How Election Commission Became 3 Member Body: लगातार दूसरे दिन राजधानी में रविवार (11 अक्टूबर) को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए, जबकि दिल्ली पुलिस ने वीकेंड के दौरान हजारों लोगों को हिरासत में लिया। बाद सोमवार को आई तो अब कांग्रस तैयार है सुप्रीम कोर्ट तक प्रदर्शन करने के लिए।
चूंकि चुनाव आयोग पर निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने की अहम जिम्मेदारी होती है, इसलिए अक्सर इसके कामकाज की जांच-पड़ताल होती रही है। चुनाव आयोग कैसे बना? यह पहले एक सदस्य वाली संस्था थी, फिर तीन सदस्य वाली, फिर एक सदस्य वाली और फिर तीन सदस्य वाली संस्था कैसे बनी? चुनाव आयोग को फंड कैसे मिलता है? आइए जानते हैं।
चुनाव आयोग कैसे बना?
भारत का चुनाव आयोग (ECI) एक स्थायी संवैधानिक संस्था है। इसकी वेबसाइट के अनुसार, इसे '25 जनवरी 1950 को संविधान के तहत' स्थापित किया गया था। ECI की वेबसाइट के मुताबिक, संविधान ने इसे 'संसद और हर राज्य की विधानसभा के चुनाव कराने, और भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए चुनाव कराने की पूरी प्रक्रिया की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण' की जिम्मेदारी दी है।
चुनाव आयोग में कौन-कौन होता है?
शुरुआत में, आयोग में सिर्फ एक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) होते थे। अब इसमें CEC और दो चुनाव आयुक्त (ECs) होते हैं। राष्ट्रपति इनकी नियुक्ति करते हैं और इनका कार्यकाल छह साल या 65 साल की उम्र तक, जो भी पहले हो, तब तक होता है।
इनका दर्जा, वेतन और सुविधाएं सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर होती हैं। इसी तरह, CEC को भी सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही संसद के जरिए महाभियोग चलाकर हटाया जा सकता है।
संविधान का अनुच्छेद 324, जो 'चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के चुनाव आयोग में निहित होने' से संबंधित है, उसमें आयोग के सदस्यों की संख्या का कोई उल्लेख नहीं है।
इसमें बताया गया है कि, 'भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324(2) राष्ट्रपति को समय-समय पर निर्वाचन आयुक्तों की संख्या तय करने का अधिकार देता है।'
चुनाव आयोग में एक सदस्य से तीन सदस्य कैसे हुए?
करीब चार दशकों तक आयोग में सिर्फ एक सदस्य होता था। नौवीं लोकसभा चुनाव से ठीक पहले यह व्यवस्था बदल गई।
एस.के. मेंदिरत्ता, जिन्होंने 53 से ज्यादा सालों तक भारत के चुनाव आयोग के साथ काम किया, उन्होंने एक बार पहले 'द इंडियन एक्सप्रेस' को बताया था कि चुनाव आयोग का विस्तार प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार और CEC आर.वी.एस. पेरी शास्त्री के बीच मतभेदों की वजह से किया गया था।
मेंदिरत्ता ने 2019 में कहा था, 'ये मतभेद 1987 के राष्ट्रपति चुनाव के समय शुरू हुए थे। केंद्र सरकार चाहती थी कि चुनाव के लिए नॉमिनेशन की प्रक्रिया का समय इस तरह तय किया जाए कि ज्ञानी जैल सिंह को दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव लड़ने से रोका जा सके। बता दें कि जैल सिंह के राजीव के साथ अच्छे रिश्ते नहीं माने जाते थे। लेकिन पेरी शास्त्री ने सरकार की बात मानने से इनकार कर दिया। और जब दो साल बाद लोकसभा चुनाव का समय आया, तो सरकार को यह पक्का नहीं था कि वे कैसा रुख अपनाएंगे, इसलिए सरकार ने ECI को एक मल्टी-मेंबर (कई सदस्यों वाला) आयोग बनाकर CEC की शक्तियों को कम करने का फैसला किया।'
7 अक्टूबर, 1989 को एक नोटिफिकेशन के जरिए दो पद बनाए गए और 16 अक्टूबर को एस.एस. धनोआ और वी.एस. सेगल को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। मेंदिरत्ता के अनुसार, 'तीनों चुनाव आयुक्तों के बीच कई मतभेदों और इस तथ्य के बावजूद कि आयोग के कामकाज के संचालन के लिए कोई नियम नहीं थे, 1989 के लोकसभा चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न हुए।'
फिर से एक सदस्य पर लौटी कहानी
यह व्यवस्था ज्यादा समय तक नहीं चली। मेंदिरत्ता ने कहा, 'सत्ता में आने के तुरंत बाद, प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की नेशनल फ्रंट सरकार ने 7 अक्टूबर, 1989 के राष्ट्रपति के नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया।' धनोआ ने अपनी बर्खास्तगी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। मेंदिरत्ता को याद है कि कोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि 'एक से ज्यादा दिमाग बेहतर होते हैं' और अगर आयोग को फिर से बहु-सदस्यीय बनाया जाता है, तो कामकाज के संचालन के लिए प्रावधान होना चाहिए।
इसके बाद सरकार ने 'मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त (सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1991' लागू किया, जिसने CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर का दर्जा दिया और उनकी रिटायरमेंट की उम्र 65 साल तय की। चुनाव आयुक्तों (ECs) को हाई कोर्ट के जजों का दर्जा दिया गया और उनकी रिटायरमेंट की उम्र 62 साल तय की गई। उस समय इस अधिनियम में आयोग के कामकाज को चलाने के लिए कोई प्रावधान नहीं था। हालांकि, अगले दो सालों तक ECI एक सदस्य वाली संस्था के तौर पर ही काम करता रहा।
फिर एक से तीन का हुआ आयोग
1993: टी.एन. शेषन (T.N. Seshan) का दौर और 3-सदस्यीय आयोग का गठन
इसके बाद, 12 दिसंबर 1990 को टी.एन. शेषन को CEC नियुक्त किया गया। शेषन द्वारा आयोग की स्वतंत्रता पर जोर देने से नाराज होकर, पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 1 अक्टूबर 1993 को ECI का विस्तार करने का फैसला किया। तब एम.एस. गिल और जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति को EC नियुक्त किया गया।
साथ ही, एक अध्यादेश के जरिए 'मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त (सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1991' में संशोधन किया गया। मेंदिरत्ता ने कहा, 'इस कानून का नाम बदलकर 'चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें और कामकाज का संचालन) अधिनियम, 1991' कर दिया गया। सरकार ने CEC और ECs को सुप्रीम कोर्ट के जज का दर्जा देकर उन्हें बराबर कर दिया, जिनकी रिटायरमेंट की उम्र 65 साल थी। दूसरे शब्दों में, अब तीनों आयुक्तों के पास फैसले लेने की बराबर शक्तियां थीं।'
इस अधिनियम में 'कामकाज का संचालन' (Transaction of Business) नाम से एक नया अध्याय जोड़ा गया, जिसमें धारा 9, 10 और 11 शामिल थीं। इन तीनों धाराओं में यह व्यवस्था की गई थी कि CEC और ECs इस तरह काम करेंगे कि उनके फैसलों में आम सहमति हो और अगर किसी मुद्दे पर राय अलग-अलग हो, तो बहुमत वाली राय ही मानी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: टी.एन. शेषन मामला (1995)
शेषन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और आरोप लगाया कि ये तीनों प्रावधान सरकार द्वारा उनकी शक्तियों को कम करने की कोशिश थे। भारत के मुख्य न्यायाधीश ए.एम. अहमदी की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने याचिका खारिज कर दी (टी.एन. शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त बनाम भारत संघ और अन्य, 14 जुलाई, 1995), और तब से ECI तीन सदस्यों वाली संस्था के तौर पर काम कर रहा है।
चुनाव आयोग को फंडिंग कैसे मिलती है?
चुनाव आयोग की वेबसाइट के अनुसार, 'आयोग के सचिवालय का अपना अलग बजट होता है, जिसे सीधे आयोग और केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय के बीच बातचीत करके तय किया जाता है। वित्त मंत्रालय आम तौर पर बजट के लिए आयोग की सिफारिशों को मान लेता है।'
चुनाव कराने के अलावा चुनाव आयोग और क्या काम करता है?
मौजूदा सांसदों और विधायकों को अयोग्य ठहराने के मामलों में आयोग के पास सलाह देने का अधिकार है। चुनाव आयोग की वेबसाइट के मुताबिक, 'चुनावों में गड़बड़ी या भ्रष्टाचार के दोषी पाए गए लोगों के जो मामले सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के सामने आते हैं, उन्हें भी आयोग के पास भेजा जाता है। आयोग इस बात पर अपनी राय देता है कि क्या ऐसे व्यक्ति को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया जाना चाहिए और अगर हां, तो कितने समय के लिए।'
