Science News: कल्पना कीजिए कि आप मंगल ग्रह पर उतरने वाले चौथे मानव मिशन का हिस्सा हैं। आपको लाल ग्रह पर बसने वाली पहली स्थायी मानव बस्ती के लिए भोजन का इंतजाम करने की जिम्मेदारी दी गई है। पृथ्वी से लाखों किलोमीटर दूर भोजन पहुंचाना न केवल बेहद महंगा है, बल्कि बेहद पेचीदा भी है। लेकिन अब मंगल की पथरीली जमीन पर खुद फसल उगाई जा सकती है। ये तो फिलहाल किसी साइंस फिक्शन कहानी की तरह लगने वाली बात है लेकिन अमेरिकी और ब्राजीलियाई वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी ने इस सवाल का बेहद चौंकाने वाला और उम्मीद जगाने वाला जवाब दिया है, और वो है फंगस यानी फफूंद।
मंगल पर फसल उगाने की खुली राह
हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका 'फ्रंटियर्स इन एस्ट्रोनॉमी एंड स्पेस साइंसेज' (Frontiers in Astronomy and Space Sciences) में प्रकाशित एक रिव्यू में शोधकर्ताओं ने विस्तार से बताया है कि कैसे विशेष प्रकार के फायदेमंद फंगस चंद्रमा और मंगल ग्रह की बेजान मिट्टी को उपजाऊ बनाकर वहां फसलें उगाने में मदद कर सकते हैं।
मंगल की बंजर मिट्टी में क्या है सबसे बड़ी चुनौती?
चांद और मंगल ग्रह की सतह पर पाई जाने वाली मिट्टी को 'रेगोलिथ' (Regolith) कहा जाता है। धरती की मिट्टी की तुलना में रेगोलिथ पौधों के फलने-फूलने के लिए एक बेहद कठिन वातावरण है। पौधों को बढ़ने के लिए मुख्य रूप से तीन पोषक तत्वों, नाइट्रोजन, पोटेशियम और फास्फोरस की सख्त जरूरत होती है। रेगोलिथ में इनकी अत्यधिक कमी होती है। अत्यधिक ठंड, जहरीले रसायन और पोषक तत्वों की कमी पौधों के लिए भारी तनाव पैदा करती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल कृत्रिम खाद देकर इस मिट्टी में पौधे नहीं उगाए जा सकते, जब तक कि मिट्टी की जैविक संरचना को बेहतर न बनाया जाए।
फंगस कैसे करेगा मदद
पृथ्वी पर फंगस पोषक चक्र को बनाए रखने और पेड़-पौधों की जड़ों तक जरूरी पोषण पहुंचाने का काम करते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि यही 'फायदेमंद फंगस' अंतरिक्ष में भी पौधों के लिए सुरक्षा कवच बन सकते हैं। शोध में विशेष रूप से 'आर्बुस्कुलर माइकोराइजल फंगस' (Arbuscular Mycorrhizal Fungi - AMF) और 'ट्राइकोडर्मा' (Trichoderma) जैसी प्रजातियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
रेगोलिथ Vs फंफूद से तैयार हुआ सब्सट्रेट (AI Created Graph)
पौधों की जड़ों का 'माइक्रोस्कोपिक विस्तार'
AMF 19वीं शताब्दी के मध्य से ही वनस्पति विज्ञान में जाने जाते हैं। यह फंगस पौधों की जड़ों के साथ एक बेहद करीबी और सहजीवी रिश्ता बनाते हैं। यह सूक्ष्मदर्शीय रेशों (Hyphae) का एक नेटवर्क फैलाते हैं, जो पौधों की जड़ों के लिए एक अदृश्य विस्तार की तरह काम करते हैं। इससे पौधे बंजर मिट्टी में भी दूर-दूर तक फैले पोषक तत्वों को आसानी से खींच पाते हैं। यह अजैविक तनाव को कम करते हैं और मिट्टी की भौतिक व रासायनिक संरचना में सुधार लाते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से जगी आशा
इस स्टडी में उन फंगल प्रजातियों का भी विश्लेषण किया गया जिनका उपयोग पहले अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर किया जा चुका है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ये सूक्ष्मजीव न केवल कठोर वातावरण में जीवित रहने में सक्षम हैं, बल्कि वे पौधों के बायोम (Microbiome) को मजबूत बनाकर उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाते भी हैं।
शोध के निष्कर्षों में कहा गया है कि चांद या मंगल ग्रह की रेगोलिथ-आधारित कृषि प्रणालियों में पौधे के विकास को बढ़ावा देने वाले फंगस को शामिल करना अंतरिक्ष फसल उत्पादन के लिए एक रणनीतिक प्रगति होगी। ट्राइकोडर्मा और AMF जैसे सूक्ष्मजीव अजैविक तनाव को दूर करने, आवश्यक पोषक तत्वों को गति देने और रेगोलिथ की संरचना में सुधार करने की अपार क्षमता रखते हैं।
अभी कितनी बाकी है मंजिल?
वैज्ञानिकों का मानना है कि वास्तविक अंतरिक्ष कृषि प्रणाली में इसका इस्तेमाल करने से पहले अभी कई प्रयोगों की आवश्यकता है। अब तक अधिकांश प्रयोग सिम्युलेटेड यानी बनावटी रेगोलिथ या अन्य विकल्पों पर किए गए हैं। भविष्य के अध्ययनों में वास्तविक चंद्र और मंगल ग्रह की मिट्टी के नमूनों के साथ फंगस के प्रदर्शन का परीक्षण करना होगा। यदि यह रणनीति सफल होती है, तो भविष्य के अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा और मंगल पर ही अपनी ताजी सब्जियां और अनाज उगा सकेंगे, जिससे पृथ्वी से भोजन भेजने की निर्भरता खत्म हो जाएगी। भले ही मंगल ग्रह पर हमारे अपने खेतों का सपना साकार होने में कुछ दशक बाकी हों, लेकिन इस शोध ने यह साबित कर दिया है कि ब्रह्मांड में मानव जीवन के विस्तार की चाबी पृथ्वी के ही छोटे-छोटे सूक्ष्मजीवों के हाथों में छिपी हो सकती है।
