नई दिल्ली। डिजिटल दुनिया में लोगों की निजी जानकारी की सुरक्षा कितनी जरूरी है और जनहित से जुड़े मामलों में उस जानकारी तक जनता की पहुंच कितनी होनी चाहिए? इन दोनों सवालों के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 और इससे जुड़े नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। 27 अक्टूबर को शीर्ष अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा।
DNPA देश के 21 प्रमुख समाचार संगठनों का प्रतिनिधित्व करता है। एसोसिएशन की मुख्य आपत्ति यह है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं दी गई है। इससे खोजी पत्रकारिता, सार्वजनिक हित से जुड़ी खबरों और सूचना के अधिकार (RTI) के इस्तेमाल पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। ऐसे में हम आपको बताएंगे कि आखिर यह कानून क्या है? न्यूज पब्लिशर्स को इससे क्या आपत्ति है? इसके नियमों में ऐसा क्या है, जिसे लेकर विवाद हो रहा है? और इसका सूचना के अधिकार यानी RTI पर क्या असर पड़ सकता है? आइए समझते हैं....
क्या है DPDP एक्ट और इसे क्यों बनाया गया?
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 का मकसद लोगों की डिजिटल व्यक्तिगत जानकारी को सुरक्षित रखना और उसके इस्तेमाल के लिए नियम तय करना है। संसद ने अगस्त 2023 में इस कानून को पारित किया था।आज के समय में मोबाइल ऐप, वेबसाइट, ऑनलाइन सेवाओं और अलग-अलग डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए लोगों की बड़ी मात्रा में निजी जानकारी इकट्ठा की जाती है। इसमें नाम, संपर्क विवरण और दूसरी व्यक्तिगत जानकारियां शामिल हो सकती हैं। इनका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जाएगा,इन्हें कैसे सुरक्षित रखा जाएगा और इनके दुरुपयोग की स्थिति में क्या कार्रवाई होगी, कानून का दायरा इन्हीं सवालों से जुड़ा है।
इस कानून के तहत व्यक्तिगत डेटा को एकत्र करने, इस्तेमाल करने या किसी अन्य तरीके से प्रोसेस करने वाली संस्था को सामान्यतः 'डेटा फिड्यूशियरी' कहा जाता है। ऐसी संस्थाओं को कानून में तय जिम्मेदारियों का पालन करना होता है।
व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल संबंधित व्यक्ति की सहमति से या कानून में निर्धारित कुछ वैध उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। एक्ट के सेक्शन 7 में ऐसे कुछ वैध इस्तेमाल का उल्लेख है। नियमों का उल्लंघन करने पर संबंधित संस्था पर भारी आर्थिक जुर्माना भी लगाया जा सकता है। कुछ उल्लंघनों के लिए अधिकतम जुर्माना 250 करोड़ रुपये तक निर्धारित है।
केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 13 नवंबर 2025 को इस कानून से जुड़े नियम अधिसूचित किए थे। इनके प्रावधानों को 18 महीने की अवधि में चरणबद्ध तरीके से लागू करने का कार्यक्रम रखा गया। इस कानून का उद्देश्य लोगों की निजता की रक्षा करना है, लेकिन इसके कुछ प्रावधानों को लेकर अब यह सवाल उठ रहा है कि व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल पर लगने वाली शर्तें पत्रकारिता और जनहित में जानकारी जुटाने की प्रक्रिया को किस हद तक प्रभावित कर सकती हैं।
न्यूज पब्लिशर्स को किस बात का डर है?
DNPA की याचिका में सबसे महत्वपूर्ण आपत्ति पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने को लेकर है। एसोसिएशन का कहना है कि खबरों की पड़ताल करते समय पत्रकारों को कई बार ऐसी व्यक्तिगत जानकारी की जरूरत पड़ती है, जो किसी बड़े सार्वजनिक मामले से जुड़ी होती है।इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। मान लीजिए कि कोई पत्रकार किसी सरकारी विभाग में कथित भ्रष्टाचार की जांच कर रहा है। मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए उसे अधिकारियों के रिकॉर्ड, संपत्ति से जुड़े दस्तावेज या दूसरे संबंधित विवरण जुटाने पड़ सकते हैं। इसी तरह, किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के कामकाज की जांच के दौरान भी व्यक्तिगत जानकारी सामने आ सकती है।
ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि क्या पत्रकार को संबंधित व्यक्ति की सहमति लेनी होगी? अगर सहमति नहीं मिलती, तो क्या वह जानकारी प्रकाशित की जा सकेगी? और यदि कोई जानकारी सार्वजनिक हित के लिए जरूरी है,तो उसे सामने लाने का रास्ता क्या होगा? इन सवालों को लेकर न्यूज पब्लिशर्स को आशंका है कि कानून की कुछ व्याख्याएं पत्रकारिता के काम को मुश्किल बना सकती हैं। खासकर खोजी रिपोर्टिंग में दस्तावेजों की पड़ताल और तथ्यों की पुष्टि करने की प्रक्रिया प्रभावित होने का खतरा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कानून का मतलब यह नहीं है कि हर खबर प्रकाशित करने से पहले हर परिस्थिति में संबंधित व्यक्ति की सहमति लेना अनिवार्य है।
पहले के मसौदों में पत्रकारिता को छूट देने का प्रावधान था?
DNPA ने अपनी याचिका में डेटा संरक्षण कानून के पुराने मसौदों का भी हवाला दिया है। एसोसिएशन के मुताबिक, 2018, 2019 और 2021 में सामने आए मसौदों में पत्रकारिता से संबंधित छूट का प्रावधान शामिल था। लेकिन 2023 में पारित अंतिम कानून में पत्रकारिता के लिए इसी तरह की स्पष्ट छूट नहीं रखी गई।
न्यूज पब्लिशर्स का तर्क है कि पत्रकारिता का काम केवल किसी व्यक्ति की जानकारी इकट्ठा करने तक सीमित नहीं होता। कई बार सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में उन तथ्यों की पड़ताल करनी पड़ती है, जिन्हें संबंधित लोग या संस्थाएं सार्वजनिक नहीं करना चाहते।
यदि ऐसी जानकारी जुटाने और उसका इस्तेमाल करने पर डेटा संरक्षण से जुड़ी शर्तें लागू होती हैं, तो पत्रकारों के सामने कानूनी सवाल खड़े हो सकते हैं। DNPA का कहना है कि इससे उन खबरों पर भी असर पड़ने की आशंका है, जिनका उद्देश्य किसी गड़बड़ी को सामने लाना या सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही तय करना है।
DPDP नियमों का नियम 23 विवाद में क्यों है?
डेटा संरक्षण कानून के साथ अधिसूचित नियमों में नियम 23 भी विवाद का हिस्सा है। यह DPDP एक्ट के सेक्शन 36 से जुड़ा है। इस प्रावधान के तहत केंद्र सरकार किसी अधिकृत व्यक्ति के माध्यम से डेटा फिड्यूशियरी या किसी मध्यस्थ से जानकारी मांग सकती है। इसके साथ ही, कुछ परिस्थितियों में संबंधित संस्था को जानकारी मांगने से जुड़ी बात का खुलासा करने से भी रोका जा सकता है।
DNPA की चिंता है कि इस तरह की व्यवस्था का इस्तेमाल किस सीमा तक होगा और इससे समाचार संगठनों के कामकाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। मसलन, किसी समाचार संगठन के पास किसी सार्वजनिक मामले से जुड़ी जानकारी है और सरकार उससे विवरण मांगती है। यदि संगठन को इस मांग के बारे में बताने से भी रोक दिया जाता है, तो पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
RTI कानून में बदलाव को लेकर क्या है विवाद?
DNPA की याचिका में सूचना का अधिकार कानून में किए गए बदलाव को भी चुनौती दी गई है। यह संशोधन DPDP एक्ट के सेक्शन 44(3) के जरिए किया गया था। इस बदलाव को समझने के लिए RTI एक्ट के सेक्शन 8(1)(j) को देखना जरूरी है। इसी प्रावधान में व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचनाओं को सार्वजनिक करने से जुड़ी छूट निर्धारित की गई है।पहले के प्रावधान के तहत यह देखा जाता था कि मांगी गई जानकारी का सार्वजनिक गतिविधि से संबंध है या नहीं और उसे जारी करने से किसी व्यक्ति की निजता में अनुचित हस्तक्षेप होगा या नहीं। साथ ही,व्यापक जनहित में जानकारी सार्वजनिक करने की गुंजाइश भी मौजूद थी। संशोधित प्रावधान में व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचना को छूट देने के लिए अलग भाषा का इस्तेमाल किया गया है। DNPA का कहना है कि इससे RTI के जरिए ऐसी जानकारी हासिल करने की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं, जो किसी सार्वजनिक मामले की जांच या सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही तय करने के लिए जरूरी हो।
आम लोगों और पत्रकारिता पर क्या पड़ सकता है असर?
इस विवाद का असर केवल समाचार संगठनों तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यह सवाल भी है कि नागरिकों को सार्वजनिक महत्व के मामलों की जानकारी कैसे मिलेगी और उनकी निजी जानकारी की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी।पत्रकारिता पर संभावित असर
यदि पत्रकारों को सार्वजनिक हित से जुड़ी खबरों के लिए व्यक्तिगत डेटा इस्तेमाल करने में कानूनी अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है, तो खोजी रिपोर्टिंग और दस्तावेजों की पड़ताल कठिन हो सकती है।
RTI आवेदनों पर संभावित असर
व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित सूचनाओं पर छूट का दायरा बढ़ने से कुछ RTI आवेदनों में जानकारी हासिल करना मुश्किल हो सकता है। विशेष रूप से उन मामलों में विवाद उठ सकता है, जहां आवेदक व्यक्तिगत जानकारी और सार्वजनिक हित के बीच संबंध स्थापित करना चाहते हैं।
निजता की सुरक्षा
दूसरी ओर,डिजिटल डेटा संरक्षण कानून का उद्देश्य लोगों की निजी जानकारी के अनधिकृत इस्तेमाल और उसके दुरुपयोग को रोकना है। व्यक्तिगत डेटा के संरक्षण से नागरिकों की निजता को सुरक्षा मिल सकती है।
अब सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने 27 अक्टूबर को DNPA की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अब मामले में केंद्र का पक्ष और याचिका में उठाए गए कानूनी सवाल महत्वपूर्ण होंगे। अदालत के सामने व्यापक मुद्दा यह है कि डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों और पत्रकारिता व सूचना के अधिकार के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए।