भारतीय नौसेना ने आज आईएनएस मंगरोल को अपने बेड़े में शामिल किया है। यह युद्धपोत खास तौर पर तटीय और उथले समुद्री इलाकों में पनडुब्बी रोधी अभियान चलाने के लिए बनाया गया है। इसमें आधुनिक सोनार, हल्के टॉरपीडो और पनडुब्बी रोधी रॉकेट लॉन्चर जैसी प्रणालियां हैं। इसकी खासियत यह है कि यह उन समुद्री इलाकों में भी काम कर सकता है, जहां बड़े युद्धपोतों को संचालन में मुश्किल होती है। आइए समझते हैं कि आईएनएस मंगरोल कैसे काम करेगा और इसकी पांच बड़ी खूबियां क्या हैं।
सोनार से पानी के नीचे छिपे खतरे का लगेगा पता
पनडुब्बी रोधी युद्ध में सबसे पहली चुनौती होती है पानी के भीतर मौजूद किसी संदिग्ध वस्तु का पता लगाना। समुद्र के नीचे दृश्यता सीमित होती है और पनडुब्बी सतह पर आए बिना लंबे समय तक काम कर सकती है। ऐसे में सोनार महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आईएनएस मंगरोल में 'अभय' हल-माउंटेड सोनार लगाया गया है। सोनार ध्वनि तरंगों की मदद से पानी के भीतर मौजूद वस्तुओं का पता लगाने में सहायता करता है। इन तरंगों के लौटने वाले संकेतों का विश्लेषण करके संभावित लक्ष्य की दूरी और स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।टॉरपीडो और रॉकेट लॉन्चर से करेगा मुकाबला
आईएनएस मंगरोल को आधुनिक पनडुब्बी रोधी हथियारों से लैस किया गया है। इसमें हल्के टॉरपीडो और स्वदेशी पनडुब्बी रोधी रॉकेट लॉन्चर शामिल हैं। टॉरपीडो पानी के भीतर लक्ष्य को निशाना बनाने वाले हथियार होते हैं, जबकि पनडुब्बी रोधी रॉकेट लॉन्चर निर्धारित परिस्थितियों में पानी के भीतर मौजूद लक्ष्य के खिलाफ इस्तेमाल किए जा सकते हैं।उथले पानी में भी करेगा अभियान, यही है इसकी खास ताकत
आईएनएस मंगरोल की सबसे अहम विशेषताओं में से एक है उथले समुद्री क्षेत्रों में काम करने की क्षमता। तटीय इलाकों, बंदरगाहों के आसपास और कम गहराई वाले समुद्री क्षेत्रों में बड़े युद्धपोतों की आवाजाही सीमित हो सकती है। ऐसे इलाकों में पनडुब्बी रोधी निगरानी के लिए छोटे और विशेष रूप से तैयार पोत उपयोगी साबित होते हैं। आईएनएस मंगरोल को तटीय सुरक्षा और कम गहराई वाले पानी में अभियान के लिए तैयार किया गया है। इसमें तीन डीजल इंजन और वॉटरजेट प्रणोदन प्रणाली है। वॉटरजेट प्रणाली पोत को पानी के भीतर खींचने के बजाय पानी के प्रवाह के जरिए आगे बढ़ाती है और दिशा बदलने में मदद करती है। इस क्षमता से पोत को तटीय समुद्री क्षेत्रों में निगरानी और संचालन के दौरान फायदा मिल सकता है।'मारीच' सिस्टम से टॉरपीडो जैसे खतरे से बचाव
आईएनएस मंगरोल में 'मारीच' उन्नत टॉरपीडो डिकॉय प्रणाली लगाई गई है। डिकॉय प्रणाली का उद्देश्य आने वाले टॉरपीडो को भ्रमित करने और युद्धपोत की सुरक्षा में मदद करना होता है। यह पनडुब्बी रोधी अभियान के साथ पोत की अपनी रक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।इस तरह आईएनएस मंगरोल की भूमिका केवल पानी के नीचे मौजूद संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने तक सीमित नहीं है। इसके सेंसर और हथियार इसे खतरे की पहचान, संभावित कार्रवाई और आत्मरक्षा से जुड़े कई कामों में सहायता देते हैं।
समुद्री गश्ती विमानों और हेलीकॉप्टरों के साथ मिलकर करेगा काम
आईएनएस मंगरोल समुद्री गश्ती विमानों, हेलीकॉप्टरों और अन्य युद्धपोतों के साथ मिलकर काम कर सकता है। इस तरह अलग-अलग स्रोतों से मिली जानकारी का इस्तेमाल पानी के भीतर मौजूद संभावित खतरे को समझने और उसके खिलाफ समन्वित कार्रवाई करने में किया जा सकता है। इस पोत का इस्तेमाल कम तीव्रता वाले समुद्री अभियानों और बारूदी सुरंगों से संबंधित अभियानों में भी किया जा सकता है। इससे तटीय इलाकों में नौसेना की निगरानी और सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों को पूरा करने में मदद मिलेगी।80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री से बना है युद्धपोत
आईएनएस मंगरोल का निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने किया है। भारतीय नौसेना के मुताबिक, इसमें 80 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। यह भारत की युद्धपोत डिजाइन करने, उनका निर्माण करने और आधुनिक हथियारों तथा सेंसरों को एकीकृत करने की बढ़ती क्षमता को दर्शाता है। इस पोत का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले के तटीय शहर मंगरोल के नाम पर रखा गया है। यह पूर्ववर्ती आईएनएस मंगरोल (एम85) की विरासत को आगे बढ़ाता है। पुराना पोत बारूदी सुरंग-रोधी युद्धपोत था और अप्रैल 2004 तक नौसेना में सेवा दे चुका था।हिंद महासागर में क्यों महत्वपूर्ण है इसकी तैनाती?
हिंद महासागर क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और सामरिक गतिविधियों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भारतीय नौसेना के अधिकारियों के अनुसार, कई देशों की ओर से पनडुब्बियों की तैनाती बढ़ने के कारण पानी के भीतर मौजूद खतरों का पता लगाने और उनसे निपटने की जरूरत भी बढ़ी है।आईएनएस मंगरोल को शामिल किए जाने के कार्यक्रम की अध्यक्षता करने वाले पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय वात्सायन ने कहा कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में मजबूत और त्वरित प्रतिक्रिया देने में सक्षम नौसेना बनाए रखना जरूरी है।नौसेना के मुताबिक, 2026 में अब तक 10 पोत बेड़े में शामिल किए जा चुके हैं और साल के अंत तक आठ अन्य पोत शामिल किए जाने की संभावना है। फिलहाल बेड़े में 131 पोत और 20 पनडुब्बियों समेत कुल 151 प्लेटफॉर्म हैं। भारतीय शिपयार्ड में 42 पोतों का निर्माण जारी है।