Bangladesh Coup: पड़ोसी देश बांग्लादेश का एक बार फिर अपने अतीत से सामना हुआ है। महीनों से चल रहा आरक्षण विरोधी प्रदर्शन सोमवार को हिंसक हो गया। हिंसक माहौल के बीच शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर अपना देश छोड़ना पड़ा। ढाका से सैन्य हेलीकॉप्टर में निकलीं शेख हसीना हिंडन एयरपोर्ट पहुंची, जहां पर उन्होंने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजिल डोवाल से मुलाकात की।
शेख हसीना
बांग्लादेश में तख्तापलट
यूं तो बांग्लादेश में पहली बार तख्तापलट नहीं हुआ है, इससे पहले भी पड़ोसी देश में कई बार राजनीति का खूनी खेल देखा है। हालांकि, आखिरी बार साल 2008 में शेख हसीना की पार्टी ने चुनावों में शानदार जीत दर्ज की और तब से लेकर अबतक उन्होंने प्रधानमंत्री पद के दायित्वों का निर्वहन किया। हालांकि, शेख हसीना को इस बार सैन्य तख्तापलट की भनक तक नहीं लगी और देश को संबोधित तक करने का समय नहीं मिला।
शेख हसीना के देश छोड़ने की खबरों के साथ ही प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री आवास में धावा बोला और लूटपाट के साथ जमकर तोड़फोड़ की। बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान के स्टैच्यू पर हथौड़े चलाए गए और उसे तोड़ने की कोशिश की गई।
बांग्लादेश में हिंसक प्रदर्शन
बंगबंधु की हत्या
भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के बाद 1971 में बांग्लादेश एक नए राष्ट्र के रूप में उभरा। बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान देश के पहले प्रधानमंत्री बने और फिर 1975 में वह देश के राष्ट्रपति बने, लेकिन तबतक सेना के कुछ लोगों के भीतर असंतोष अपने चरम पर पहुंच गया और उन्होंने शेख मुजीबुर रहना की सैन्य तख्तापलट में हत्या कर दी। इस दौरान उनके परिवार को भी नहीं छोड़ा गया। गनीमत रही कि बेटी शेख हसीना और शेख रिहाना बांग्लादेश में मौजूद नहीं थी। जिसके चलते उनकी जान बच गई।
सरकारी गेस्ट हाउस में खूनी खेल
1975 के बाद 1981 में बांग्लादेश ने एक बार फिर सत्ता का खूनी खेल देखा। बांग्लादेश के अस्तित्व में आए लगभग 10 साल ही हुए थे कि देश ने दूसरा तख्तापलट देखा। चटगांव शहर के एक सरकारी गेस्ट हाउस में 30 मई, 1981 को तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या कर दी गई। इसके बाद अब्दुल सत्तार ने अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला था। उस वक्त अब्दुल सत्तार को जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद ने अपना समर्थन दिया था। हालांकि, एक साल बाद 1982 में जनरल हुसैन ने तख्तापलट कर सत्तार को सत्ता से उखाड़ फेंका और मार्शल लॉ लागू कर दिया।
पहला स्वतंत्र चुनाव
बांग्लादेश में साल 1991 में बांग्लादेश में लोकतंत्र लौटा और पहली बार स्वतंत्र चुनाव हुए। हालांकि, सेना का हस्तक्षेप नहीं रुका। इस चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को कामयाबी मिली और खालिदा जिया देश की पहली महिला प्रधानमंत्री चुनी गईं। हालांकि, 1996 में आवामी लीग ने बीएनपी को चुनावी शिकस्त दी और सत्ता शेख हसीना के पास चलकर आई।
2007 का सैन्य तख्तापलट
साल 2007 में सैन्य तख्तापलट हुआ और कार्यवाहक सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चलाकर शेख हसीना और खालिदा जिया दोनों को ही जेल में डाल दिया, लेकिन 2008 में रिहाई हो गई। इसके बाद दिसंबर 2008 में हुए राष्ट्रीय चुनाव के साथ ही सैन्य शासन का अंत हुआ और शेख हसीना ने चुनावों में जीत दर्ज कर सत्ता संभाली।
बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान
अंतरिम सरकार संभालेगी कार्यभार
शेख हसीना के बांग्लादेश छोड़ने के बाद सेना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है और अब अंतरिम सरकार कार्यभार संभालेगी। सेना प्रमुख ने कहा कि उन्होंने राजनीतिक नेताओं से मुलाकात की और उन्हें बताया कि सेना कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालेगी।
