तांडव विवाद के दौरान 'जनता स्‍टोर' की हुई चर्चा, छात्र राजनीति के जरिये खोलती है कच्‍चे चिट्ठे

इस समय जब राजनैतिक पृष्ठभूमि पर बनी तांडव को लेकर सोशल मीडिया पर तांडव हो रहा है ऐसे समय में हम आपको एक अहम पुस्‍तक के बारे में बता रहे हैं जो छात्र राजनीति के बहाने मुख्‍य राजनीति का चिट्ठा खोलती है।

Janta Store Book
Janta Store Book 

Book Review Janta store : इस समय जब राजनैतिक पृष्ठभूमि पर बनी तांडव को लेकर सोशल मीडिया पर तांडव हो रहा है ऐसे समय में हम आपके लिए एक ऐसी किताब के बारे में बता रहे हैं जो कहने को तो छात्र राजनीति की कहानी है मगर यह छात्र राजनीति के जरिये राज्य की राजनीति के भी कच्चे चिट्ठों को बहुत ही प्रामाणिक ढंग से सामने लाती है। राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा नवीन चौधरी का लिखा उपन्यास जनता स्टोर राजस्थान की छात्र राजनीति पर आधारित है। तांडव वेबसीरीज में जिस तरह से छात्र राजनीति और मुख्‍य धारा की राजनीति को प्रदर्शित किया उस दौरान सोशल मीडिया पर इस किताब की खूब चर्चा हो रही थी।

इस उपन्यास की कहानी सन 1995 - 2000 के मध्य की है। यह समय कई कारणों से महत्वपूर्ण है क्योंकि नयी सदी के स्वागत की तैयारी थी, देश और दुनिया में वैचारिक और तकनीकी रूप से बदलाव आ रहे थे। राजस्थान की छात्र राजनीति के लिए यह समय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सन इन 5 सालों में चुनाव जीता हुआ हर छात्रसंघ अध्यक्ष (एक को छोड़) राजस्थान की राजनीति में वैधानिक पद पर पहुंचा। उसके बाद से पिछले 18 सालों में इक्का-दुक्का छात्रसंघ अध्यक्ष ही वैधानिक पद जीत पाये।  

हर शहर का एक मिज़ाज होता है और वो मिज़ाज यूनिवर्सिटी में थोड़ा दिखता है और थोड़ा बदलता है क्योंकि यूनिवर्सिटी राज्य के कई इलाकों के बच्चों को अपने में समेटे रखती है। ये किताब राजस्थान यूनिवर्सिटी के उसी मिज़ाज को दिखाती है जो जयपुर के टुरिस्ट प्लेस वाली छवि से काफी अलग है।

राजस्थान यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति की कहानी होने का ये अर्थ नहीं कि इसका दायरा कहीं सीमित हो जाता है। राजनीति के कुछ दांव-पेंच हमेशा एक से रहते हैं, बस उनका इस्तेमाल का तरीका और समय अपने राज्य और बाकी साधनों के अनुसार थोड़ा सा इधर उधर होता है। जनता स्टोर राजनीति की उन्हीं तहों को उधेड़ती है जहाँ ऊपर से सब सामान्य दिखता है पर अन्दर हलचल मची होती है।  

जनता स्टोर जहां एक तरफ छात्र राजनीति की कहानी बताती है वहीं साथ-साथ राज्य में चल रहे घटनाक्रमों पर भी नजर डालती है। कहानी का मुख्य पात्र मयूर भारद्वाज और कहानी का सूत्रधार अरुण कुमार गुप्ता जो मयूर के स्कूल का दोस्त भी है वो इस कहानी को लेकर आगे बढ़ते हैं और राजनीति के गलियारों की सैर कराते हुए कई गुप्त रहस्य पाठकों को दिखाते हैं। जहाँ एक तरफ छात्र नेता राघवेंद्र शर्मा और सुरेश विजय के बीच पार्टी से छात्रसंघ अध्यक्ष पद का टिकट लेने की गणित चल रही है तो वहीं दूसरी तरफ राज्य के मुख्यमंत्री राज्येश सिंह राठौड़ और शिक्षा मंत्री  सिकंदर बेनीवाल के बीच एक दूसरे को नीचे गिराने की साजिशें हैं। मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री के पास एक दूसरे से लड़ने के लिए मौजूद कई हथियारों और मोहरों में से एक राजस्थान विश्वविद्यालय और उसके छात्र नेता भी है जिनका दोनों अपने-अपने तरीके से अपनी राजनीति साधने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

कई पात्र और घटनाएं होने के बावजूद राजनैतिक परिदृश्य को इस बारीकी से बुना गया है कि इसमें दिखाई कोई भी घटना असंभव नहीं दिखती और धीरे-धीरे छोटी-छोटी इन घटनाओं का प्रभाव बड़े परिदृश्य में दिखता है। जनता स्टोर के लेखक नवीन चौधरी एक व्यंग्यकार भी हैं और उन्होने जातिगत राजनीति को लेकर कई व्यंग्य रचे हैं मगर उनकी खूबसूरती यह है कि ये व्यंग्य चुभते तो हैं लेकिन किसी का भी न अपमान करते हैं न ही किसी जाति की भावनाओं को आहत करते हैं! राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह उपन्यास पढ़ते वक़्त पाठक को एक थ्रिलर का अनुभव देता है जहां बहुत तेजी से घटती घटनाएंं हैं और चौंकाने वाला अंत।

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