Fire in Forest: गर्मी आते ही जंगल में आग लगने की घटनाएं तेज हो जाती हैं। पहाड़ी राज्यों के जंगल आग से धधकने लगते हैं। आग की चपेट में आए जंगल सैंकड़ों किलोमीटर तक स्वाहा हो जाते हैं। कई दिनों के मशक्कत के बाद जंगल की आग तो बुझ जाती है लेकिन तब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। जंगल की यह आग बार-बार और हर साल लगती है। जंगल में आग रोकने के लिए सरकार की तरफ से किए जाने वाले सारे उपाय नाकाम साबित हो जाते हैं। उत्तराखंड, हिमाचल,जम्मू कश्मीर और कई राज्यों के सैकडों मील में फैले जंगलों में बार-बार लगने वाली आग की घटनाएं सवाल भी खड़े करती हैं। सवाल उठता है कि जंगल में यह आग प्राकृतिक आपदा है यानी यह एक कुदरती घटना है या मनुष्यों द्वारा खड़ी की गई समस्या। तमाम रिपोर्टों और शोधों के देखने से यही पता चलता है कि जंगल में आग की घटनाओं के लिए दोनों ही जिम्मेदार हैं। खासकर, जंगल से कमाई की इंसानों की लालसा प्रकृति के विनाश की पटकथा लिखती है।
हाल के दिनों में जंगल में आग की घटनाएं
- 27 मई कसौली के जंगल में लगी भीषण आग
- उत्तराखंड के उत्तरकाशी में जंगल की आग गंगोत्री हाईवे तक पहुंची
- चमोली, देहरादून और पौड़ी जिलों के जंगल में लगी आग
- उत्तराखंड में इस साल जंगलों में आग की 388 घटनाएं
- जम्मू कश्मीर के उधमपुर के नर्थन क्षेत्र में आग
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कसौली के जंगल में लगी भीषण आग
हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के कसौली क्षेत्र में 27 मई कसौली के जंगल में लगी भीषण आग लग गई। 15 घंटे तक आग धधकती रही और यह सैन्य ठिकानों और रिहाईशी इलाकों तक फैल गई। जिसके बाद वायुसेना को राहत अभियान में उतरना पड़ा। हिमाचल प्रदेस के मैदानी और निचले इलाकों में चीड़ के जंगलों की अधिकता के कारण आग की घटनाएं अधिक हो रही हैं जबकि देवदार के जंलों में भी आग तेजी से फैल रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक हिमाचल प्रदेश में इस साल 232 छोटे-बड़े फॉरेस्ट फायर दर्ज हुए हैं। करीब 2900 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुए हैं और 67 लाख रुपए का नुकसान हुआ है। सबसे ज्यादा घटनाएं मंडी, धर्माशाला, शिमला और सोलन में दर्ज हुए हैं।
अवैध मिट्टी खुदाई माफियाओं पर आरोप
जंगल में आग लगने की घटनाओं पर वन कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविदों की अपनी राय है। ये इसे केवल प्राकृतिक आपदा के रूप में नहीं देखते। जंगल की आग के पीछे वे अवैध मिट्टी खुदाई (अर्थ एक्सकेवेशन) माफियाओं का हाथ देखते हैं। उनका कहना है कि खुदाई के लिए जमीन खाली कराने के मकसद से पेड़ों में आग लगा दी जाती है। इससे न केवल हरे-भरे पहाड़ और वन क्षेत्र नष्ट होते हैं, बल्कि वन्यजीवों पर भी खतरा बढ़ जाता है। प्रदूषण अलग से फैलता है। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि ऐसे कई मामलों में वन विभाग प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहता है। कुछ पर्यावरण एक्टिविस्ट मानते हैं कि आदिवासी लोग जंगलों में जाते हैं और सूखी घास पर बीड़ी-सिगरेट के टुकड़े फेंक देते हैं, इनसे भी आग लग जाती है।
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जली हुई लकड़ी की अवैध बिक्री से करोड़ों रुपये की कमाई
आरोप यह भी लगता है कि जंगल में आग लगाने के लिए वन माफिया नाबालिग बच्चों का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि कानून के तहत उन्हें कड़ी सजा नहीं मिल पाती। आरोपों के अनुसार, जंगलों में आग लगने से सबसे अधिक फायदा भूमि और लकड़ी (टिंबर) माफिया को होता है। आग के कारण जब किसी क्षेत्र की वनस्पति और वन्यजीव नष्ट हो जाते हैं, तो वहां परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी हासिल करना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। इसके अलावा, आग में जली हुई लकड़ी की अवैध बिक्री से करोड़ों रुपये की कमाई होती है। पर्यावरणविदों का मानना है कि बिगड़ती जलवायु परिस्थितियों ने मानवजनित नुकसान को और बढ़ा दिया है। उसके अनुसार, वनों की कटाई, बढ़ता तापमान, जल स्रोतों की कमी और घटती बर्फबारी ने जंगलों को अधिक संवेदनशील बना दिया, जिससे वनाग्नि की घटनाएं बढ़ीं। भीषण गर्मी, शुष्क सर्दी और कम वर्षा ने भी जंगलों में आग बढ़ाने का काम किया है। पर्यटन गतिविधियों के लिए जल स्रोतों का मोड़ना मिट्टी को और अधिक शुष्क बना रहा है।
टिंबर माफियाओं की सुनियोजित साजिश है आग?
साथ ही, अत्यधिक ज्वलनशील चीड़ (पाइन) के पेड़ों का बड़े पैमाने पर रोपण भी आग के तेजी से फैलने का एक कारण माना जाता है। जंगलों से होकर गुजरने वाली उच्च वोल्टेज विद्युत लाइनें सरकारी एजेंसियों की अवैज्ञानिक योजना का उदाहरण हैं। बिजली की तारें भी कई बार जंगलों में आग लगने का कारण बनती हैं। कुछ मामलों में यह आरोप भी लगाया गया कि विनाशकारी आग कोई प्राकृतिक दुर्घटना नहीं, बल्कि टिंबर माफिया की सुनियोजित साजिश होती है। आरोपों के अनुसार, बिल्डर चाहते हैं कि पेड़ जल जाएं ताकि जमीन मालिक ग्रामीण जली हुई लकड़ी बेचने को मजबूर हो जाएं और भूमि निर्माण कार्यों के लिए खाली हो जाए। कई मामलों में ग्रामीणों और लकड़ी तस्करों के बीच सांठगांठ होने की भी बात कही जाती है। कानून द्वारा संरक्षित पेड़ों की लकड़ी अवैध बाजार में करोड़ों रुपये में बिकती है, जिससे इस पूरे नेटवर्क को भारी आर्थिक लाभ होता है।
