गिरफ्तारी बाद में दिखाकर पुलिस पहले हिरासत में नहीं रख सकती, Supreme Court का बड़ा आदेश

मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की समय-सीमा औपचारिक गिरफ्तारी से नहीं, व्यक्ति की आजादी छीने जाने के क्षण से शुरू होगी। Supreme Court ने कहा- गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कृत्रिम अंतर असंवैधानिक। 18 घंटे तक बिना न्यायिक निगरानी हिरासत में रखने के मामले में चार आरोपियों की तत्काल रिहाई का आदेश। NDPS कानून की सख्त जमानत शर्तें भी मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं।

Supreme Court ने गिरफ्तारी और पुलिस हिरासत को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की संवैधानिक समय-सीमा पुलिस द्वारा गिरफ्तारी दर्ज करने के समय से नहीं, बल्कि उस समय से शुरू होगी, जब पुलिस किसी व्यक्ति को पहले अपनी हिरासत में रखती है। ऐसे में पुलिस औपचारिक गिरफ्तारी बाद में दिखाती है, तो हिरासत में बिताया गया पूरा समय 24 घंटे की गणना में शामिल होगा। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि संविधान गिरफ्तारी से अलग किसी ऐसी हिरासत को मान्यता नहीं देता, जिसमें व्यक्ति की आजादी छीन ली गई हो, लेकिन उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार न दिखाया गया हो। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत मिलने वाली सुरक्षा को इस तरह के कृत्रिम अंतर से कमजोर नहीं किया जा सकता।

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24 घंटे की गणना हिरासत में लेने के समय से शुरू होगी- सुप्रीम कोर्ट

'24 घंटे की गणना हिरासत में लेने के समय से शुरू होगी'

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के मुताबिक गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। इस अवधि में सिर्फ गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचने में लगने वाला आवश्यक यात्रा समय ही बाहर रखा जा सकता है। जांच या पूछताछ के नाम पर गिरफ्तारी से पहले हिरासत में बिताए गए समय को इस गणना से बाहर नहीं किया जा सकता।

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