बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री अपने धार्मिक प्रवचनों और हिंदू राष्ट्र से जुड़े विचारों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इन दिनों उनकी चर्चा किसी धार्मिक आयोजन या कथा के कारण नहीं, बल्कि उनके बयानों को लेकर हो रही है। बीते करीब दो हफ्तों में एक के बाद एक उनके ऐसे-ऐसे बयान सामने आए, जिन पर लोगों ने सवाल उठाए और प्रतिक्रियाएं भी दीं।
करवा चौथ के पारंपरिक नाम को 'खसम पूजन दिवस' बताने से लेकर धार्मिक आस्था को ट्रेंड और फैशन से जोड़ने तक, धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणियां अलग-अलग वजहों से सुर्खियों में रहीं। आखिर इन बयानों में ऐसा क्या था, जिसने बाबा बागेश्वर को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया?
करवा चौथ पर टिप्पणी से शुरू हुई चर्चा
करवा चौथ को लेकर धीरेंद्र शास्त्री की टिप्पणी ने धार्मिक और सामाजिक बहस को जन्म दिया। एक नवविवाहित श्रद्धालु ने उनसे पूछा था कि क्या उसकी पत्नी करवा चौथ का व्रत रख सकती है। इस सवाल के जवाब में बाबा ने त्योहार को 'खसम पूजन दिवस' कह दिया। इसके बाद उन्होंने यह भी कहा कि महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए साल में एक दिन व्रत रखती हैं, लेकिन बाकी 364 दिन पतियों को ताने सुनाती हैं। यह टिप्पणी उन्होंने मजाकिया अंदाज में की थी, लेकिन इस पर साध्वी हर्षा रिछारिया ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि संतों को सार्वजनिक मंचों से बोलते समय शब्दों की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। इस तरह करवा चौथ पर एक टिप्पणी ने महिलाओं के सम्मान और धार्मिक मंचों पर इस्तेमाल होने वाली भाषा को लेकर बहस छेड़ दी।
धार्मिक आस्था या बदलता ट्रेंड?
धीरेंद्र शास्त्री के एक अन्य बयान में धार्मिक आस्था के बदलते स्वरूप का जिक्र सामने आया। उन्होंने साईं बाबा, खाटू श्याम और नीम करौली बाबा का उदाहरण देते हुए कहा कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग धार्मिक हस्तियों की लोकप्रियता बढ़ती रही है। पहले साईं बाबा की चर्चा थी, फिर खाटू श्याम बाबा का दौर आया और अब नीम करौली बाबा की लोकप्रियता की बात हो रही है। यहां कोई परमानेंट नहीं हैं। इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने धार्मिक लोकप्रियता को ट्रेंड और फैशन से जोड़कर देखा। बयान के बाद सवाल उठे कि क्या धार्मिक आस्था और संतों की लोकप्रियता को इस तरह बदलते ट्रेंड के नजरिए से देखना उचित है? हालांकि, इस टिप्पणी का संदर्भ धार्मिक हस्तियों के प्रति लोगों के आकर्षण में बदलाव से जुड़ा था।
समाजसेवा पर तंज: मदद छोटी, प्रचार बड़ा?
समाजसेवा के नाम पर होने वाले दिखावे को लेकर भी धीरेंद्र शास्त्री ने अपनी बात रखी। उन्होंने ऐसे लोगों पर निशाना साधा, जो जरूरतमंदों की मदद तो करते हैं, लेकिन उस मदद को प्रचारित करने के लिए बड़ी संख्या में कैमरे और लोगों को साथ लेकर पहुंचते हैं। बाबा ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि किसी को एक केला देने के लिए छह समाजसेवी और 40 कैमरे पहुंच जाते हैं। उनकी टिप्पणी का मकसद समाजसेवा के नाम पर प्रचार की प्रवृत्ति पर सवाल उठाना था। यानी जरूरतमंद की मदद से ज्यादा उस मदद को सार्वजनिक रूप से दिखाने पर जोर दिया जाता है। इस बयान ने समाजसेवा में दिखावे और वास्तविक मदद के बीच के अंतर को लेकर चर्चा छेड़ दी।
हिंदू समाज के भीतर ही बंटवारे पर सवाल
धीरेंद्र शास्त्री ने हिंदू समाज की एकता को लेकर भी टिप्पणी की। दतिया में मां बगलामुखी के दर्शन के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि हिंदुओं को मुसलमानों या ईसाइयों से नहीं, बल्कि हिंदुओं से ही खतरा है। उन्होंने इस खतरे की वजह समाज के भीतर जातिवाद और आपसी मतभेदों को बताया। अपनी बात समझाने के लिए उन्होंने मुर्गे का उदाहरण दिया और कहा कि जो सुबह जगाता है, उसे ही काट दिया जाता है। इस बयान के जरिए उन्होंने हिंदू समाज के भीतर मौजूद जातिगत विभाजन और आपसी बंटवारे पर ध्यान दिलाने की कोशिश की।
युवाओं को दी ऐसी सलाह, नारी को लेकर उठे सवाल
युवाओं को लेकर धीरेंद्र शास्त्री की एक और टिप्पणी चर्चा में रही। उन्होंने युवाओं को नशा, नींद और नारी से बचने की सलाह दी। उनके मुताबिक, ये चीजें युवाओं की प्रगति में बाधा बन सकती हैं। लेकिन इस बयान में नारी को नशे और नींद के साथ एक ही श्रेणी में रखे जाने पर सवाल उठे। साध्वी हर्षा रिछारिया ने भी इस तरह की भाषा पर आपत्ति जताई। युवाओं को अनुशासन और लक्ष्य के प्रति समर्पण का संदेश देने की कोशिश में महिलाओं को इस तरह प्रस्तुत करना कितना उचित है? यही सवाल इस बयान के बाद चर्चा में आया।
पुलिस की ड्यूटी पर भी किया मजाक
धीरेंद्र शास्त्री का एक बयान पुलिसकर्मियों की ड्यूटी और उनके पारिवारिक जीवन से जुड़ा था। करैरा की श्रीराम कथा के दौरान उन्होंने पुलिस की जिम्मेदारियों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी की घरवाली भाग जाए या किसी का लड़का गायब हो जाए, तो टेंशन पुलिस को होती है। उनका इशारा इस बात की ओर था कि पुलिसकर्मियों को दूसरों की समस्याओं और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारियों के बीच अपनी निजी जिंदगी के लिए समय निकालना मुश्किल होता है। उन्होंने करवा चौथ पर ड्यूटी में लगे पुलिसकर्मियों का उदाहरण भी दिया। यह टिप्पणी भी उनके खास अंदाज में की गई, जिसमें पुलिस की व्यस्तता और जिम्मेदारियों पर मजाकिया बात कही गई।
धार्मिक मंचों से दिए जाने वाले बयानों की जिम्मेदारी कितनी बड़ी?
धीरेंद्र शास्त्री के इन बयानों को लेकर प्रतिक्रियाएं भी अलग-अलग रहीं। कुछ टिप्पणियों को मजाकिया अंदाज में कही गई बात माना गया, तो कुछ पर भाषा और सामाजिक प्रभाव को लेकर सवाल उठे। धीरेंद्र शास्त्री जैसे धार्मिक वक्ताओं के मंचों से बड़ी संख्या में लोग जुड़ते हैं। ऐसे में उनकी टिप्पणियां केवल किसी कथा या प्रवचन तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि समाज में व्यापक चर्चा का हिस्सा बन जाती हैं। यही वजह है कि उनके हालिया बयानों के बीच एक बड़ा सवाल सामने आता है कि धार्मिक मंचों से समाज को संदेश देने वाले संतों के लिए भाषा की मर्यादा और शब्दों की जिम्मेदारी कितनी जरूरी है? आखिर धार्मिक प्रवचन केवल आस्था का विषय नहीं होते, बल्कि उनमें कही गई बातें लोगों की सोच और सामाजिक व्यवहार को भी प्रभावित कर सकती हैं।