WD 1856b Planet: अनंत ब्रह्मांड में मौजूद असंख्य आकाशगंगाओं में से एक हमारी आकाशगंगा मिल्की वे का वो तारा, जो हमें जीवन मुहैया कराता है, वो एक दिन बुझ जाएगा। वैज्ञानिकों की गणना के मुताबिक, जब किसी तारे का परमाणु ईंधन खत्म हो जाता है तो वह कई गुना फैलकर रेड जायंट बन जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे अपनी बाहरी परतों को भी अंतरिक्ष में छोड़ देता है, जिसके बाद उसका केंद्रीय हिस्सा सिकुड़कर व्हाइट ड्वार्फ बन जाएगा।
हमारा सूर्य भी इसी प्रक्रिया से गुजरेगा, लेकिन आपको अभी घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वैज्ञानिक गणनाओं के मुताबिक, सूर्य लगभग 5 अरब साल बाद इस प्रक्रिया से गुजरेगा। वैज्ञानिकों का तो यहां तक मानना है कि जब सूर्य रेड जायंट बनेगा तो बुध और शुक्र पूरी तरह से तबाह हो जाएंगे, लेकिन जुपिटर और शनि जैसे बाहरी ग्रहों के बचने की संभावना काफी अधिक मानी जा रही है।
पृथ्वी का क्या होगा?
हालांकि, पृथ्वी का भविष्य अभी भी निश्चित नहीं हैं। कुछ मॉडल ऐसा बताते हैं कि पृथ्वी भी सूर्य में समा सकती है, जबकि कई मॉडलों के मुताबिक, पृथ्वी किसी प्रकार बच जाएगी, लेकिन अगर पृथ्वी बच भी गई तो सूर्य के द्रव्यमान में भारी कमी आने से पूरे सौरमंडल की गुरुत्वाकर्षण व्यवस्था बदल जाएगी और ग्रहों की कक्षाएं बाहर की ओर खिसक सकती हैं। इसलिए इस पर पुख्ता तौर पर कुछ भी कह पाना फिलहाल मुमकिन नहीं है।
white dwarf star
ऐसी ही एक नई थ्योरी सामने आई है, जो ग्रहों को नए जीवन मिलने की उम्मीद पैदा करती है। अंतरिक्ष में कई ऐसे भी ग्रह हैं, जो व्हाइट ड्वार्फ यानी मृत तारों की परिक्रमा भी करते हैं। वैज्ञानिक ऐसे ग्रहों को बेहद खास मानते हैं। दरअसल, वैज्ञानिकों ने जेम्स वेव स्टेस टेलीस्कोप (JWST) की मदद से पहली बार व्हाइट ड्वार्फ की परिक्रमा करने वाले WD 1856b ग्रह के वातावरण का विस्तृत अध्ययन किया।
हैरान कर देने वाले खुलासे
नेचर जर्नल में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक, जब टीम ने JWST से मिले स्पेक्ट्रम का विश्लेषण किया तो नतीजे बिल्कुल अप्रत्याशित थे। इसका अध्ययन ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट एंड्रयूज के खगोलविद रयान मैकडोनाल्ड की टीम ने किया। दरअसल, वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि WD 1856b ग्रह का तापमान जरूरत से ज्यादा ठंडा होगा। कुछ-कुछ -113 डिग्री सेल्सियस के आसपास हो सकता है, जो आकार और कक्षा के लिहाज से जुपिटर जैसा माना जा रहा था, लेकिन स्टडी में उसका वास्तविक तापमान सामने आया।
WD 1856b ग्रह का तापमान -113 डिग्री सेल्सियस नहीं, बल्कि 126 डिग्री सेल्सियस निकला, जो वैज्ञानिकों की परिकल्पना से एकदम उलट था। रयान मैकडोनाल्ड ने कहा कि उन्हें समझ नहीं आया कि एक ऐसे पुराने और ठंडे व्हाइट ड्वार्फ की परिक्रमा करने वाला ग्रह इतना गर्म कैसे हो सकता है, जबकि उसका मूल तारा लगभग 5.4 अरब वर्ष पहले ही मर चुका है।
क्यों खास है WD 1856b ग्रह?
WD 1856b ग्रह पृथ्वी से लगभग 82 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है और सबसे मजेदार बात तो यह है कि WD 1856b जिस व्हाइट ड्वार्फ की परिक्रमा करता है, उससे लगभग सात गुना बड़ा है।
आमतौर पर किसी ग्रह के वातावरण का अध्ययन तब किया जाता है जब वह अपने तारे के सामने से गुजरता है और तारे की रोशनी उसके वातावरण से होकर पृथ्वी तक पहुंचती है, लेकिन इस मामले में स्थिति बिल्कुल अलग थी, क्योंकि व्हाइट ड्वार्फ का आकार ग्रह से बहुत छोटा है। वैज्ञानिकों को इस अनोखी प्रणाली का अध्ययन करने के लिए नए मॉडल विकसित करने पड़े और JWST के डेटा का विश्लेषण करने का तरीका भी बदलना पड़ा।
WD 1856b Planet
जुपिटर से छोटा निकला ग्रह
हालिया अध्ययन में एक बार और सामने आई कि WD 1856b ग्रह आकार में जुपिटर से थोड़ा छोटा जरूर है, लेकिन उसका द्रव्यमान जुपिटर से लगभग सात गुना ज्यादा है। ऐसा माना जा रहा है कि यह ग्रह अपने मूल तारे के व्हाइट ड्वार्फ बनने के काफी समय बाद दोबारा गर्म हुआ होगा।
भविष्य में और खोजों की जरूरत
इस खोज से एक बार तो सिद्ध हो गई कि अभी किसी भी निष्कर्ष पर निकलना जल्दबाजी होगा। वैज्ञानिक भले ही दूरस्थ ब्रह्मांड में झांकने की कोशिशें करते हैं, लेकिन इसके बावजूद ब्रह्मांड के बारे में बहुत कम जानते हैं। ऐसे में पृथ्वी का भविष्य क्या होगा? इसके लिए व्हाइट ड्वार्फ और रेड जायंट से जुड़े तारों के आसपास के ग्रहों के बारे में और शोध किए जाने की जरूरत है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह इस बात का प्रमाण है कि किसी तारे की मृत्यु के बाद भी उसके ग्रहों का विकास पूरी तरह समाप्त नहीं होता। वे नई परिस्थितियों में दोबारा सक्रिय हो सकते हैं और उनके वातावरण में बड़े बदलाव आ सकते हैं। नेचर जर्नल में प्रकाशित यह शोध इस बात की ओर इशारा करती है कि किसी तारे की मृत्यु के बाद उसके ग्रहों की अंत नहीं हो जाता, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत भी हो सकती है।
