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इमरजेंसी: जब बोलने पर लगा पहरा तो कविता बनी हथियार, दमन के उस दौर में कवियों ने क्या खूब चलाई कलम

इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता ने शब्दों को कैद करने की कोशिश की, तब-तब साहित्य ने नए रास्ते खोज लिए। इमरजेंसी के उस दौर के कवियों ने अपनी कलम को तलवार बना अन्याय के खिलाफ बिगुल फूंक दिया।

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इमरजेंसी के खिलाफ बहुत से कवियों ने कलम को हथियार बना छेड़ दिया था संग्राम
Authored by: Suneet Singh
Updated Jun 25, 2026, 12:16 IST
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25 जून 1975 - भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह तारीख काले अक्षरों में दर्ज है। कानून की किताब में इसे इमरजेंसी कहा गया। 19 महीनों के आपातकाल में देश ने राजनीतिक दमन के साथ ही बोलने की आजादी पर भी पहरा देखा। सत्ता में बैठे नेताओं ने पूरे दम से असहमति की हर आवाज को दबाने की कोशिश की। क्या पब्लिक और क्या प्रेस, हर किसी से सवाल पूछने के हक छीन लिये गए।

नागार्जुन जैसे जनकवि को महज इस कारण जेल में ठूस दिया गया कि जब बहुत से लोग सत्ता के डर से चुप है, तब वो अपनी कविताओं से तीखे सवाल कैसे पूछ सकते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता ने शब्दों को कैद करने की कोशिश की, तब-तब साहित्य ने नए रास्ते खोज लिए। इमरजेंसी के उस दौर के कवियों ने अपनी कलम को तलवार बनाया और सत्ता की आंखों में आंखे डालकर पूछना शुरू किया - इंदु जी, क्या हुआ है आपको? क्या भूल गई बाप को..

ये सवाल था बाबा नागार्जुन का। नागार्जुन की सबसे बड़ी खासियत उनका निडर स्वभाव था। वे किसी भी सरकार या नेता की आलोचना करने से नहीं हिचकते थे। इमरजेंसी के दौर में इंदिरा गांधी के खिलाफ उनकी कविताओं ने खूब माहौल बनाया। उन्होंने सत्ता के दमन, भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हो रहे हमलों के खिलाफ खुलकर लिखा। इसी की बानगी थी उनकी वो कविता जो उन्होंने पटना के कदमकुआं में आंदोलकारियों के बीच मंच से गाई थी:

इंदु जी क्या हुआ आपको?

सत्ता की मस्ती में

भूल गई बाप को?

इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको?

बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!

क्या हुआ आपको?

क्या हुआ आपको?

आपकी चाल-ढाल देख- देख लोग हैं दंग

हकूमती नशे का वाह-वाह कैसा चढ़ा रंग

सच-सच बताओ भी

क्या हुआ आपको

यों भला भूल गईं बाप को!

छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको

काले चिकने माल का मस्का लगा आपको

किसी ने टोका तो ठस्का लगा आपको

अन्ट-शन्ट बक रही जनून में

शासन का नशा घुला ख़ून में

फूल से भी हल्का

समझ लिया आपने हत्या के पाप को

इन्दु जी, क्या हुआ आपको

बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को...

इस कविता से अंदाजा लगा सकते हैं कि नागार्जुन जैसे कवियों ने कभी भी सत्ता से सवाल पूछने में कंजूसी नहीं बरती। हमेशा गांधी के विचारों पर चलने और रचने वाले भवानी प्रसाद मिश्र ने इमरजेंसी के प्रतिरोध का एक अनोखा रास्ता चुना था। उन्होंने संकल्प लिया कि जब तक आपातकाल रहेगा, वो रोज सुबह, दोपहर और शाम एक-एक कविता लिखकर अपना विरोध दर्ज कराएंगे। उन्होंने अपने इस प्रण को पूरी निष्ठा से निभाया। उस समय लिखी अपनी एक कविता से उन्होंने इंदिरा गांधी और सत्ता के शीर्ष को कुछ यूं धिक्कारा था:

बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले,

उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले

उनके ढंग से उड़े,, रुकें, खायें और गायें

वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं

कभी कभी जादू हो जाता दुनिया में

दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में

ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये

इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गये.

हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में

हाथ बांध कर खड़े हो गये सब विनती में

हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें

पिऊ-पिऊ को छोड़े कौए-कौए गायें

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को

खाना-पीना मौज उड़ाना छुट्भैयों को

कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में

बड़े-बड़े मनसूबे आए उनके जी में

उड़ने तक तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले

उड़ने वाले सिर्फ़ रह गए बैठे ठाले

आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है

यह दिन कवि का नहीं, चार कौओं का दिन है

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना

लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना ?

इमरजेंसी में भवानी प्रसाद मिश्रा ने जितनी भी कविताएं लिखी उसे बाद में 'त्रिकाल संध्या' नाम से प्रकाशित किया गया। उस दौर के बहुत से कवियों को पता था कि अगर इस जोर, जुल्म और अन्याय के खिलाफ उन्होंने अपनी कलम नहीं चलाई तो आने वाली पीढ़ियां उन्हें कभी माफ नहीं करेंगी। तभी गुनाहों का देवता जैसी अमर प्रेम कहानी रचने वाले घर्मवीर भारती के कलम की स्याही भी 'लाल' हो गई थी। उन्होंने इमरजेंसी के खिलाफ ऐसी 'मुनादी' की जिसे आज भी प्रतिरोध का प्रतीक माना जाता है:

ख़ल्क ख़ुदा का, मुलुक बाश्शा का

हुकुम शहर कोतवाल का...

हर खासो-आम को आगह किया जाता है

कि खबरदार रहें

और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से

कुंडी चढ़ाकर बन्द कर लें

गिरा लें खिड़कियों के परदे

और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें

क्योंकि

एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में

सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है...

'मुनादी' शीर्षक से यह कविता बहुत लंबी है और इसके हर एक शब्द से धर्मवीर भारती ने सत्ता को लानतें भेजीं। दुष्यंत कुमार ने तो इमरजेंसी लगाने वालों को शर्मिंदा करने से एक कदम आगे बढ़कर ऐसी हुंकार भरी जो हर विरोध का नारा बन गई। दुष्यंत ने लिखा:

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

हिंदी कवियों के इस तरह के प्रतिरोध ने लोकतंत्र की उस चेतना को जिंदा रखा, जिसकी बदौलत इमरजेंसी का अंत हुआ और जनता ने वोट की चोट से आपातकाल के अपराधियों को सत्ता से बेदखल कर दिया।

आज 51 साल बाद भी आपातकाल को याद कर कहा जाता है कि उस दौर में कुछ मजबूत लोगों को झुकने के लिए कहा गया था, लेकिन वे रेंगने लगे। यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, लेकिन पूरी सच्चाई यह है कि उसी दौर में कई कवि और कलाकार ऐसे भी थे जिन्होंने झुकने से इनकार कर दिया। ये देश की माटी से उपजे कलम के वो कलाकार ही थे जिन्होंने आपातकाल के अंधकार में लोगों को यह भरोसा दिलाया कि सच को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता।

राजनेताओं को तो फिर भी इमरजेंसी के विरोध का राजनीतिक लाभ मिला। वह गाहे बगाहे आज भी उन दिनों की आपबीती सुना सहानुभूति और वोट बटोर लेते हैं। लेकिन इन कवियों को क्या मिला? उन्हें मिला आत्मसंतोष। वो संतुष्ट हुए कि उन्होंने सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ आवाज उठाई। उनका संतोष तो सबसे ज्यादा इस बात से था कि जब लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा था तब उनकी कविताओं ने जनता की आवाज बनकर विरोध किया।

जाते-जाते आपको उसी दौर की एक ऐसी कविता से आपके नजर करते हैं जिसने जनकवि नागार्जुन को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था, लेकिन वो टूटे नहीं। जेल में बंद नागार्जुन ने अपने बुलंद इरादों और धारदार कलम से इंदिरा गांधी के तानाशाही के खिलाफ ये कविता लिख जाली थी:

एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है

आज शायर यह तमाशा देखकर हैरान है,

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए

यह हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है,

एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यों कहो,

इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है

मस्लहत मेज़ होते हैं सियासत के क़दम

तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है,

इस क़दर पाबन्दी ए मज़हब कि सदक़े आपके

जब से आज़ादी मिली है मुल्क़ में रमज़ान है,

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए

मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है,

मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं

हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है

End of Article