Suvendu Adhikari : पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 का चुनाव एक बड़े राजनीतिक बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। करीब डेढ़ दशक तक सत्ता में रहने वाली ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को हराकर भाजपा पहली बार राज्य की सत्ता तक पहुंची है। इस जीत का सबसे बड़ा चेहरा बने हैं सुवेंदु अधिकारी,जो अब बंगाल के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने जा रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह बतौर भाजपा पर्यवेक्षक उनके नाम का एलान कर चुके हैं।
सुवेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना अचानक हुई घटना नहीं है। इसकी बुनियाद 2021 में ही पड़ गई थी, जब उन्होंने नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को हराया था। उस चुनाव में भाजपा सत्ता तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन सुवेंदु अधिकारी बंगाल में भाजपा के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे। पांच साल बाद 2026 में भाजपा ने न केवल बहुमत हासिल किया, बल्कि ममता बनर्जी को उनके मजबूत राजनीतिक इलाकों में चुनौती देकर बड़ा संदेश भी दिया। हालांकि चुनाव जीतना और सरकार चलाना दो अलग बातें हैं। बंगाल की राजनीति लंबे समय से टकराव, हिंसा और तीखी वैचारिक लड़ाई का केंद्र रही है। ऐसे में मुख्यमंत्री बनने के बाद सुवेंदु अधिकारी के सामने सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू होगी।
कानून-व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती
नई सरकार की पहली और सबसे अहम जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था को संभालना होगी। बंगाल में चुनावी हिंसा और राजनीतिक टकराव कोई नई बात नहीं है। सत्ता परिवर्तन के बाद कई जगहों पर तनाव और झड़पों की खबरें सामने आई हैं। खुद सुवेंदु अधिकारी के पीए की गोलीमार कर हत्या कर दी गई। भाजपा लगातार आरोप लगाती रही है कि राज्य में पुलिस और प्रशासन पर तृणमूल कांग्रेस का असर रहा है। अब जब भाजपा सरकार में है, तो सुवेंदु अधिकारी को यह साबित करना होगा कि प्रशासन राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करेगा। उनके सामने तो दोहरी चुनौती होगी, एक तरफ हिंसा और अराजकता पर नियंत्रण, दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना कि विपक्ष सरकार पर बदले की राजनीति के आरोप न लगा सके। अगर नई सरकार शुरुआत में ही शांति और स्थिरता कायम करने में सफल नहीं होती, तो उसकी राजनीतिक छवि को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए कानून-व्यवस्था को लेकर शुरुआती फैसले बेहद अहम माने जा रहे हैं।
आर्थिक स्थिति और वादों का दबाव
बंगाल की वित्तीय हालत पहले से ही खराब है। राज्य पर भारी कर्ज का बोझ है और इसी बार चुनाव में भाजपा ने कई बड़े वादे किए हैं। सबसे चर्चित वादा महिलाओं को हर महीने 3 हजार रुपये आर्थिक सहायता देने का है। यह योजना तृणमूल कांग्रेस की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना के मुकाबले पेश की गई थी। इसके अलावा भाजपा ने बेरोजगार युवाओं को हर महीने 3 हजार रुपये सहायता देने, बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने का भी वादा किया है। कर्मचारियों के लंबित डीए एरियर का भुगतान भी नई सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
वादे कर देना तो आसान है, लेकिन असल समस्या यह है कि इन योजनाओं को लागू करने के लिए भारी वित्तीय संसाधनों की जरूरत होगी। जो फिलहाल बंगाल सरकार के पास नहीं हैं। ऐसे में सरकार के सामने सवाल होगा कि वह विकास कार्यों, कल्याणकारी योजनाओं और सरकारी खर्चों के बीच संतुलन कैसे बनाए।
कटौती की तो जनता की नाराजगी भी झेलनी पड़ेगी
राजनीतिक तौर पर भी यह आसान नहीं होगा। बंगाल की बड़ी आबादी पिछले कई वर्षों से सामाजिक योजनाओं की आदी हो चुकी है। अगर नई सरकार इनमें कटौती करती है, तो जनता की नाराजगी बढ़ सकती है। इसलिए सुवेंदु अधिकारी को आर्थिक अनुशासन और जनकल्याण के बीच संतुलन साधना होगा।
नौकरशाही और प्रशासनिक ढांचे में बदलाव
15 साल तक एक ही सरकार रहने के बाद प्रशासनिक ढांचे पर उसका प्रभाव स्वाभाविक माना जाता है। भाजपा लंबे समय से आरोप लगाती रही है कि राज्य की नौकरशाही पर तृणमूल कांग्रेस का प्रभाव है। ऐसे में नई सरकार प्रशासनिक स्तर पर बड़े बदलाव कर सकती है। लेकिन यह काम आसान नहीं होगा। बड़े पैमाने पर तबादले और फेरबदल से प्रशासनिक अस्थिरता भी पैदा हो सकती है। सुवेंदु अधिकारी को यह तय करना होगा कि बदलाव की प्रक्रिया तेज भी रहे और शासन व्यवस्था प्रभावित भी न हो।मुख्यमंत्री के रूप में यह उनकी सबसे बड़ी प्रशासनिक परीक्षा होगी, क्योंकि विपक्ष हर फैसले पर नजर रखेगा।
सांप्रदायिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती
चुनाव प्रचार के दौरान सुवेंदु अधिकारी के कई बयान विवादों में रहे। भाजपा ने चुनाव में सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाया। इससे भाजपा का मुख्य समर्थक वर्ग मजबूत हुआ, लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष ने उस पर ध्रुवीकरण की राजनीति का आरोप लगाया। अब मुख्यमंत्री बनने के बाद सुवेंदु अधिकारी की भूमिका बदल जाएगी। उन्हें केवल भाजपा समर्थकों के नेता के रूप में नहीं, बल्कि पूरे राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में काम करना होगा। बंगाल सामाजिक और धार्मिक विविधता वाला राज्य है। ऐसे में उनकी हर नीति और बयान का असर व्यापक होगा।
अगर नई सरकार सभी समुदायों में भरोसा पैदा करने में सफल रहती है, तो यह भाजपा के लिए लंबे समय तक राजनीतिक फायदा दे सकता है। लेकिन अगर ध्रुवीकरण की राजनीति का माहौल बना रहता है, तो सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।
पार्टी के भीतर संतुलन
भाजपा की बंगाल इकाई लंबे समय से कई गुटों में बंटी हुई मानी जाती रही है। एक तरफ पुराने भाजपा नेता हैं, दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस से आए नेता। सुवेंदु अधिकारी खुद भी टीएमसी छोड़कर भाजपा में आए थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें सरकार चलाने के साथ-साथ पार्टी के भीतर संतुलन भी बनाए रखना होगा। अगर अंदरूनी असंतोष बढ़ता है, तो उसका असर सरकार पर पड़ सकता है। इसलिए मंत्रिमंडल गठन से लेकर संगठनात्मक फैसलों तक हर कदम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होगा।
युवाओं और शिक्षा व्यवस्था की उम्मीदें
बंगाल में शिक्षक भर्ती घोटाले और रोजगार के मुद्दे लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। भाजपा ने चुनाव में पारदर्शी भर्ती और रोजगार सृजन को बड़ा मुद्दा बनाया था। इसलिए अब युवाओं की उम्मीदें नई सरकार से काफी बढ़ गई हैं।सरकार के सामने चुनौती होगी कि वह शिक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करे और उद्योग तथा निवेश को बढ़ाकर रोजगार के अवसर पैदा करे। अगर इसमें सफलता मिलती है, तो भाजपा बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत कर सकती है।