अपमान नहीं समझती ये पीढ़ी
देखा जाए तो भारतीय समाज की तरह हमारे दफ्तर भी लंबे समय तक हायरारकी पर टिके रहे। उम्र, पद और अनुभव के आधार पर अधिकार तय होता था। मैनेजर निर्देश देता था और कर्मचारी उन्हें पूरा करता था। सवाल पूछना ज्यादातर असहमति माना जाता था। ऐसा नहीं है कि ये माहौल सिर्फ हमारे देश में ही था। औद्योगिक क्रांति के बाद दुनिया भर में कार्पोरेट स्ट्रक्चर सेना जैसी था- ऊपर आदेश देने वाले, नीचे उसका पालन करने वाले।
नॉलेज बेस्ड इकोनॉमी ने इस मॉडल को चुनौती दी। कंपनियों के लिए असली निवेश मशीनें नहीं, उसके कर्मचारी बनने लगे। उन्हें महसूस होने लगा कि रचनात्मक काम और नए आइडिया डर के माहौल में नहीं किया जा सकता। दबाव में कोई भी कर्मचारी अपना सर्वोत्तम नहीं दे पाएगा। यहां से ऑफिसों में सीनियर और जूनियर का भेद मिटने लगा। जेन जी ने आकर इसे लगभग पूरी तरह से खत्म कर दिया।
टीम को रिसोर्स नहीं, इंसान मानती है जेन जी
बेसिक फंडे क्लियर नाम से अपना स्टार्टअप चलाने वाले नितिन सुखीजा बताते हैं कि अब नेतृत्व की भूमिका में जो Gen Z है, वो ऐसे दौर में बड़ी हुई है, जहां इंटरनेट ने जानकारी को लोकतांत्रिक बना दिया। उनके लिए किसी विचार का मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि उसे किसने कहा, इस बात से तय होता है कि वह कितना सही है। इस सोच का असर उनके नेतृत्व पर भी दिखाई देता है। वे टीम से राय मांगते हैं। असहमति को चुनौती या अपमान नहीं समझतेते।
अपने हिसाब से रास्ते चुन रही है जेन जी
हर पीढ़ी के युवाओं के सामने एक जैसी चुनौती रही है। उन्हें पहले से बनी व्यवस्था में अपनी जगह बनानी होती थी। यह समझना होता था कि अब क्या काम नहीं कर रहा और उसे बेहतर कैसे बनाया जा सकता है। लेकिन जेनरेशन Z (Gen Z) के सामने यह चुनौती थोड़ी अलग है। उनके पास पारंपरिक नौकरी के अलावा स्टार्टअप, डिजिटल बिजनेस, क्रिएटर इकोनॉमी और फ्रीलांसिंग जैसे नए रास्ते भी हैं। यानी करियर बनाने का सिर्फ एक तयशुदा तरीका नहीं रह गया है। यही वजह है कि Gen Z पुराने वर्क कल्चर को आंख बंद करके अपनाने के बजाय उसे बदलने और अपने हिसाब से नए रास्ते बनाने में ज्यादा भरोसा रखती है।
अपना गार्मेंट बिजनेस करने वाली 45 वर्षीय पूनम सिंह कहती हैं कि Gen Z ऐसे दौर में बड़ी हुई है, जो ये मानती है कि कोई खास जानकारी सिर्फ बॉस के पास नहीं होती। टीम का सबसे जूनियर मेंबर भी AI टूल्स, नई टेक्नोलॉजी या सोशल मीडिया ट्रेंड्स के बारे में मैनेजर से ज्यादा जान सकता है। इसलिए यह पीढ़ी हायरारकी से ज्यादा एक्सपरटाइज और भरोसे के दम पर लीड करना चाहती है।
ऐसा नहीं है कि जेन जी नहीं चाहती कि उसकी टीम और जूनियर्स उसका सम्मान करे। लेकिन वो ये भी मानती है कि सम्मान बस इसलिए ना हो कि वो मैनेजर है, इसलिए हो कि वो सबकी सुनता है, सीखता है और सबको साथ लेकर चलता है।
'बॉस' से 'फैसिलिटेटर' तक का सफर
मैनेजमेंट की दुनिया में पिछले दो दशकों में एक शब्द खूब पॉपुलर हुआ है- सर्वेंट लीडरशिप। इस अवधारणा के अनुसार, एक अच्छा लीडर वह नहीं जो सबसे आगे खड़ा होकर आदेश दे। असली लीडर वह जो अपनी टीम को बेहतर काम करने के लिए जरूरी संसाधन, भरोसा और माहौल उपलब्ध कराए। जेन जी इस अवधारणा को जी रही है। इसपर अमल कर रही है और ये भी प्रयास करती है कि उनसे पहले की पीढ़ी भी इसे व्यवहार में लाए।
बदलाव व्यवहार ही नहीं, मनोविज्ञान का भी है
हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की प्रोफेसर एमी एडमंडसन ने साइकोलॉजिकल सेफ्टी का कॉन्सेप्ट दिया है। उनका कहना है कि जिस टीम के लोग बिना डर के सवाल पूछ सकते हैं, अपनी गलती स्वीकार कर सकते हैं और नए विचार रख सकते हैं, वे दूसरी टीमों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं। ये साइकोलॉजी संस्थान की उत्पादकता से भी जुड़ा हुई है।
समाजशास्त्र मानता है कि जेन जी से पहले की पीढ़ी के कर्मचारी अपने हाथों से काम करते थे। वहीं ये जेन जी अपने दिमाग और रचनात्मकता से काम करता है। रचनात्मकता आदेश पर नहीं चलती। उसे विश्वास चाहिए।आज कंपनियां भी समझ रही हैं कि डर से अनुशासन तो पैदा हो सकता है, लेकिन रचनात्मकता नहीं।
जेन जी की नई सोच से बढ़ रही है क्रिएटिविटी
लेकिन क्या हर बदलाव सकारात्मक है?
हर बदलाव अपने साथ नई चुनौतियां भी लाता है। कुछ वरिष्ठ पेशेवर मानते हैं कि जरूरत से ज्यादा अनौपचारिकता कई बार निर्णय लेने की स्पष्टता को कमजोर कर देती है। वहीं कुछ युवा कर्मचारी भी मानते हैं कि 'फ्रेंडली' होने का मतलब हमेशा ये नहीं होता कि आप बेस्ट हैं।
मतलब साफ है। चुनौती यह नहीं है कि पुराना वर्क कल्चर पूरी तरह गलत था या नया मॉडल पूरी तरह सही है। असली चुनौती दोनों के बीच बैलेंस बनाने की है। एक अच्छे संस्थान को संवेदनशील भी होना है और परिणाम भी देने हैं।
भारत में नेतृत्व हमेशा पद और अनुभव से जुड़ा रहा है, लेकिन Gen Z ने अब नेतृत्व का एक नया मॉडल दिया है। इस मॉडल में डर और डिसिप्लीन से ज्यादा विश्वास है और खुली सोच है। हो सकता है कि यह मॉडल हर इंडस्ट्री में फिट ना बैठे। लेकिन इतना तय है कि नई पीढ़ी ने एक जरूरी सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अच्छा मैनेजर वही है जिससे लोग डरें, या वह जिससे लोग खुलकर बात कर सकें? शायद आने वाले दिनों में वर्कप्लेस का भविष्य भी इसी सवाल के जवाब से तय होगा।
