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Exclusive Interview: सिकंदर कैसे बना 'विश्व विजेता'? गजनवी से अंग्रेजी राज तक... प्रोफेसर केडिया ने इतिहास के इन दावों पर उठाए सवाल

EYE Opener: इतिहासकार प्रोफेसर कुसुमलता केडिया ने सिकंदर, चंगेज खान से लेकर अंग्रेजी राज तक इतिहास के कई दावों पर सवाल खड़े किए। उनका कहना है कि इतिहास को समझने के लिए लिखित स्रोतों का अध्ययन बेहद अहम है।

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Photo : Times Now Digital
इतिहासकार एवं अर्थशास्त्री प्रोफेसर कुसुमलता केडिया
Reported by: डॉ रमा सोलंकीEdited by: अनुराग गुप्ता
Updated Sep 13, 2026, 10:38 IST
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EYE Opener: इतिहासकार एवं अर्थशास्त्री प्रोफेसर कुसुमलता केडिया ने टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के खास कार्यक्रम 'EYE Opener' में भारतीय और वैश्विक इतिहास से जुड़े कई स्थापित मिथकों, औपनिवेशिक नरेटिव्स और भारत की आर्थिक वास्तविकताओं का गहराई से विश्लेषण किया।

उन्होंने कई प्रचलित ऐतिहासिक दावों पर सवाल भी उठाए और कहा कि इतिहास को समझने के लिए लिखित स्रोतों का अध्ययन बेहद अहम है। उनके मुताबिक, केवल सिक्कों, पुरातात्विक अवशेषों या खुदाई में मिली वस्तुओं के आधार पर किसी घटना की पूरी तस्वीर नहीं बनाई जा सकती।

टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के कार्यक्रम 'EYE Opener' में डॉ. रमा सोलंकी के साथ बातचीत में प्रोफेसर केडिया ने कहा कि इतिहास को जानने का एकमात्र अहम स्त्रोत 'लिखित इतिहास' है... उन्होंने कहा कि किसी घटना को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि उस समय के उपलब्ध साहित्य और दस्तावेज उसके बारे में क्या बताते हैं।

उन्होंने आगे अलेक्जेंडर के बारे में भी विस्तार से बात की। बकौल प्रोफेसर केडिया, अलेक्जेंडर (सिकंदर) को विश्व विजेता कहना महज एक गढ़ी हुई कहानी या मिथक है। उन्होंने कहा कि सिकंदर कभी अमेरिका, अफ्रीका, रूस, जापान, चीन, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया नहीं गया और उसने यूरोप का मुख्य भूभाग (Mainland Europe) भी नहीं देखा था। पश्चिमी नरेटिव के अनुसार भी वह मैसेडोनिया से केवल आज के ईरान तक ही आया था और उनके नरेटिव में भारत की सीमा ईरान तक है और वह सीमा पर दस्तक देकर लौट गया था।

प्रोफेसर केडिया का कहना है कि सिकंदर का कोई भी समकालीन लिखित दस्तावेज (मैसेडोनियन, ग्रीक या भारतीय) उपलब्ध नहीं है। उन्होंने आगे ब्रिटेनिका इनसाइक्लोपीडिया का हवाला देते हुए कहा कि पहली बार 19वीं शताब्दी में चर्च के पादरियों द्वारा सिकंदर के बारे में लिखा गया, जो बाइबल के अलावा कुछ नहीं पढ़ता है। उन्होंने कहा, ''सिकंदर के बारे में एक लाइन मध्यकालीन भारत में नहीं लिखा गया। मध्यकालीन मैसेडोनिया में जो लिखा गया वो दस्तावेज उपलब्ध नहीं है... 400-600 साल बाद रोम में लिखा गया और वो भी उपलब्ध नहीं है।''

यहां देखें पूरा इंटरव्यू

19वीं शताब्दी में गढ़ा गया नरेटिव

18वीं-19वीं शताब्दी में जब यूरोपीय शक्तियां भारत और अन्य एशियाई देशों में आईं, तो उनके पास भारत की तुलना में अपना कोई प्राचीन इतिहास नहीं था। भारत और एशिया के लंबे इतिहास के सामने अपना वर्चस्व खड़ा करने के लिए उन्होंने सिकंदर का यह काल्पनिक नरेटिव 'मैन्युफैक्चर' किया।

महमूद गजनवी पर भी की खुलकर बात

प्रोफेसर केडिया के मुताबिक, गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर तोड़े जाने का कोई भी समकालीन भारतीय, अरबी, तुर्किए या फारसी लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा, ''मान लीजिए मंदिर टूटा भी है तो किसने तोड़ा...''

Professor Kusumlata Kedia

Professor Kusumlata Kedia

उन्होंने आगे कहा कि 1931 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से मोहम्मद नाजिम की पीएचडी थीसिस प्रकाशित हुई... 11वीं शताब्दी की अलबरूनी की पुस्तक 'अल-हिंद' में गजनवी द्वारा सोमनाथ या किसी मंदिर को तोड़े जाने का उल्लेख ही नहीं मिलता है। इसके अलावा रोमिला थापर 1992 में सोमनाथ पर एक किताब लिखती हैं और वह कहती हैं कि गजनवी ने कुछ तोड़ा ही नहीं... तोड़ने का कोई साक्ष्य उपलब्ध ही नहीं है।

इस दौरान, प्रोफेसर केडिया ने उन कथाओं पर भी तार्किक सवाल उठाए जिनमें मंदिर से भारी दरवाजे या अन्य विशाल वस्तुएं दूर तक ले जाने का जिक्र मिलता है। इसके लिए उन्होंने उस समय की भौगोलिक परिस्थितियों, नदियों, पहाड़ी रास्तों और मरुस्थलीय क्षेत्रों को ध्यान में रखने की बात कही।

'अंग्रेजी शासन के पास नहीं था कोई सिस्टम'

जब प्रोफेसर केडिया से पूछा गया कि अंग्रेज कहते थे कि छोटी-छोटी रियासतें तो पहले भी लड़ती थी, लेकिन हम लोगों ने भारत को एक सिस्टम दिया? इस पर उन्होंने कहा कि अगर अंग्रेजों के पास कोई सिस्टम होता तो स्कॉटलैंड या आयरलैंड में तो होता। उन्होंने कहा, ''19वीं सदी (1840 के दशक) में आयरलैंड में आलू का अकाल (Potato Famine) पड़ा और ब्रिटेन के शासन के बावजूद लोग भुखमरी से मर गए।''

उन्होंने आगे कहा कि प्रथम विश्वयुद्ध के समय ब्रिटेन के पास अपनी कोई स्थायी सेना नहीं थी और 14-14 साल के बच्चों को ट्रेंच वॉरफेयर (खाइयों की लड़ाई) में भेजा गया, जहां वे बेहद खराब परिस्थितियों में मारे गए। अगर आपके पास सिस्टम था तो कोई स्थायी सेना क्यों नहीं बना ली। उन्होंने कहा, ''ट्रेंच वॉरफेयर में अंग्रेजी सैनिक सड़ कर मर गए। उनके पास कपड़ा, जूते-मोजे नहीं थे और जब वह थककर सोए तो चूहे नोचकर खा गए।''

उन्होंने कहा कि प्रथम विश्वयुद्ध के तुरंत बाद ब्रिटेन में फैली फ्लू महामारी से भारी संख्या में लोग मारे गए और 20वीं सदी में अकाल व महामारियों से वहां की 10 से 25 फीसदी तक आबादी साफ हो गई।

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