इलाहाबाद की एक शाम और बैंक रोड का सरकारी बंगला। भीतर बैठक सिगरेट के धुएं और किताबों की महक से भरी है। गंगा की तरफ से आती हवा पर्दे से टकराकर कमरे की खामोशी को तोड़ रही है। उस कमरे में बैठे हैं दो लोग। दोनों अपनी-अपनी भाषा के शिखर पुरुष। दोनों अपने स्वभाव में आग की तरह तेज। एक तरफ उर्दू शायरी के बेमिसाल शायर रघुपति सहाय उर्फ फिराक गोरखपुरी। दूसरी तरफ हिंदी कविता के सबसे निराले और फक्कड़ कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
फिराक जिद करते हैं कि निराला, कोई नई कविता सुनाओ। निराला कविता पढ़ना शुरू करते हैं। कमरा कुछ देर के लिए बिल्कुल शांत हो जाता है। कविता खत्म होती है और तभी फिराक बोल पड़ते हैं- भाव तो अच्छा है लेकिन कविता बहुत ढीली है।
निराला पहले सुनते हैं। फिर उनके चेहरे का रंग बदलने लगता है। कुछ देर बाद उनका पारा चढ़ता है और वह फट पड़ते हैं। बहस शुरू हो जाती। बहस इतनी तेज होती कि बाहर लोगों को लगता झगड़ा हो रहा है। बहस थमते ही फिराक नौकर को आवाज देते- महुए की बोतल लाओ।
बोतल आती। जमकर पीना होता। हंसी-ठहाका लगता। घर-परिवार की बात होती और फिर एक रिक्शा आता, जिसका किराया फिराक पहले ही दे चुके होते। वह रिक्शा निराला को दारागंज में उनके घर तक छोड़ता। अगली फिर शाम, उसी सरकारी बंगले के उसी कमरे में फिर से वही दोनों बैठते। फिर एक-दूसरे को सुनते, झगड़ते और महुआ पीकर मस्त हो जाते।
कुछ ऐसे दोस्त थे फिराक और निराला। लड़ते भी पूरे मन से थे और दोस्ती भी पूरे मन से निभाते। फिराक के सचिव और करीबी सहयोगी रमेश चंद्र द्विवेदी ने अपनी किताब 'मैंने फिराक को देखा था ' में हर शाम सजने वाली इस बैठक का बेहद दिलचस्प तरीके से जिक्र किया है।
रमेश चंद्र द्विवेदी की किताब 'मैंने फिराक को देखा था '
रमेश चंद्र द्विवेदी लिखते हैं कि हिंदी साहित्यकारों में अगर फिराक की किसी से सबसे गहरी आत्मीयता थी, तो वह निराला थे। फिराक खुद निराला से कविता सुनाने की जिद करते थे। लेकिन जैसे ही कविता खत्म होती, वे उसकी कमियां निकालना शुरू कर देते।
निराला पहले धैर्य से सुनते। फिर जब उन्हें लगता कि अब बात ज्यादा हो रही है, तो वे भी पूरे वेग से जवाब देते। सोचिए, जिन कविताओं को हम दशकों से स्कूल की किताबों में पढ़ते आ रहे हैं, वे कभी दो दोस्तों के बीच ऐसी ही गर्मागर्म बहस का विषय रही होंगी।
एक नदी, जिनका पानी अलग था
फिराक और निराला दोनों जितने अच्छे दोस्त थे, मिजाज में उतने अलग। फिराक गोरखपुरी अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय पढ़ाते थे। अंग्रेजी, उर्दू और फारसी पर असाधारण अधिकार। बातचीत में व्यंग्य, बुद्धि और तीखी टिप्पणी उनकी पहचान थी। वे किसी भी रचना पर अपनी राय बेझिझक देते थे। सामने वाला कितना बड़ा लेखक है, इससे उन्हें फर्क नहीं पड़ता था।
फिराक गोरखपुरी
दूसरी तरफ निराला थे। एक ऐसे कवि, जिन्होंने पूरी जिंदगी अपने ढंग से जी। आर्थिक अभाव, पारिवारिक दुख, सामाजिक संघर्ष, सब कुछ झेला। लेकिन किसी के सामने झुके नहीं। हिंदी कविता में छायावाद को नई ऊंचाइयां देने वाले इस कवि का स्वभाव भी उनकी कविता की तरह मुक्त था।
शायद इसी वजह से दोनों के बीच कभी औपचारिकता नहीं रही। उस दौर के लोग कहते थे, दोनों एक ही नदी हैं, बस दोनों का पानी अलग है।
अंग्रेजी में सवाल, हिंदी में जवाब
फिराक के बंगले पर शाम को सजने वाली उस महफिल में एक और दिलचस्प चीज हुआ करती थी। रमेश चंद्र द्विवेदी लिखते हैं कि कई बार गुस्से में हिंदी के विद्वान निराला अंग्रेजी में लड़ने लगते थे। उन्हें लगता कि अंग्रेजी में वे अपनी बात और तीखे ढंग से रख पाएंगे। लेकिन फिराक उनका जवाब हिंदी में देते।
सोचिए, हिंदी का कवि अंग्रेजी बोल रहा है और उर्दू का अजीम शायर हिंदी में जवाब दे रहा है। यही उस दौर की साझा सांस्कृतिक विरासत की सबसे उम्दा तस्वीर भी मानी जाती है।
निराला संग शाम का खास होता था इंतजाम
फिराक की पत्नी के अनुसार, जैसे ही खबर मिलती कि निराला आने वाले हैं, नौकर को महुए की शराब लाने भेजा जाता। रसोई में कोरमा बनता। कबाब तैयार होते। भुना गोश्त, पुलाव और मिठाइयां आतीं। फिराक बीच-बीच में रसोई तक जाकर ऊंची आवाज में कहते- खबरदार, कुछ कम न पड़ने पाए।
सोचिए यहां फिराक वही शख्स हैं, जो कुछ देर बाद निराला की कविता की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ने वाले। दोस्त के आवभगत में कोई कमी न रहे, यह भी उसी की चिंता थी।
पहले ही दे देते रिक्शे का किराया
द्विवेदी लिखते हैं कि जब निराला लौटने लगते, तो फिराक नौकर से उनके लिए रिक्शा मंगवाते। रिक्शेवाले को किराया पहले ही दे देते। फिर खुद गेट तक उन्हें छोड़ने जाते।
क्यों खास थी फिराक और निराला की दोस्ती
फिराक बेहद तीखे आलोचक माने जाते थे। वे किसी लेखक की कमजोर रचना की खुलकर आलोचना करते थे। लेकिन निराला की प्रतिभा के सामने वे हमेशा सम्मान से भर जाते। उन्होंने कई मौकों पर कहा कि निराला हिंदी कविता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक हैं। निराला भी फिराक की शायरी और उनकी भाषा की गहराई की कद्र करते थे। उनके बीच प्रतिस्पर्धा नहीं थी। दोनों के बीच अगर कुछ रहा, तो वह थी दोस्ती और एक-दूसरे के लिए सम्मान।
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
दोनों अलग थे, लेकिन इसी वजह से करीब भी थे। फिराक उर्दू गजल के बड़े शायर थे। उनकी भाषा में नफासत, बौद्धिकता और रोमानी एहसास था। दूसरी ओर, निराला हिंदी कविता के विद्रोही स्वर थे। उन्होंने भाषा, छंद और अभिव्यक्ति की परंपराओं को चुनौती दी। दोनों की विधा अलग थी, लेकिन दोनों में एक बात समान थी। दोनों ही किसी भी तरह की बौद्धिक बनावट से समझौता नहीं करते। शायद इसी वजह से वे एक-दूसरे से असहमत होने का अधिकार भी रखते थे।
कुछ यारियां ऐसी होती हैं, जो सिर्फ संस्मरणों के हाशियों में दर्ज होती हैं। फिराक और निराला की दोस्ती भी ऐसी ही थी। वहां मतभेद थे, मगर मनभेद नहीं। वहां तर्क थे, मगर तिरस्कार नहीं। वहां आलोचना थी, मगर आत्मीयता उससे कहीं बड़ी थी।
आज उस दौर के लोग नहीं हैं। इलाहाबाद भी बदल चुका है। लेकिन हिंदी-उर्दू साहित्य के इतिहास में कहीं एक पुरानी बैठक अब भी आबाद है। आज भी वहां दो दोस्त आमने-सामने बैठे हैं। एक कविता सुना रहा है। दूसरा उसकी कमियां गिना रहा है। थोड़ी देर में दोनों हंसेंगे, साथ खाना खाएंगे और फिर एक दोस्त दूसरे को उस रिक्शे से विदा करेगा, जिसका किराया वह पहले ही दे चुका होगा।
