दिल्ली की फरजाना कैसे बनी बेगम समरू,लटके-झटके पर फिदा हो गया था 'पटना का कसाई' रेनहॉर्ट

  • Authored by: ललित राय
  • Updated Mar 2, 2023, 07:56 PM IST

18वीं सदी के दूसरे कालखंड में तत्कालीन भारत की तस्वीर तेजी से बदल रही थी। सुल्तानों और बादशाहों के सामने अब फिरंगी (अंग्रेज) थे। खास बात यह कि चाहे आम लोग हों या खास सबके बारे में अंग्रेजों की सोच एक जैसी थी। दिल्ली में मुगल बादशाह से लेकर अलग अलग सूबों में शासन करने वाले नवाब भी परेशान थे। फिरंगियों को बाहर करने के लिए हर तरकीब लगाते रहे। उस पृष्ठभूमि में ऑस्ट्रिया के वाल्टर रेनहार्ट की एंट्री होती है जिसे यहां पर समरू नाम मिलता है। वही समरू दिल्ली पहुंचता है,एक कोठे पर फरजाना नाम की लड़की से आंखें मिलती हैं और उसके साथ ही फरजाना को भी नया नाम और मुकाम हासिल होता है।

Begum Samru story: दिल्ली के कोठे पर फरजाना मुजरा करती थी। लेकिन उसकी नियति में कुछ और ही लिखा था। वो फरजाना से बेगम समरू बनी और बेगम समरू से जोएना। फरजाना से बेगम समरू बनने का सफर बेहद दिलचस्प है। फरजाना की जिंदगी में एक शख्स वाल्टर रेनहार्ट आता है जो लटकों, झटकों के जाल से बाहर तो नहीं निकल पाया बल्कि अपना दिल दे बैठा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही कि फरजाना कैसे समरू बनी। इसके लिए पहले रेनहार्ट के बारे में समझना होगा। ऑस्ट्रिया का रहने वाला रेनहार्ट भाड़े के सैनिक के तौर पर कोलकाता आया था। उसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना था।अपने मकसद को हासिल करने के लिए वो बंगाल के नवाब मुर्शीद कुली खान की सेना का हिस्सा बन गया। अंग्रेजों की बढ़ती ताकत से ना सिर्फ दिल्ली का मुगल बादशाह बल्कि बंगाल का नवाब भी परेशान था। बंगाल के नवाब ने रेनहार्ट को बड़ी जिम्मेदारी दी जिसे उसने कामयाबी के साथ अंजाम दिया। रेनहार्ट की सफलता से प्रसन्न नवाब ने उसे नया नाम समरू दिया। रेनहार्ट या यूं कहें कि समरू को लगने लगा था कि बड़े उद्देश्य को हासिल करने के लिए उसे दिल्ली का रुख करना होगा और वो दिल्ली के लिए कूच कर गया। दिल्ली में चांदनी चौक के एक कोठे पर उसकी नजर फरजाना से दो चार हुई। दोनों एक दूसरे की नजर में ऐसे कैद हुए कि हमसफर बन गए और फरजाना को भी एक नया नाम मिला समरू।

begum samru

सांकेतिक तस्वीर

कौन था वाल्टर रेनहार्ट

वाल्टर रेनहार्ट, ऑस्ट्रिया का रहने वाला था। फ्रेंच आर्मी के जरिए उसने अपने करियर की शुरुआत की थी। जब वो भारत आया तो मुगलों के खिलाफ बगावत के झंडे बुलंद हो रहे थे। बगावती तेवर कुचलने के लिए मुगल शासक यूरोप के भाड़े के सैनिकों की भर्ती कर रहे। रेनहार्ट उनमें से एक था। भारत में वो स्विस कॉर्प का हिस्सा बना लेकिन नौकरी रास नहीं आई और महज एक पखवाड़े में नौकरी छोड़ दी। कई जगहों पर उसने अपनी किस्मत आजमाई। लेकिन हाथ नाकामी लगी। किसी ने उसे बताया कि वो मीर कासिम की सेना में शामिल होकर मोटी कमाई कर सकता है। इन सबके बीच अंग्रेज भी धीरे धीरे बंगाल प्रेसीडेंसी में अपना दबदबा कायम कर रहे थे। उस वक्त पटना, बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा हुआ करता था। अंग्रेजो में खौफ पैदा करने के लिए मीर कासिम ने 1763 में रेनहार्ट को पटना भेजा और उसने बेरहमी से 150 अंग्रेजों को मार दिया। हैवानियत की वजह से उसे 'पटना का कसाई' नाम मिला। 1764 में बक्सर की निर्णायक लड़ाई में वो मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के वजीर मिर्जा नजफ खान की सेना का हिस्सा बना और उसे मेरठ में सरधना की जागीर मिली और उसके साथ ही उसे एक नया नाम भी मिला जिसके बाद उसे लोग समरू के नाम से जानने लगे।

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