Times Now Navbharat
live-tv
Premium

नवरात्रि का गरबा कैसे बना गुजरात की पहचान? गांव के आंगन से दुनिया तक कैसे पहुंचा यह नृत्य

गरबा नृत्य सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा से विकसित होकर आज गुजरात की सांस्कृतिक पहचान चुका है। इतना ही नहीं, यह बड़े कारोबार का हिस्सा भी बन गया है। लेकिन इस नृत्य ने आखिर यह उपलब्धि हासिल कैसे की।

Image
कैसे गुजरात की सांस्कृतिक पहचान बना गरबा (सांकेतिक फोटो)
Edited by: पूजा कुमारी
Updated Oct 12, 2026, 14:45 IST
Follow on Google News

Gujarat Garba in Navratri: नवरात्रि की रात, ढोल की गूंज, रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े और गोल घेरे में थिरकते लोगों के कदम। गुजरात में नवरात्रि पर गरबा का नजारा कुछ ऐसा ही होता है। लेकिन गरबा सिर्फ नवरात्रि में किया जाने वाला एक नृत्य यानी डांस नहीं है। इसके पीछे सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताएं, लोकपरंपराएं और गुजरात की सांस्कृतिक विरासत जुड़ी हुई है। समय के साथ गरबा का स्वरूप भी काफी बदल चुका है। कभी मंदिरों और घरों के आंगन में देवी की आराधना में किया जाने वाला गरबा आज बड़े मैदानों, भव्य आयोजनों और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंच चुका है। विदेशों में भी लोग गरबा नृत्य करना खूब पसंद करते हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि कभी घरों और मंदिरों तक सीमित रहने वाली यह परंपरा कैसे दुनिया भर में लोकप्रिय हुई? गरबा की कहानी सिर्फ एक लोकनृत्य के लोकप्रिय होने की कहानी नहीं है। यह धार्मिक आस्था, जीवन के चक्र, सामुदायिक भागीदारी और बदलती सांस्कृतिक परंपरा का सफर भी है।

क्या है गरबा और कहां से हुई इसकी शुरुआत?

गरबा गुजरात का पारंपरिक लोकनृत्य है, जिसका देवी दुर्गा और शक्ति की आराधना से बहुत गहरा संबंध है। 'गरबा' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'गर्भ' शब्द से जुड़ी हुई मानी जाती है, जिसका अर्थ गर्भ या कोख होता है। इसे जीवन के चक्र का प्रतीक माना जाता है। पारंपरिक गरबा में छेद वाले मिट्टी के मटके के भीतर दीपक रखा जाता है। इसे 'गर्भदीप' कहा जाता है। मटके और उसके अंदर जलती लौ को जीवन, आत्मा और दिव्य स्त्री शक्ति का प्रतीक माना जाता है। नृत्य करने वाले लोग इस दीपक के चारों ओर गोल घेरे में घूमते हैं। यह परंपरा नवरात्रि की नौ रातों में देवी दुर्गा की पूजा से विशेष रूप से जुड़ी हुई है।

गरबा की शुरुआत कब हुई, इसकी कोई निश्चित तारीख तो उपलब्ध नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, नृत्य विशेषज्ञ प्रोफेसर पारुल शाह ने बताया कि इस नृत्य की परंपरा को गुजरात के राजवंशों, ग्रामीण व कृषि समुदायों और कृष्ण से जुड़ी पुरानी नृत्य परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है। उनके अनुसार, करीब 700 साल पहले अंबाजी शक्तिपीठ की स्थापना के बाद देवी की आराधना में गरबा करने की परंपरा को भी विशेष महत्व मिलने लगा।

गांवों और गलियों से कैसे जुड़ा गरबा?

आज भले ही गरबा के बड़े-बड़े आयोजन होने लगे हैं, जहां महिलाएं हो या पुरुष, बच्चे हो या बुजुर्ग हर उम्र के लोग गरबा करते हुए दिखते हैं। लेकिन परंपरागत रूप से महिलाएं नवरात्रि के दौरान घरों और मंदिरों के आंगन में देवी की स्थापना करती थीं, आरती गाती थीं और फिर गरबा नृत्य करती थीं। धीरे-धीरे यह धार्मिक गतिविधि सामुदायिक जीवन का अहम हिस्सा बन गई। लोग एक जगह एकत्रित होते, गीत गाते और गोल घेरे में नृत्य करते। गरबा की यही सामूहिक प्रकृति आगे चलकर इसकी सबसे बड़ी पहचान बनी।

गरबा को लोकप्रिय बनाने में गुजरात की गलियों और मोहल्लों की भी अहम भूमिका रही है। अहमदाबाद की पुरानी बस्तियों और गलियों में होने वाले गरबा आयोजनों को ‘शेरी गरबा’ कहा जाता है। यहां नृत्य के लिए किसी बड़े मंच की जरूरत नहीं होती थी। मोहल्ले के लोग एकत्र होते और ढोल की थाप पर गरबा शुरू हो जाता। समय के साथ यह परंपरा शहरों में बड़े आयोजनों तक पहुंची। गरबा के साथ डांडिया रास और नृत्य की दूसरी शैलियां भी उत्सव का हिस्सा बनीं। रंगीन पारंपरिक कपड़े, संगीत और सामूहिक भागीदारी ने इसे और लोकप्रिय बनाया। इस तरह गरबा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा, बल्कि समुदाय के लोगों को एक साथ जोड़ने वाला उत्सव भी बन गया।

गुजरात से दुनिया तक कैसे पहुंचा गरबा?

समय के साथ गरबा के आयोजन का दायरा बढ़ता गया। शहरों में सामाजिक समूहों, युवा मंडलों, आवासीय परिसरों ने बड़े स्तर पर गरबा कार्यक्रम आयोजित करने शुरू किए। खुले मैदानों से लेकर बड़े वातानुकूलित आयोजनों तक इसका स्वरूप बदलता गया। संगीत, रंग-बिरंगी रोशनी, मंच और मशहूर गायकों ने इन कार्यक्रमों को नया रूप दिया। विदेशों में बसे गुजराती समुदायों के जरिए गरबा नृत्य कई देशों तक पहुंचा। आज नवरात्रि के दौरान भारत और विदेशों में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में सिर्फ गुजराती समुदाय ही नहीं बल्कि दूसरे समुदायों के लोग भी हिस्सा लेते हैं।

गरबा अब सिर्फ नवरात्रि तक सीमित नहीं रहा। इसे शादियों, पार्टियों और दूसरे सांस्कृतिक आयोजनों में भी किया जाता है। हालांकि, देवी की आराधना से जुड़ा पारंपरिक गरबा आज भी नवरात्रि के उत्सव का प्रमुख हिस्सा है। दिसंबर 2023 में गरबा को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल कर लिया गया। इस मान्यता ने गरबा की सांस्कृतिक अहमियत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान दिलाई।

परंपरा से करोड़ों के कारोबार तक का सफर

आज गुजरात में गरबा एक बड़े आर्थिक गतिविधि क्षेत्र का हिस्सा भी बन चुका है। नवरात्रि से पहले गरबा सिखाने के लिए क्लासेज शुरू हो जाती हैं। बाजार में पारंपरिक कपड़ों, गहनों और सजावटी सामान की मांग बढ़ जाती है। बड़े कार्यक्रमों में आयोजनकर्ता, कोरियोग्राफर, संगीतकार, साउंड व लाइट कंपनियां और खानपान से जुड़े कारोबारी भी शामिल होते हैं। हालांकि, गरबा के व्यावसायिक स्वरूप को लेकर मतभेद भी हैं। कुछ लोगों का मानना है कि बड़े मंचों, फैशन और मनोरंजन पर बढ़ते जोर से इसकी भक्ति वाली भावना पीछे छूट रही है। वहीं, पारंपरिक 'शेरी' और 'मंडली' गरबा की लोकप्रियता दिखाती है कि पुराने स्वरूप को लेकर भी आकर्षण बना हुआ है।

गुजरात की पहचान क्यों बना गरबा?

गरबा की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामुदायिक भावना है। इसमें लोग एक साथ नृत्य करते हैं, परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं और नवरात्रि के उत्सव में जोर-शोर से भाग लेते हैं। इसका स्वरूप समय के साथ बदला जरूर है, लेकिन देवी की आराधना, जीवन के प्रतीक और सामूहिक भागीदारी आज भी इसकी पहचान का अहम हिस्सा हैं। गांवों के आंगन से दुनिया के मंच तक पहुंचा गरबा नृत्य इस बात का उदाहरण भी पेश करता है कि कोई स्थानीय परंपरा अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भी वैश्विक पहचान हासिल कर सकती है। यही वजह है कि गरबा आज गुजरात की संस्कृति, आस्था और उत्सव का एक प्रमुख प्रतीक बन चुका है।

End of Article