पूरा देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 76वां जन्मदिन मना रहा है। इस मौके पर पीछे मुड़कर देखें तो एक सवाल जो बेहद दिलचस्प है वो ये है- आखिर कोई राजनेता सिर्फ नेता से एक राजनीतिक ब्रांड कैसे बनता है? करीब तीन दशक की अपनी पत्रकारिता के दौरान मैंने नेताओं को बनते, बदलते और वक्त के साथ अपनी राजनीतिक पहचान गढ़ते देखा है। इसी दौरान मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा को भी सीधे तौर पर देखने, कवर करने और करीब से समझने का अवसर मिला है।
गुजरात से दिल्ली
गुजरात से दिल्ली, फिर दिल्ली से गुजरात और फिर गुजरात से दिल्ली। गुजरात की राजनीति से लेकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र तक। मुझे गुजरात के चुनावों को करीब से कवर करने का मौका मिला। बाद में जब नरेंद्र मोदी ने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया और वडोदरा से उनका नाम सामने आया, तब उस चुनावी घटनाक्रम को भी मैंने रिपोर्ट किया। वह दौर खास था, क्योंकि गुजरात की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे एक नेता का राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़ना अब एक बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में बदल रहा था। इस दौरान मैंने सिर्फ एक नेता को बदलते नहीं देखा, बल्कि बढ़ते, चमकते, एक राजनीतिक ब्रांड को बनते और लगातार विकसित होते देखा है। वह दौर भी मेरी स्मृतियों में बेहद खास है, जब नरेंद्र मोदी को बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर आगे बढ़ाए जाने की प्रक्रिया चल रही थी। जब लाल कृष्ण आडवाणी के घर पर नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रस्तावित किया गया, मैं वहां मौजूद था और उस जगह की हर हलचल को बड़ी बारीकी से देख रहा था। उस माहौल को करीब से देखना मेरे लिए सिर्फ एक राजनीतिक घटना को कवर करना नहीं था, बल्कि भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव को सामने से देखना था, लेकिन मोदी ने सिर्फ राजनीति नहीं की, अपने नाम को एक ब्रांड में बदला।
'ब्रांड मोदी'
मेरे लिए 'ब्रांड मोदी' को छः शब्दों में समझा जा सकता है-व्यक्ति, कहानी, संदेश, संचार, संगठन और डिलीवरी। एक व्यक्ति के तौर पर उनकी एक अलग पहचान है , अपनी अलग शैली है और प्रेजेंटेशन भी बिलकुल अलग है। उनकी कहानी और भी दिलचस्प और प्रेणादायक है - वडनगर से दिल्ली तक का सफर, जो लगातार उनकी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बना। संदेश भी साफ है - विकास, राष्ट्र निर्माण, गरीब कल्याण, आत्मनिर्भरता और विकसित भारत जैसे स्पष्ट और दोहराए जाने वाले नैरेटिव्स। कम्युनिकेशन तो जबरदस्त है। भाषण , सभा से सोशल मीडिया तक, टीवी से मन की बात तक। संगठन, व्यक्ति की पहचान को कार्यकर्ता और बूथ स्तर तक पहुंचाने वाला मजबूत राजनीतिक नेटवर्क।
रही बात डिलीवरी की तो वो दुनिया के सामने है। नीतियां, योजनाएं, फैसले, दुनिया के मंच पर भारत की छवि और बड़े राष्ट्रीय आयोजन।। ब्रिक्स ताजा उदाहरण है। दरअसल, किसी नेता की असली कहानी सिर्फ उसके भाषणों में नहीं होती। लोगों के बीच उनकी मौजूदगी, लोगों से उनका संवाद, मीडिया से उनका रिश्ता और समय के साथ बदलती उनकी संचार रणनीति ये सब मिलकर उनकी राजनीतिक पहचान बनाते हैं। और नरेंद्र मोदी के मामले में यह प्रक्रिया लगातार दिखाई देती रही है। तभी तो 'मोदी' अब सिर्फ एक नाम नहीं है; यह एक पूरा Political Communication Architecture है।
भाषण से आगे ‘कम्युनिकेशन ब्रांड’ तक
सिर्फ लोकप्रियता से कोई राजनेता ब्रांड नहीं बन सकता। ब्रांड बनने के लिए अपनी Identity, Credibility, Consistency, Visibility और Public Connection बेहद जरूरी है। ये राजनीतिक ब्रांड के पिलर्स हैं। इनमें एक भी कमजोर हों, तो ब्रांड का लंबे समय तक टिकना मुश्किल होता है। मोदी ने राजनीति को सिर्फ नीतियों और भाषणों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अपने सार्वजनिक संचार में एक ऐसी भाषा विकसित की, जो राजनीतिक मंच से निकलकर आम बातचीत का हिस्सा बनी। 'मन की बात', सोशल मीडिया, बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम, रेडियो, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सीधे जनता से संवाद इन सभी माध्यमों का लगातार इस्तेमाल इस ब्रांड की पहचान बना। और 'मोदी' नाम ही संदेश बन गया।
ब्रांड भाषणों से बन सकता है, लेकिन लंबे समय तक टिकता है तो उसके पीछे नीतियां, निर्णय, संगठन और जनता का अनुभव भी होना चाहिए। 'ब्रांड मोदी' की कहानी इसलिए दिलचस्प है, क्योंकि यह केवल एक नेता की कहानी नहीं है। यह भारतीय राजनीति के बदलते Communication Landscape की भी कहानी है। मजबूत Communication और Governance Experience के बीच लगातार तालमेल की कहानी है। 25 वर्षों की सार्वजनिक यात्रा को इसलिए केवल सत्ता और चुनावों की कहानी के रूप में देखना अधूरा होगा। यह भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व, संचार और राजनीतिक ब्रांडिंग के बदलते स्वरूप की भी कहानी है। और एक पत्रकार के रूप में मेरे लिए शायद यही 'ब्रांड मोदी' का सबसे दिलचस्प पहलू है।