भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में ‘सब्सटैंटिव मोशन' लाने का नोटिस दिया है।
राहुल गांधी भारत विरोधी, विदेशी स्रोतों जैसे सॉरोस फाउंडेशन, यूएसएआईडी से जुड़े हैं।
What Is Substantive Motion: संसद का बजट सत्र हंगामों और आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ चुका है। दोनों दलों की ओर से जमकर बयानबाजी हुई। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने ऐसे कई दावे किए हैं, जिन पर खूब सियासी उठापटक चल रही है।
इसी बीच बीजेपी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ बड़ा कदम उठाया है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में ‘सब्सटैंटिव मोशन' लाने का नोटिस दिया है। वहीं, निशिकांत दुबे ने मांग की है कि राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द की जाए और उन्हें आजीवन चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जाए।
क्या है सब्सटैंटिव मोशन?
सब्सटैंटिव मोशन संसदीय प्रक्रिया में एक औपचारिक और स्वतंत्र प्रस्ताव होता है, जिसे सदन की मंजूरी के लिए पेश किया जाता है। इसका उद्देश्य किसी गंभीर मुद्दे पर सदन की राय या निर्णय प्राप्त करना होता है और यह साधारण प्रस्ताव (अन्य प्रस्तावों) से अलग होता है क्योंकि यह सीधे सदन के निर्णय को प्रभावित कर सकता है। अगर सदन इसे स्वीकार करता है तो उस मुद्दे पर चर्चा, समिति गठन और संभावित कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। सब्सटैंटिव मोशन में सदन के सदस्यों की ओर से वोटिंग का भी प्रावधान है, जिस पक्ष में वोटिंग ज्यादा होती है उसका पलड़ा भारी हो जाता है।
कब किया जाता है इस प्रस्ताव का इस्तेमाल?
इस प्रस्ताव का इस्तेमाल कई संदर्भों में किया जा सकता है, जैसे किसी उच्च पदाधिकारी के खिलाफ अविश्वास, विशेष कार्रवाई की मांग, या सदन की विशेष अनुशंसा। यदि प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो उसका राजनीतिक संदेश मजबूत माना जाता है।
कैसे काम करता है सब्सटैंटिव मोशन?
सबसे पहले सांसद द्वारा दिया गया नोटिस लोकसभा महासचिव तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष तय करते हैं कि प्रस्ताव सदन में स्वीकार किया जाए या नहीं। यदि सदन में इसे मंजूरी मिलती है, तो सदन उस प्रस्ताव पर चर्चा करती है और जरूरी होने पर एक विशेष समिति गठित की जा सकती है। समिति मामले की जांच कर अपनी रिपोर्ट पेश करती है, जिस पर आगे सदन निर्णय ले सकता है। गंभीर मामलों में समिति सिफारिशों के आधार पर सदस्यता समाप्त करने जैसे कदम सुझा सकती है।
राहुल गांधी के खिलाफ एक्शन क्यों?
निशिकांत दुबे ने अपने नोटिस में दावा किया है कि राहुल गांधी विदेशी स्रोतों जैसे सॉरोस फाउंडेशन, यूएसएआईडी और फोर्ड फाउंडेशन के साथ संयुक्त गतिविधियों के चलते “भारत विरोधी” ताकतों से जुड़े हैं और देश के खिलाफ काम कर रहे हैं।
वे मांग कर रहे हैं कि राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द की जाए और उन्हें आजीवन चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया जाए। जाए।बता दें कि बीजेपी लगातार राहुल गांधी पर संसद और संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ बयान देने का आरोप लगाती रही है, जबकि कांग्रेस इन आरोपों को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताती है।
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निशिकांत दुबे ने क्या कहा?
दुबे ने आरोप लगाया, "मैंने विशेषाधिकार प्रस्ताव नोटिस नहीं दिया है। मैंने एक सब्सटैंटिव मोशन का नोटिस दिया है जिसमें मैंने उल्लेख किया है कि वह सोरोस फाउंडेशन, फोर्ड फाउंडेशन और यूएसएआईडी के साथ थाईलैंड, वियतनाम, कंबोडिया की यात्रा करता है और भारत विरोधी ताकतों के साथ मिलीभगत करता है।
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क्या खत्म हो सकती है राहुल गांधी की संसदीय सदस्यता?
बता दें कि भारतीय संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत सांसद की सदस्यता समाप्त होने के स्पष्ट प्रावधान हैं। आम तौर पर सदस्यता समाप्ति के कारणों में आपराधिक दोषसिद्धि, अयोग्यता की घोषणा, दल-बदल कानून का उल्लंघन, या सदन की विशेष कार्यवाही शामिल होती है।
सिर्फ सब्सटेंटिव मोशन पारित हो जाने से स्वतः सदस्यता समाप्त नहीं होती, लेकिन यदि यह प्रस्ताव किसी ऐसी कार्रवाई की सिफारिश करता है जो संविधान या कानून के तहत अयोग्यता की ओर ले जाए तो आगे की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। इससे पहले भी राहुल गांधी अपनी लोकसभा सदस्यता गंवा चुके हैं। राहुल गांधी ने एक चुनावी जनसभा में ‘मोदी’ सरनेम को लेकर एक टिप्पणी की थी, जिसके बाद उनके खिलाफ बीजेपी के विधायक पूर्णेश मोदी ने मानहानि का केस दायर किया था।
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क्या है सब्सटैंटिव मोशन का इतिहास?
बता दें कि इससे पहले भी ऐसे मामलों में सांसदों को निष्कासित (expel) या निलंबित (suspend) किया जा चुका है।
2005 का ‘कैश फॉर क्वेरी’ मामला
साल 2005 में एक टीवी स्टिंग ऑपरेशन में खुलासा हुआ था कि कुछ सांसद पैसे लेकर संसद में सवाल पूछ रहे थे। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने पांच सदस्यीय जांच समिति बनाई, जिसकी अध्यक्षता पवन कुमार बंसल ने की। जांच में 10 सांसद दोषी पाए गए। 22 दिसंबर 2005 को रिपोर्ट सदन में रखी गई और अगले दिन तत्कालीन नेता सदन प्रणब मुखर्जी ने प्रस्ताव पेश किया। सदन ने प्रस्ताव को मंजूरी दी और सभी 10 सांसदों को लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया।
सांसद निधि योजना में गड़बड़ी
इसी साल एक और आरोप सामने आया कि कुछ सांसदों ने सांसद निधि (MPLADS) योजना में गड़बड़ी की। फिर से जांच समिति बनी। मार्च 2006 में रिपोर्ट पेश हुई और चार सांसदों को फटकार (reprimand) लगाई गई और एक तय अवधि तक निलंबित किया गया।
मानव तस्करी जैसा मामला
सांसद बाबूभाई कटारा पर आरोप लगा कि वे अपनी पत्नी और बेटे के पासपोर्ट पर दो अन्य लोगों को विदेश ले जाने की कोशिश कर रहे थे। जांच के बाद उन्हें गंभीर दुराचार का दोषी पाया गया। लोकसभा ने प्रस्ताव पास कर उन्हें 2008 में निष्कासित कर दिया।
आधिकारिक यात्रा का दुरुपयोग
एक अन्य सांसद, राजेश कुमार मांझी, पर सरकारी हवाई यात्राओं के दुरुपयोग का आरोप लगा। जांच के बाद उन्हें 30 बैठकों तक निलंबित कर दिया गया और आधिकारिक दौरों पर पत्नी या साथी को साथ ले जाने से रोका गया।
जजों के खिलाफ भी लाए गए मोशन
जस्टिस वी. रामास्वामी (1991)
1991 में सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया। जांच समिति ने उन्हें दोषी पाया, लेकिन संसद में प्रस्ताव आवश्यक बहुमत (साधारण बहुमत और उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत) हासिल नहीं कर सका। इसलिए वे पद से नहीं हटाए गए।
जस्टिस सौमित्र सेन (2011)
राज्यसभा में 2009 में जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ धन के दुरुपयोग का आरोप लगा। जांच समिति ने उन्हें दोषी पाया। 17 अगस्त 2011 को राज्यसभा ने विशेष बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव पारित कर दिया और मामला लोकसभा भेजा गया। हालांकि, लोकसभा में मामला आने से पहले ही 2 सितंबर 2011 को जस्टिस सेन ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद लोकसभा ने महाभियोग की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई।
