Parenting Tips: बच्चा जैसे ही सोफे पर चढ़ता है, तो तुरंत उसे नीचे उतरने को कहा जाता है। वह किचन की तरफ बढ़ता है तो आवाजा आती है- 'उधर मत जाओ।' दीवार पर रंग लगाते समय 'ऐसा बिल्कुल नहीं।' दिनभर में कई माता-पिता अनजाने में अपने बच्चे को दर्जनों बार 'ना' कहते हैं। अब सवाल यह आता है कि क्या हर बार 'ना' कहना वास्तव में बच्चे को अनुशासित बनाता है या फिर धीरे-धीरे उसे जिद्दी, डरपोक या विरोधी स्वभाव का बना सकता है?
बच्चों को कब बोलें 'ना' और कब नहीं
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि बच्चों को सीमाएं सिखाना जरूरी है, लेकिन हर व्यवहार को रोकना नहीं है। आधुनिक पैरेंटिंग (Gentle Parenting) में अब 'Positive Redirection' और 'Yes, And...' जैसी तकनीकों पर जोर दिया जा रहा है, जिनका उद्देश्य बच्चे को सिर्फ रोकना नहीं, बल्कि सही दिशा देना है। आइए जानते हैं बच्चों को कब रोकना सही और कब नहीं....
जब 'ना' जरूरत से ज्यादा हो जाए
बच्चे जन्म से ही जिज्ञासु होते हैं। वे छूकर, देखकर, गिरकर और अनुभव करके सीखते हैं। यदि हर कदम पर उन्हें "ना" सुनने को मिले, तो धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास कम होने लगता है। कई बच्चे अपनी बात कहना छोड़ देते हैं, जबकि कुछ बच्चे इसके उलट हर बात का विरोध करने लगते हैं। लगातार रोक-टोक से बच्चे के मन में यह भावना भी आ सकती है कि उसकी पसंद, सोच या कोशिशों की कोई अहमियत नहीं है। इससे उसकी रचनात्मकता और सीखने की इच्छा भी प्रभावित हो सकती है।
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क्या कहती हैं रिसर्च?
American Academy of Pediatrics (AAP) का कहना है कि छोटे बच्चे अनुभवों के माध्यम से सीखते हैं। यदि उन्हें केवल रोकने के बजाय सुरक्षित विकल्प दिए जाएं, तो वे नियमों को बेहतर ढंग से समझते हैं। वहीं UNICEF भी सकारात्मक संवाद को बच्चों के भावनात्मक विकास के लिए महत्वपूर्ण मानता है।
साइकोलॉजिस्ट का भी मानना है कि, लगातार 'ना' सुनने वाला बच्चा या तो हर बात का विरोध करना शुरू कर देता है या फिर अपनी जिज्ञासा दबा देता है। दोनों ही स्थितियां उसके डेवलेपमेंट के लिए अच्छी नहीं हैं।
Positive Redirection क्या है?
Positive Redirection का मतलब है कि बच्चे के व्यवहार को सिर्फ रोकना नहीं, बल्कि उसे किसी सुरक्षित और स्वीकार्य विकल्प की ओर मोड़ देना है।
उदाहरण के लिए यदि बच्चा दीवार पर क्रेयॉन चला रहा है, तो केवल मत बनाओ कहने के बजाय, "दीवार पर नहीं इस बड़े चार्ट पेपर पर जितनी चाहो ड्राइंग बनाओ।" कहना उचित होगा। इससे बच्चा यह नहीं महसूस करता कि उसकी इच्छा गलत है, बल्कि वह सीखता है कि उसे सही जगह पर कैसे पूरा किया जाए।
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कब 'ना' कहना बिल्कुल जरूरी है
हर बार 'ना' कहना गलत है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यह बच्चे की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी होता है। जब बात बच्चे की जान, स्वास्थ्य या किसी बड़े खतरे की हो, तब स्पष्ट और दृढ़ तरीके से मना करना चाहिए। जैसे सड़क पर अचानक दौड़ना, बिजली के सॉकेट में उंगली डालना, आग या गैस के पास खेलना, किसी नुकीली चीज से खेलना या किसी को मारना जैसी स्थितियों में तुरंत रोकना जरूरी है। ऐसे समय पर बच्चे को केवल मना ही न करें, बल्कि शांत भाषा में यह भी समझाएं कि ऐसा करना क्यों खतरनाक है।
संतुलित पैरेंटिंग ही है सबसे बेहतर तरीका
अच्छी पैरेंटिंग का मतलब हर बात पर रोक लगाना नहीं, बल्कि सही समय पर सही दिशा देना है। जहां सुरक्षा का सवाल हो, वहां स्पष्ट 'ना' जरूरी है। लेकिन जहां बच्चा सीख रहा हो, नई चीजें आजमा रहा हो या अपनी रचनात्मकता दिखा रहा हो, वहां उसे थोड़ा खुला आसमान देना भी उतना ही जरूरी है।
याद रखें, बच्चों को केवल नियम नहीं, भरोसा भी चाहिए। जब माता-पिता हर बात पर रोक लगाने के बजाय समझदारी से सीमाएं तय करते हैं, तो बच्चे न केवल अनुशासित बनते हैं, बल्कि आत्मविश्वासी, जिम्मेदार और भावनात्मक रूप से भी मजबूत बनकर आगे बढ़ते हैं।
