Wild Fire: दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित कई राज्य हीटवेव से परेशान हैं और प्री-मानसून की बारिश से फौरी राहत जरूर मिली है, लेकिन हीटवेव के चलते राहत की सांस लेने के लिए लोग पहाड़ों का रुख लगातार कर रहे हैं। पहाड़, जो कभी सैलानियों को ठंडक मुहैया कराते हैं, वो खुद धधक रहे हैं। वहां के जंगलों में भीषण आग लगी हुई है। अप्रैल, मई के महीनों ने देश के कई राज्यों के जंगल धधकने लगते हैं और इसकी लगातार रिपोर्ट्स सामने आती रही हैं।
धुएं का उठ रहा गुबार
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के जंगलों में आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। कई किलोमीटर तक फैले जंगल धू-धूकर जल रहे हैं, वन्यजीवों पर खतरा मंडरा रहा है और करोड़ों रुपये की वन संपदा राख हो रही है। ऐसा कोई पहली दफा नहीं हो रहा, बल्कि हर साल की यही कहानी है। गर्मी के दिनों में जब कभी आप इन राज्यों का सफर करते हैं तो आप धुएं के उठते हुए गुबार देखते ही होंगे।
सिस्टम पर उठते सवाल
हर साल हजारों हेक्टेयर जंगल तड़प-तड़प कर दम तोड़ देते हैं और दिखता है तो सिर्फ मलबा... ऐसे में सिस्टम पर सवाल तो खड़ा होता ही है कि क्या यह महज प्राकृतिक आपदा है या सिस्टम का फेल्योर? क्योंकि हर साल ऐसी घटनाएं लगातार होती हैं।
वन विभाग की तैयारियों पर उठ रहे सवाल
पिछले कुछ दिनों से हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के कई जिलों में जंगलों में आग की घटनाएं सामने आई हैं। इन घटनाओं ने प्रशासन और वन विभाग की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
Wild Fire
जल रहे हिमाचल के जंगल
हिमाचल के कसौली से रिपोर्ट्स सामने आईं, जहां पर भारतीय सेना के संयुक्त प्रयासों की बदौलत आग पर काबू पाया गया। कसौली के पश्चिमी ढलानों पर स्थित गिल्बर्ट ट्रेल और अपर मॉल क्षेत्र के जंगल लगभग 15 घंटे तक धधकते रहे और लपटें सैन्य ठिकानों व रिहायशी इलाकों तक पहुंच गईं। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए भारतीय सेना को मोर्चा संभालना पड़ा।
हिमाचल के निचले और मैदानी इलाकों में चीड़ के जंगल अधिक हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, चीड़ की सूखी पत्तियां तुरंत आग पकड़ती हैं और इसकी वजह से देखते ही देखते आग का दायरा भी बढ़ने लगता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, राज्य में इस साल अब तक 232 छोटी-बड़ी जंगली आग की घटनाएं दर्ज की गई हैं। करीब 2900 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुए हैं और लगभग 67 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। सबसे ज्यादा घटनाएं मंडी, धर्मशाला, शिमला और सोलन जिलों में सामने आई हैं।
हर साल जलता है उत्तराखंड!
उत्तराखंड से लगभग हर साल जंगलों में आग लगने की घटनाएं सामने आती हैं। मौजूदा हालातों की बात करें तो उत्तरकाशी के जंगलों में लगी आग गंगोत्री हाईवे तक जा पहुंची। इसके अलावा चमोली, देहरादून और पौड़ी जिलों में भी जंगली आग की घटनाएं दर्ज की गई हैं।
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आग पर काबू पाने की हो रही कोशिशें
समाचार एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक, सिविल सोयम वन प्रभाग के डीएफओ प्रदीप कुमार ने लोगों से सावधानी बरतने की अपील की है। उन्होंने बताया कि पिछले दो-तीन दिनों से तापमान में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है, जिसकी वजह से जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी बढ़ गई हैं। हालांकि, शुक्रवार को हुई थोड़ी बारिश से तापमान में करीब एक डिग्री की गिरावट आई है और कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन अभी भी गर्मी और सूखे की स्थिति बनी हुई है। इसी वजह से आग लगने का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
डीएफओ ने बताया कि उनके पास कुल 51 अलर्ट प्राप्त हुए थे, जिनमें से तीन से चार जगहों पर आग लगने से वन क्षेत्र को थोड़ा नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि लगभग तीन हेक्टेयर क्षेत्र में आग की वजह से असर पड़ा है, लेकिन फॉरेस्ट विभाग की टीम ने तेजी से कार्रवाई करते हुए आग पर काबू पा लिया। उन्होंने बताया कि वन विभाग का पूरा स्टाफ लगातार अलर्ट मोड पर काम कर रहा है। जहां भी आग लगने की सूचना मिलती है, वहां तुरंत टीम भेजकर आग बुझाने का काम किया जाता है।
जम्मू-कश्मीर के जंगल भी धधक रहे
जम्मू-कश्मीर के उधमपुर का नर्थन क्षेत्र, राजौरी जिले का नौशेरा और रामबन जिले से जंगलों में आग की रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं। नौशेरा क्षेत्र में धधक रही आग से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल भी हुआ, जिसमें जंगल का एक बड़ा हिस्सा आग की लपटों में घिरा हुआ दिखाई दिया, जबकि बैकग्राउंड में मोर सहित अन्य पक्षियों की संकटपूर्ण आवाजें सुनाई दीं। हालांकि, टाइम्स नाउ नवभारत इस वीडियो की पुष्टि नहीं करता है, लेकिन इस वीडियो के सामने आने के बाद निवासियों और पर्यावरणविदों के बीच व्यापक चिंता पैदा हो गई, जिन्होंने अधिकारियों से वन्यजीवों को बचाने और आग को जल्द से जल्द बुझाने के प्रयासों को तेज करने का आग्रह किया है।
अधिकारियों ने बताया कि आग ने वृक्षारोपण और अन्य वन संपदा के बड़े क्षेत्रों को नष्ट कर दिया है जिससे व्यापक पारिस्थितिक क्षति हुई है। हालांकि, आग लगने का सटीक कारण अभी तक पता नहीं चल पाया है।
जंगलों में क्यों लगती है आग?
जंगलों में बार-बार लगने वाली आग के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण जिम्मेदार होते हैं। गर्मी के दिनों में तापमान लगातार बढ़ता है और सूखी वनस्पतियों के कारण जंगल बेहद संवेदनशील हो जाते हैं। खासकर चीड़ जैसे पेड़ों की सूखी पत्तियां बहुत जल्दी आग पकड़ लेती हैं, जिससे आग तेजी से फैलती है। तेज हवाएं आग को कई किलोमीटर तक पहुंचा देती हैं।
लेकिन सिर्फ मौसम की वजह से ही आग नहीं लगती है, बल्कि इंसानी लापरवाही भी इसके पीछे मुख्य कारण रही है। जंगलों के पास जलती बीड़ी-सिगरेट फेंकना, सूखी घास में आग छोड़ देना, पिकनिक या कैंपिंग के बाद आग पूरी तरह न बुझाना जैसी छोटी लापरवाहियां बड़ी आग में बदल जाती हैं।
जंगलों में चल रहा अवैध कटाई का गंदा खेल!
इसके अलावा कुछ जगहों पर अवैध कटाई, जमीन कब्जाने या लकड़ी माफिया की गतिविधियों को लेकर भी आरोप लगते रहे हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का दावा है कि कई बार जंगलों में जानबूझकर आग लगाई जाती है ताकि जले हुए पेड़ों को काटना आसान हो जाए या अवैध गतिविधियों के सबूत मिटाए जा सकें।
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के मुताबिक, कई जगह पहले जंगल में आग लगती है, फिर जले हुए पेड़ों को 'खतरनाक' बताकर काट दिया जाता है। बाद में उन्हीं इलाकों में सड़क, रिसॉर्ट या दूसरे प्रोजेक्ट शुरू हो जाते हैं।
पहले से अलर्ट क्यों नहीं रहती हैं सरकारें
सालाना हजारों हेक्टेयर जंगल जलकर राख हो जाते हैं? ऐसे में इस सवाल का उठना एकदम लाजिमी है कि राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन पहले से ही पर्याप्त तैयारियों क्यों नहीं रखती हैं? हालांकि, ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारें लगातार कोशिशें कर रही हैं, लेकिन उनकी कोशिशें पर्याप्त साबित नहीं हो रही हैं, तभी तो जंगलों में आग की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं।
सरकारें अक्सर भीषण गर्मी और सूखे को जंगल का दुश्मन बताती रही हैं, लेकिन सवाल तो यह भी उठता है कि अगर यह सिर्फ प्राकृतिक हादसा है तो हर साल वही इलाके क्यों जलते हैं? और करोड़ों के टेंडर क्यों जारी होते हैं?
कई मामलों में जांच एजेंसियों और स्थानीय स्तर पर ऐसे आरोप सामने आए हैं कि पुराने उपकरणों को नया दिखाकर बिल पास कराए गए हैं। रिकॉर्ड में फायर लाइन बनाई गई, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका कोई अस्तित्व ही नहीं था। ऐसे आरोप गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
जवाबदेही तय करने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगल की आग के पीछे कई कारण हो सकते हैं, लेकिन जरूरी है कि हर बड़ी आग की निष्पक्ष जांच हो, खर्च किए गए बजट का ऑडिट हो और स्थानीयों को निगरानी तंत्र में शामिल किया जाए। विशेषज्ञों का लगता है कि जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक जंगल की आग पूरी तरह शांत नहीं हो सकती है।
