India tiger population: भारत में बाघों (Tigers) को बचाने की मुहिम कागजों और आंकड़ों में जितनी शानदार दिखती है, जमीन पर उसकी हकीकत उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय और राजस्थान वन विभाग ने अलवर के सरिस्का टाइगर रिजर्व (Sariska Tiger Reserve) में बाघों को फिर से बसाने की 18वीं सालगिरह मनाई। अरावली की पहाड़ियों में बसा सरिस्का वही रिजर्व है, जिसने एक समय अपने सभी बाघ खो दिए थे।
इस मौके पर केंद्र सरकार ने दो बेहद महत्वपूर्ण आकलन जारी किए हैं। सरकार का साफ मानना है कि अब समय सिर्फ 'बाघों की गिनती' करने का नहीं है, बल्कि उन नेशनल पार्कों और रिजर्वों पर ध्यान केंद्रित करने का है जहां बाघों की संख्या शून्य या बेहद कम हो चुकी है।
विरोधाभास: आंकड़े बढ़ रहे हैं, लेकिन कुछ ही इलाकों में सिमटे
देश में बाघों की कुल आबादी लगातार बढ़ रही है। साल 2006 में जहां सिर्फ 1,411 बाघ बचे थे, वहीं 2022 के आंकड़ों के मुताबिक 58 टाइगर रिजर्व की 85,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर 3,682 बाघ मौजूद हैं। सालाना 6 फीसदी की दर से यह ग्रोथ हो रही है, लेकिन यह पूरी कहानी नहीं है:
असंतुलन का खतरा: भारत के कुल 58 टाइगर रिजर्व में से सिर्फ 10-12 रिजर्व ऐसे हैं, जहां देश के कुल बाघों की 36% आबादी रहती है। इन्हें 'सोर्स पापुलेशन' कहा जाता है, जैसे कॉर्बेट, बांदीपुर और काजीरंगा।
खाली होते जंगल: दूसरी तरफ, 12 ऐसे रिजर्व हैं जहां 3 से भी कम बाघ बचे हैं। इनमें से तीन रिजर्व- कवल (Kawal), कमलांग (Kamlang) और डम्पा (Dampa)-में तो बाघों की संख्या इस समय बिल्कुल शून्य (Zero) है।
'ओवरलोड' रिजर्व और इंसानों से बढ़ता टकराव
जब किसी एक रिजर्व में बाघों की संख्या उसकी क्षमता से ज्यादा हो जाती है, तो वे नए इलाकों की तलाश में जंगल के किनारों या कृषि क्षेत्रों की तरफ भागते हैं। इसके कारण दो बड़े खतरे पैदा हो रहे हैं:
मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict): आबादी वाले इलाकों में जाने से बाघों का इंसानों और मवेशियों से टकराव बढ़ रहा है।
हादसों में मौत: जंगलों के बीच से गुजरने वाले रेलवे ट्रैक, चौड़े हाईवे और नहरों को पार करते समय बड़ी संख्या में बाघ हादसों का शिकार होकर दम तोड़ रहे हैं।
इसके विपरीत, जिन जंगलों में बाघ नहीं हैं (जिन्हें 'सिंक पापुलेशन' कहा जाता है), वहां जंगल तो हरे-भरे हैं लेकिन बाघों के लिए 'शिकार' यानी भोजन की भारी कमी है। यह दोनों ही स्थितियां बाघों के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए खतरनाक हैं।
देश में बाघों की कुल आबादी लगातार बढ़ रही
सरकार का एक्शन प्लान
इस असंतुलन को ठीक करने के लिए नेशनल टाइगर कन्जर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) ने मिलकर एक नया 'इंडेक्स' तैयार किया है। इसके तहत 25 ऐसे टाइगर रिजर्व की पहचान की गई है जो इस समय गहरे तनाव (Under Stress) में हैं- यानी जहां या तो शिकार कम है, या जंगल का तालमेल खराब है, या फिर बाघों का आना-जाना रुक गया है।
25 रिजर्व में प्राथमिकता: सरकार इन प्रभावित रिजर्वों में शिकार (शाकाहारी जानवरों) की संख्या बढ़ाने, इंसानी दखल कम करने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने पर काम करेगी।
बाघों का ट्रांसफर: जहां बाघों की संख्या बहुत ज्यादा है, वहां से बाघों को इन खाली पड़े या कम आबादी वाले रिजर्वों में शिफ्ट (Reintroduce) किया जाएगा, बशर्ते वहां का माहौल सुरक्षित हो।
कॉरिडोर कनेक्टिविटी: अलग-अलग जंगलों को आपस में जोड़ने वाले रास्तों (Corridors) को सुरक्षित किया जाएगा ताकि बाघ बिना किसी डर के एक राज्य से दूसरे राज्य के जंगलों में आ-जा सकें और उनका जेनेटिक एक्सचेंज बेहतर हो सके।
अतीत के सबक: हर जगह कामयाब नहीं होता 'रीइंट्रोडक्शन'
सरकार ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि बाघों को किसी नए जंगल में छोड़ना हमेशा आसान नहीं होता और इसे बिल्कुल 'आखिरी रास्ते' के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
सफलता: सरिस्का (2005) और पन्ना (2009) में बाघों को दोबारा बसाने का प्रयोग दुनिया का सबसे सफल वैज्ञानिक प्रयोग माना जाता है।
विफलता: ओडिशा के सतकोसिया (Satkosia) में यह प्रोजेक्ट फेल हो गया क्योंकि स्थानीय समुदायों ने इसका विरोध किया और 2018 में कान्हा से लाए गए एक बाघ की फंदे में फंसकर मौत हो गई। राजस्थान के मुकुंदरा हिल्स में भी बेहद धीमी प्रगति देखी गई है।
निष्कर्ष: सरकार का पूरा ध्यान अब मध्य भारत, पूर्वी घाट और पूर्वोत्तर की पहाड़ियों के उन जंगलों को दोबारा जिंदा करने पर है, जो कभी बाघों की दहाड़ से गूंजते थे। जब तक इन संघर्ष कर रहे रिजर्वों को शिकार और सुरक्षा से मजबूत नहीं किया जाएगा, तब तक भारत में बाघों का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।
