MP High Court Fatwa Verdict: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मुस्लिम विवाह और तलाक को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने साफ तौर पर कहा है कि किसी भी फतवे या धार्मिक संस्था की राय को तलाक का कानूनी आदेश नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पति केवल फतवे या मस्जिद कमेटी के पत्र को आधार बनाकर अदालत से विवाह विच्छेद की उद्घोषणा की मांग नहीं कर सकता।
'फतवे के आधार पर नहीं हो सकता तलाक'; मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- मस्जिद कमेटी की राय कानूनी आदेश नहीं
क्या था पूरा मामला?
यह मामला भोपाल के रहने वाले सैयद सामी अली और उनकी पत्नी डॉक्टर शाजिया नवाज खान के बीच विवाद से जुड़ा हुआ है।
2 साल से अलग रह रहा था दंपत्ति: पति सैयद सामी अली बीते 2 वर्षों से अपनी पत्नी से अलग रह रहे थे। उन्होंने भोपाल स्थित 'दारुल इफ्ता मस्जिद कमेटी' को एक पत्र लिखकर पत्नी के खिलाफ कई शिकायतें दर्ज कराई थीं और तलाक पर राय मांगी थी।
मस्जिद कमेटी का जवाबी पत्र: दारुल इफ्ता मस्जिद कमेटी ने इस संबंध में पति को एक जवाबी पत्र/राय जारी की थी।
फैमिली कोर्ट में याचिका: पति ने उसी मस्जिद कमेटी द्वारा जारी पत्र को आधार बनाकर भोपाल की फैमिली कोर्ट में विवाह विच्छेद की उद्घोषणा का मामला दायर कर दिया था।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और पत्नी की याचिका पर फैसला
पति के इस दावे को उनकी पत्नी डॉ. शाजिया नवाज खान की ओर से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। अदालत का निर्णय और निर्देश:
-हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि किसी भी धार्मिक निकाय या दारुल इफ्ता द्वारा जारी फतवा अथवा पत्र कानूनी रूप से मान्य तलाक की डिक्री नहीं है।
-अदालत ने पति के दावे को खारिज करते हुए उन्हें कानून के दायरे में रहकर तलाक के लिए अलग से नियमानुसार याचिका दायर करने की स्वतंत्रता प्रदान की है।
ऐसे में हाईकोर्ट के इस फैसले से यह साफ हो गया है कि देश में पारिवारिक विवादों और विवाह विच्छेद के मामलों में केवल देश का कानून और न्यायिक प्रक्रिया ही सर्वोपरि है, धार्मिक संस्थाओं के फतवे नहीं।
