सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की हालिया बैठक के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक 25 अगस्त को हुई बैठक में पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विपुल पंचोली को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने का प्रस्ताव रखा गया। लेकिन इस पर कॉलेजियम की एकमात्र महिला सदस्य न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने सख्त असहमति दर्ज की। उनका कहना था कि यह नियुक्ति न्यायपालिका के लिए नुकसानदायक होगी और कॉलेजियम की विश्वसनीयता पर चोट करेगी।अगर केंद्र सरकार ने कॉलेजियम की सिफारिश मान ली गई तो जस्टिस पंचोली साल 2031 में देश के मुख्य न्यायाधीश बन जाएंगे।
असहमति जताने वाली जस्टिस बीवी नागरत्ना कौन हैं?
जस्टिस नागरत्ना देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने की कतार में हैं। वे जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में हमेशा पारदर्शिता और मेरिट को महत्व देने की बात करती रही हैं। इस बार उन्होंने खुलकर कहा है कि जस्टिस पंचोली की नियुक्ति से योग्य और वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी होगी। उनकी राय थी कि कॉलेजियम का ये फैसला सुप्रीम कोर्ट के हित में नहीं होगा और भविष्य में न्यायपालिका के लिए ये गलत उदाहरण होगा।
जज की नियुक्ति पर प्रशांत भूषण ने उठाए सवाल
सीजेएआर यानी कैम्पेन फॉर जुडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स ने भी इस फैसले पर गहरी नाराजगी जताई है। संगठन का कहना है कि जस्टिस पंचोली को सुप्रीम कोर्ट में लाने के पीछे पारदर्शिता नहीं है। यही नहीं वो देशभर के हाई कोर्ट जजों की वरिष्ठता सूची में 57वें स्थान पर हैं। कई वरिष्ठ और योग्य न्यायाधीशों को नजरअंदाज कर उनकी सिफारिश ने सवाल खड़े कर दिए हैं।
असहमति से नियुक्ति में पारदर्शिता पर उठे सवाल
जस्टिस नागरत्ना ने अपनी असहमति लिखित रूप में दी थी और यह भी कहा था कि इसे सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाए। लेकिन अब तक उनका असहमति नोट जारी नहीं हुआ है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर किस वजह से इतना बड़ा फैसला बिना पूरी पारदर्शिता के ले लिया गया है।
पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ की थी अनूठी पहल
देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने कार्यकाल में कोलेजियम प्रणाली को पारदर्शी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया था। उन्होंने जजों की नियुक्ति से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक करने की परम्परा शुरू की थी, जिससे लोगों का विश्वास न्यायपालिका पर बढ़ा। उम्मीद थी कि यह परंपरा आगे भी जारी रहेगी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के मौजूदा फैसले ने उन कोशिशों को पीछे धकेल दिया है।
सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम कैसे काम करता है?
सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम में पांच वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। इसमें मुख्य न्यायाधीश और चार अन्य वरिष्ठ जज रहते हैं। नियुक्ति और ट्रांसफर जैसे अहम फैसले इन्हीं की सहमति से होते हैं। इस बार 4-1 के फैसले से ये साफ हो गया कि कोलेजियम के भीतर भी गंभीर मतभेद मौजूद हैं।
फिर से उठा कॉलेजियम बनाम NJAC का विवाद
जजों की नियुक्ति को लेकर लंबे समय से विवाद चलता रहा है। 2014 में संसद ने नेशनल जुडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन बनाया था, ताकि सरकार भी जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर में भूमिका निभा सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे 2015 में रद्द कर दिया और कहा कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। इसके बावजूद कोलेजियम पर पक्षपात और अपारदर्शिता के आरोप लगातार लगते रहे हैं।
प्रशांत भूषण ने CJI गवई के भतीजे का मामला भी उठाया
सीजेएआर ने 19 अगस्त को हुई एक और बैठक का जिक्र किया। इसमें बॉम्बे हाई कोर्ट में जज बनने के लिए आठ वकीलों की सिफारिश की गई थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, इनमें सीजेआई गवई के भतीजे का भी नाम शामिल था। परंपरा के मुताबिक, इस मामले में सीजेआई को बैठक से अलग हो जाना चाहिए था। लेकिन यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई कि किन सदस्यों ने कॉलेजियम की बैठक में भाग लिया।
