सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में 20 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि घटना के चश्मदीद गवाहों के बयानों में अस्वाभाविक रूप से एक जैसी भाषा और आरोपियों की भूमिकाओं का लगभग हूबहू एक जैसा ब्योरा अभियोजन के मामले पर गंभीर संदेह पैदा करता है।
‘गवाहों के बयान इतने एक जैसे कैसे?’ सुप्रीम कोर्ट ने 20 आरोपियों की रिहाई पर लगाई मुहर। PTI
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि एक जैसे और रटे-रटाए बयान अक्सर सच्ची याददाश्त के बजाय गवाहों को सिखाए या तैयार किए जाने की छाप देते हैं।
अदालत ने कहा कि जब कोई घटना बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी में होती है और उसे अलग-अलग जगहों पर खड़े कई लोग देखते हैं, तो हर गवाह की अपनी स्थिति और नजरिए के मुताबिक बयान में कुछ स्वाभाविक अंतर होना चाहिए। यहां गवाहों के बयान लगभग पूरी तरह एक जैसे थे, जिसने अभियोजन की कहानी को संदिग्ध बना दिया।
क्या था पूरा मामला?
मामला डीजे बजाने को लेकर हुए विवाद से जुड़ा था। अभियोजन के मुताबिक आरोपियों ने मृतक अविनाश और कुछ अन्य लोगों को घसीटकर पीटा था। आरोप था कि हमले में लोहे के पाइप, लोहे की रॉड और लकड़ी के पट्टों का इस्तेमाल किया गया। कुछ आरोपियों पर पीड़ितों को पकड़ने और कुछ पर उकसाने की भूमिका निभाने का आरोप था। हमले में अविनाश की मौके पर ही मौत हो गई। इसके बाद प्राथमिकी दर्ज की गई।
मामले में आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 147, 148, 149, 302/149, 307/149 और 120-बी के तहत आरोप लगाए गए। इसके अलावा बॉम्बे पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 135 के तहत भी मामला दर्ज किया गया था। कुल 23 आरोपी थे। मुकदमे की सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत हो गई।
ट्रायल कोर्ट ने 20 को दोषी ठहराया था
ट्रायल कोर्ट ने 20 आरोपियों को हत्या समेत संबंधित अपराधों में दोषी ठहराया था। वहीं दो आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया था। इसके बाद मामला बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ पहुंचा। हाईकोर्ट ने गवाहों के बयानों को संदेहास्पद माना और 20 आरोपियों को भी बरी कर दिया। हाई कोर्ट के इस फैसले को शिकायतकर्ता और राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा।
‘एक जैसे बयान ट्यूटरिंग की छाप देते हैं’
सुप्रीम कोर्ट ने चश्मदीद गवाहों की गवाही के संबंध में अहम टिप्पणी की।पीठ ने कहा कि अगर एक ही घटना को अलग-अलग स्थानों पर मौजूद कई लोग देखते हैं तो उनके बयान में उनकी व्यक्तिगत अनुभूति और देखने की स्थिति के निशान स्वाभाविक रूप से दिखाई देने चाहिए।
अदालत के मुताबिक, बयान में छोटे-छोटे अंतर होना अस्वाभाविक नहीं, बल्कि ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है। बल्कि ऐसे अंतर गवाही की विश्वसनीयता को कम करने के बजाय उसे भरोसेमंद बना सकते हैं। लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।
23 आरोपियों की भूमिका तक एक जैसी बताई गई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गवाहों ने 23 आरोपियों की भूमिकाओं का जिस तरह बेहद बारीकी और एकरूपता से वर्णन किया, वह सुरक्षित तरीके से दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता। हाई कोर्ट ने पाया था कि सभी गवाहों ने लगभग एक ही तरीके से बयान दिया और उनके बयानों में कोई खास अंतर नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की इस दलील को सही माना।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि जिन आरोपियों पर पीड़ितों को पकड़ने की भूमिका बताई गई थी, उनके हाथ में हथियार होने की बात नहीं कही गई। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक हाई कोर्ट को यह प्रतीत हुआ कि भूमिकाओं का यह बारीक और समान बंटवारा संभवतः गवाही को विश्वसनीय दिखाने के उद्देश्य से सोच-समझकर किया गया हो सकता है। बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट का इस अंतर को स्वीकार करना और बाकी एकरूप गवाही को असुरक्षित मानना उचित था।
घटना के कई दिन बाद दर्ज हुए थे बयान
सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि गवाहों के बयान घटना के तुरंत बाद नहीं, बल्कि कुछ दिन बाद दर्ज किए गए थे। अदालत ने कहा कि इतने बड़े घटनाक्रम में 23 अलग-अलग लोगों की भूमिकाओं का कई दिन बाद भी बिल्कुल एक जैसा और बेहद विस्तृत वर्णन स्वाभाविक नहीं माना जा सकता।
पीठ के मुताबिक, गवाहों के बयानों में इतनी पूर्ण समानता इस बात पर गंभीर संदेह पैदा करती है कि वे वास्तव में अपनी देखी हुई घटना बता रहे थे या उन्हें कोई बयान सिखाया गया था। यही वह आधार था, जिस पर हाई कोर्ट ने गवाहों की गवाही को संदेह की नजर से देखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश क्या कहा?
अदालत ने कहा कि सामान्य स्थिति में यदि बड़ी संख्या में लोगों से जुड़ी कोई घटना कई लोग देखते हैं और वे अलग-अलग स्थानों पर मौजूद होते हैं, तो उनके बयानों में व्यक्तिगत अनुभव के निशान दिखाई देना स्वाभाविक है।
किसने घटना को किस कोण से देखा, किस हिस्से पर उसकी नजर गई और उसने किस व्यक्ति की क्या भूमिका देखी, इन सबका असर बयान पर पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन इस मामले में गवाहों के बयान इतने समान थे कि अदालत ने इसे स्वाभाविक स्मृति के बजाय संभावित ‘ट्यूटरिंग’ से जोड़कर देखा। यानी अदालत के मुताबिक गवाहों को घटना के बारे में एक खास तरीके से बयान देने के लिए तैयार किए जाने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अभियोजन(पुलिस) के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला चश्मदीद गवाहों की गवाही के मूल्यांकन को लेकर महत्वपूर्ण है। अदालत ने यह नहीं कहा कि गवाहों के बयानों में हर अंतर जरूरी तौर पर उन्हें विश्वसनीय बना देता है या समानता अपने आप में झूठ का सबूत है। लेकिन जब घटना बड़ी हो, गवाह अलग-अलग स्थानों पर हों और फिर भी वे आरोपियों की भूमिका का बेहद बारीक और लगभग शब्दशः एक जैसा विवरण दें, तो अदालत उस समानता की स्वाभाविकता की जांच कर सकती है।
इस मामले में यही समानता अभियोजन के खिलाफ गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतनी पूर्ण समानता, खासकर घटना के कुछ दिन बाद दर्ज किए गए बयानों में, इस सवाल को जन्म देती है कि गवाह अपनी वास्तविक स्मृति के आधार पर बोल रहे थे या उन्हें कुछ सिखाया गया था।
