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कौन थे सज्जन कुमार, जाट समाज के प्रभावशाली नेता, जो 25 साल तक 1984 के दंगों के आरोपों से अछूते रहे, फिर जाना पड़ा तिहाड़

Sajjan Kumar Passed Away: पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का निधन। जानिए दिल्ली की राजनीति में जाट नेता के रूप में उनका प्रभाव और 1984 सिख विरोधी दंगे से जुड़ा उनका पूरा इतिहास।

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कौन थे सज्जन कुमार, जाट समाज के प्रभावशाली नेता, जो 25 साल तक 1984 के दंगों के आरोपों से अछूते रहे,फिर जाना पड़ा तिहाड़

Who is Sajjan Kumar: 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार का तिहाड़ जेल में स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद सफदरजंग अस्पताल में निधन हो गया। दिल्ली के राजनीतिक इतिहास में सज्जन कुमार एक ऐसे कद्दावर जाट नेता के रूप में जाने जाते थे, जिनका बाहरी दिल्ली के ग्रामीण और झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में एकछत्र प्रभाव था। 1984 के भीषण दंगों में नाम आने और गंभीर आरोपों के बावजूद वे लगभग 25 सालों तक कानूनी शिकंजे और राजनीति से अछूते रहे, लेकिन अंततः अदालत के कड़े फैसलों ने उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया।

स्थानीय पार्षद से संसद तक: ऐसा रहा राजनीतिक सफर

सज्जन कुमार का राजनीतिक सफर जमीन से जुड़े संगठनकर्ता के रूप में शुरू हुआ था।

राजनीतिक शुरुआत: 1970 के दशक में उन्होंने दिल्ली नगर निगम (MCD) के पार्षद के रूप में अपने करियर की शुरुआत की।

संसद में प्रवेश: वर्ष 1980 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बाहरी दिल्ली सीट से दिग्गज नेता चौधरी ब्रह्म प्रकाश को हराकर पहली बार संसद में कदम रखा। इसके बाद वे 1991 और 2004 में भी इसी सीट से बड़े अंतर से जीतकर लोकसभा पहुंचे।

जाट और ओबीसी वोट बैंक पर पकड़: बाहरी दिल्ली की व्यापक ग्रामीण सीमाओं में जाट समुदाय, यादवों और झुग्गी बस्तियों के मतदाताओं के बीच उनका सीधा संवाद और मजबूत पकड़ थी।

1984 के दंगे, 25 साल का बचाव और अंततः जेल का रास्ता

1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों में दिल्ली के राजनगर और कैंट इलाकों में हुई हिंसा में सज्जन कुमार का नाम मुख्य आरोपियों में आया।

दशकों तक राहत: पुलिस जांच और शुरुआती अदालती कार्यवाहियों के दौरान कई वर्षों तक उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत न होने के कारण उन पर शिकंजा नहीं कसा जा सका, जिससे वे 25 साल से भी अधिक समय तक राजनीतिक रूप से सक्रिय रहे।

CBI जांच और यू-टर्न: मामले की जांच जब सीबीआई (CBI) के पास गई, तब गवाहों के बयान और नए सबूत सामने आए। यद्यपि कुछ मामलों में साक्ष्यों के अभाव में निचली अदालतों से राहत मिली, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 दिसंबर 2018 को उन्हें आपराधिक साजिश और हत्या का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।

पार्टी से इस्तीफा व सरेंडर: हाईकोर्ट के फैसले के बाद उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दिया और दिल्ली की तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण किया, जहां वे अंतिम सांस तक अपनी सजा काट रहे थे।

सज्जन कुमार के केस जुड़ी अन्य जानकारी

उन्हें 1 नवंबर 1984 को दिल्ली के राज नगर में एक परिवार के पांच सदस्यों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया। बता दें कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद, कांग्रेस नेताओं के नेतृत्व वाली भीड़ ने सिखों को निशाना बनाया था, जिसमें कम से कम 3,000 लोग मारे गए थे।

2009 के लोकसभा चुनावों से ही सिख-विरोधी दंगों का मामला उनके राजनीतिक करियर पर हावी होने लगा था, जब जनता के दबाव में आकर कांग्रेस ने कुमार और इस मामले के एक अन्य आरोपी जगदीश टाइटलर को दिए गए टिकट वापस ले लिए थे।

2009 से ही इस मामले की वजह से कांग्रेस ने कुमार को किनारे कर रखा है। पार्टी के सीनियर नेताओं को लगता था कि पार्टी में उनकी सक्रिय मौजूदगी और कामकाज से चुनाव में पार्टी की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है।

हालांकि, 2013 में कांग्रेस ने दक्षिण दिल्ली के संगम विहार निर्वाचन क्षेत्र से कुमार के बेटे को मैदान में उतारा। उन्हें विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

कांग्रेस ने कुमार से दूरी बनाए रखी, भले ही 2013 में एक निचली अदालत ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया था। अदालत ने यह फैसला इसलिए सुनाया क्योंकि चश्मदीद गवाह जगदीश कौर की गवाही में विसंगतियां थीं। दंगों में कौर ने अपने बेटे, पति और तीन भाइयों को खो दिया था।

बरी किए जाने के बाद, CBI ने निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी और आरोप लगाया कि भीड़ ने सुनियोजित सांप्रदायिक दंगे और धार्मिक सफाए को अंजाम दिया था।

सज्जन कुमार से जुड़ी जानकारी

सज्जन कुमार से जुड़ी जानकारी

कब और कैसे सज्जन कुमार के खिलाफ दर्ज हुआ केस?

कुमार और अन्य लोगों के खिलाफ मामला 2005 में जस्टिस जी.टी. नानावती आयोग की सिफारिश के बाद दर्ज किया गया था। घटना की रिपोर्ट में बताया गया है कि कई गवाहों ने पालम कॉलोनी, तिलक विहार और राज नगर जैसे इलाकों में हुए दंगों में कुमार, बलवान खोखर, प्रताप सिंह, महा सिंह और मोहिंदर सिंह की भूमिका के बारे में बताया। आरोप लगाया गया कि दंगे करने वाली भीड़ की अगुवाई कुमार, बलवान खोखर और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने की थी।

रिपोर्ट में कहा गया, 'पुलिस ने उनके खिलाफ पीड़ितों या गवाहों की शिकायतें तक दर्ज नहीं कीं। इसके बजाय, पुलिस ने सिर्फ नुकसान की शिकायतें दर्ज कीं। इसलिए, आयोग का मानना है कि सज्जन कुमार और बलवान खोखर के खिलाफ ऐसे विश्वसनीय सबूत मौजूद हैं जिनसे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि वे दोनों, जैसा कि गवाहों ने आरोप लगाया है, संभवतः इस मामले में शामिल थे।'

साल के शुरुआत में हुए रिहा

2026 की जनवरी में दिल्ली की एक विशेष अदालत ने सज्जन कुमार को 1984 के सिख-विरोधी दंगों के दौरान दिल्ली के जनकपुरी में हिंसा भड़काने से जुड़े सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि शक, चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, कभी भी सबूत की जगह नहीं ले सकता।

Nitin Arora
नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।

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