Siya Goyal lie detector test: महाराष्ट्र के पुणे के हाई-प्रोफाइल केतन अग्रवाल हत्याकांड में एक बड़ा मोड़ आया है। पुणे ग्रामीण पुलिस इस मामले की मुख्य आरोपी और मृतक की मंगेतर सिया गोयल का पॉलिग्राफ (पोटोग्राफी/लाई डिटेक्टर) टेस्ट कराने के लिए कोर्ट से इजाजत मांग रही है। पुलिस का मानना है कि इस टेस्ट के जरिए कत्ल की गुत्थी को सुलझाने में बड़ी मदद मिल सकती है।
लेकिन क्या भारत में यह टेस्ट कानूनी रूप से मान्य है? क्या आरोपी इसके लिए मना कर सकता है? आइए आसान भाषा में समझते हैं इस पूरे मामले का कानूनी और तकनीकी गणित।
पुलिस को क्यों पड़ी 'लाई डिटेक्टर टेस्ट' की जरूरत?
25 वर्षीय व्यापारी केतन अग्रवाल को पुणे के पास लोहगढ़ किले की करीब 400 मीटर गहरी खाई में धकेल कर मौत के घाट उतार दिया गया था। पुलिस का आरोप है कि सिया गोयल और उसके कथित प्रेमी चेतन चौधरी ने शादी टालने के लिए इस मर्डर को बड़ी बेरहमी से प्लान किया।
इस केस में पुलिस के सामने कुछ ऐसी चुनौतियां हैं, जिसके कारण उन्हें इस टेस्ट का सहारा लेना पड़ रहा है:
डिजिटल सबूतों को मिटाया: दोनों आरोपियों ने गिरफ्तारी से पहले और बाद में अपने फोन से कॉल लॉग्स और रीसायकल बिन (Recycle Bin) तक का डेटा डिलीट कर दिया, ताकि सबूत नष्ट किए जा सकें।
कोई चश्मदीद नहीं: किले के उस सुदूर कोने या क्लिफ (चट्टान) पर कोई सीसीटीवी कैमरा या सीधा चश्मदीद (Eyewitness) मौजूद नहीं है जहां से केतन को गिराया गया।
बयानों में विरोधाभास: शादी की तैयारियों और हत्या के मकसद को लेकर दोनों परिवारों और संदिग्धों के बयानों में भारी अंतर है।
कैसे काम करता है लाई डिटेक्टर टेस्ट?
यह टेस्ट कोई दिमाग नहीं पढ़ता और न ही सीधे झूठ पकड़ता है। यह केवल झूठ बोलने के डर से पैदा होने वाले शारीरिक तनाव (Biological Stress) को मापता है। टेस्ट के दौरान शरीर पर तीन मुख्य उपकरण लगाए जाते हैं:
न्यूमोग्राफ ट्यूब (Pneumograph Tubes): छाती और पेट पर लगाई जाती हैं, जो सांस लेने की गति और पैटर्न को रिकॉर्ड करती हैं।
ब्लड प्रेशर कफ (Blood Pressure Cuff): बांह पर लपेटा जाता है, जो दिल की धड़कन और ब्लड प्रेशर में होने वाले बदलावों को मापता है।
गैल्वेनोमेट्रिक इलेक्ट्रोड (Galvanometric Electrodes): उंगलियों पर लगाए जाते हैं, जो पसीने की ग्रंथियों की सक्रियता (त्वचा की बिजली संवाहकता) को जांचते हैं।
केतन अग्रवाल मर्डर केस
एक्सपर्ट पहले नॉर्मल सवाल पूछते हैं, फिर धीरे-धीरे क्राइम से जुड़े मुख्य सवाल दागते हैं। जब आरोपी झूठ बोलता है, तो उसके शरीर में आने वाले उतार-चढ़ाव (Spikes) से सच और झूठ का आकलन किया जाता है।
क्या कहता है भारत का कानून?
भारत में लाई डिटेक्टर टेस्ट को लेकर बेहद सख्त नियम हैं। सुप्रीम कोर्ट के 'सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010)' के ऐतिहासिक फैसले के तहत कुछ बेहद जरूरी बातें जानना जरूरी है:
1. जबरदस्ती टेस्ट करना गैर-कानूनी है
संविधान का अनुच्छेद 20(3) (Right against Self-Incrimination) कहता है कि किसी भी आरोपी को खुद के खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। वहीं अनुच्छेद 21 (Right to Privacy) के तहत बिना मर्जी के ऐसा टेस्ट करना मानसिक प्रताड़ना और निजता का उल्लंघन माना जाता है। इसलिए पुलिस बिना आरोपी की स्वैच्छिक सहमति (Voluntary Consent) के टेस्ट नहीं कर सकती।
2. अगर सिया गोयल मना कर दे तो?
अगर आरोपी टेस्ट के लिए मना कर देता है, तो पुलिस जबरन टेस्ट नहीं करा सकती। सहमति हमेशा एक ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate) के सामने दर्ज होनी चाहिए और सहमति देने से पहले आरोपी को अपने वकील से सलाह लेने का पूरा अधिकार होता है।
3. क्या कोर्ट में मान्य होती है इसकी रिपोर्ट?
नहीं। पॉलिग्राफ टेस्ट के नतीजे या एक्सपर्ट की राय कोर्ट में सीधे तौर पर पुख्ता सबूत (Substantive Evidence) के रूप में स्वीकार्य नहीं होते। इसके आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती।
फिर पुलिस यह टेस्ट क्यों करा रही है?
भले ही टेस्ट की रिपोर्ट मान्य न हो, लेकिन टेस्ट के दौरान आरोपी जो बातें कुबूल करता है या जो सुराग देता है, उसके आधार पर अगर पुलिस को कोई नया भौतिक सबूत (जैसे हत्या में इस्तेमाल हथियार, फोन या कोई छुपाया गया दस्तावेज) मिल जाता है, तो वह नया सबूत भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 27 के तहत कोर्ट में 100% मान्य होता है। पुलिस इसी नए सुराग (Leads) की तलाश में है।
वर्तमान स्थिति
फिलहाल सिया गोयल और चेतन चौधरी दोनों पुलिस कस्टडी में हैं। उनके वकीलों का कहना है कि आरोपी कानूनी प्रक्रिया के तहत जांच में सहयोग करने और पॉलिग्राफ टेस्ट से गुजरने के लिए तैयार हैं, बशर्ते पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाए। कोर्ट की अनुमति मिलते ही फॉरेंसिक लैब में यह टेस्ट कराया जा सकता है।
