क्रीमी लेयर सिद्धांत की वकालत करने पर अपने ही समुदाय से आलोचना का सामना करना पड़ा, बोले पूर्व CJI गवई
- Compiled by: अमित कुमार मंडल
- Updated Dec 7, 2025, 10:26 AM IST
पूर्व सीजेआई गवई ने कहा कि इंद्रा साहनी एवं अन्य बनाम भारत संघ मामले में क्रीमी लेयर सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया था, और एक अन्य मामले में उन्होंने स्वयं कहा था कि क्रीमी लेयर को अनुसूचित जातियों पर भी लागू किया जाना चाहिए।
Ex- CJI बीआर गवई (PTI)
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने कहा है कि अनुसूचित जातियों के आरक्षण में क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू होने संबंधी अपने फैसले पर उनके अपने ही समुदाय के लोगों द्वारा उनकी व्यापक आलोचना की गई है। गवई ने कहा कि डॉ. बी आर आंबेडकर के विचार में सकारात्मक कार्रवाई किसी पिछड़े व्यक्ति को साइकिल देने जैसा है। उन्होंने पूछा कि क्या आंबेडकर सोचते थे कि ऐसे व्यक्ति को कभी साइकिल नहीं छोड़नी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि आंबेडकर ऐसा नहीं सोचते थे।
हाल ही में मुख्य न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त हुए गवई शनिवार को मुंबई विश्वविद्यालय में "समान अवसर को बढ़ावा देने में सकारात्मक कार्रवाई की भूमिका" विषय पर व्याख्यान दे रहे थे। आंबेडकर की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए गवई ने कहा कि यह प्रतिष्ठित नेता न केवल भारतीय संविधान के निर्माता थे, बल्कि इसमें निहित सकारात्मक कार्रवाई के भी निर्माता थे।
अंबेडकर और साइकिल का दिया उदाहरण
उन्होंने पूछा, जहां तक सकारात्मक कार्रवाई का सवाल है, बाबासाहेब का मानना था कि यह उन लोगों को साइकिल देने जैसा है जो पीछे रह गए हैं... मान लीजिए कोई दसवें किलोमीटर पर है और कोई शून्य पर, तो उसे (जो व्यक्ति शून्य पर है) साइकिल दी जानी चाहिए, ताकि वह दसवें किलोमीटर तक तेजी से पहुंच सके। वहां से वह पहले से मौजूद व्यक्ति के साथ जुड़ जाता है और उसके साथ चलता है। क्या उन्होंने (अम्बेडकर ने) सोचा था कि व्यक्ति को साइकिल छोड़कर आगे नहीं बढ़ना चाहिए और इस तरह शून्य किलोमीटर पर मौजूद लोगों से वहीं रहने के लिए कहना चाहिए?
पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा, मेरे विचार से यह बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा परिकल्पित सामाजिक और आर्थिक न्याय का दृष्टिकोण नहीं था। वह औपचारिक रूप से नहीं, बल्कि वास्तविक अर्थों में सामाजिक और आर्थिक न्याय लाना चाहते थे। पूर्व सीजेआई गवई ने कहा कि इंद्रा साहनी एवं अन्य बनाम भारत संघ मामले में क्रीमी लेयर सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया था, और एक अन्य मामले में उन्होंने स्वयं कहा था कि क्रीमी लेयर को अनुसूचित जातियों पर भी लागू किया जाना चाहिए।
मेरे समुदाय के लोगों ने भी मेरी आलोचना की
सिद्धांत यह मांग करता है कि जो लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से पर्याप्त रूप से उन्नत हैं, उन्हें सकारात्मक कार्रवाई का लाभ नहीं मिलना चाहिए, भले ही वे उस पिछड़े समुदाय के सदस्य हों जिसके लिए यह योजना बनाई गई है। जस्टिस गवई ने कहा कि इस फैसले के लिए उनके अपने समुदाय के लोगों ने उनकी व्यापक आलोचना" की और उन पर खुद आरक्षण का लाभ उठाकर सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश बनने और फिर क्रीमी लेयर में आने वालों को बाहर करने की वकालत करने का आरोप लगाया गया।
HC SC जजों के संवैधानिक पद के लिए कोई आरक्षण नहीं
लेकिन इन लोगों को यह भी नहीं पता था कि उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के संवैधानिक पद के लिए कोई आरक्षण नहीं है। उन्होंने पूछा कि क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश या मुख्य सचिव के बेटे और ग्राम पंचायत के स्कूल में पढ़े मजदूर के बेटे पर एक ही पैमाना लागू करना संविधान में निहित समानता की कसौटी पर खरा उतर सकता है? हालांकि, गवई ने इस बात पर जोर दिया कि पिछले 75 वर्षों में निसंदेह सकारात्मक कार्रवाई ने सकारात्मक भूमिका निभाई है।
उन्होंने कहा, मैंने पूरे देश की यात्रा की है, दुनिया भर की यात्रा की है, मैंने अनुसूचित जाति के कई लोगों को मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, राजदूत और उच्चायुक्त बनते देखा है। गवई ने कहा कि महाराष्ट्र समाज सुधारकों की भूमि है और इस क्षेत्र को वास्तव में आधुनिक भारत के विचार का जन्मस्थान कहा जा सकता है। उन्होंने कहा, हम सभी ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले के समाज में असमानताओं के उन्मूलन में अग्रणी कार्य से परिचित हैं। उन्होंने कहा कि जब महिलाएं समाज में सबसे अधिक उत्पीड़ित थीं, तब फुले दंपत्ति ने ही उनके लिए शिक्षा के द्वार खोले।
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