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World Lung Cancer Day: लंग कैंसर सिर्फ स्मोकर्स की बीमारी नहीं! जानें भारत में क्यों बढ़ रहे 'Never Smokers' के मामले

विश्व लंग कैंसर दिवस पर जानिए क्यों लंग कैंसर अब सिर्फ स्मोकर्स की बीमारी नहीं रहा। भारत में नॉन-स्मोकर्स के मामलों में भी बढ़ोतरी देखी जा रही है। हम आपको इस गंभीर रोग के बारे में विस्तार से बताएंगे।

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नॉन स्मोकर्स में भी लंग कैंसर का खतरा
Authored by: gulshan kumar
Updated Aug 1, 2026, 13:44 IST
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World Lung Cancer Day: मैंने कभी सिगरेट नहीं पी, फिर मुझे लंग कैंसर कैसे हो सकता है? ऐसा आपने अक्सर कई लोगों से सुना होगा। दिल्ली में रहने वाली 38 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल रिया (बदला हुआ नाम) के मन में यही सवाल था। पिछले चार महीनों से उन्हें सूखी खांसी थी। ऑफिस का तनाव, देर रात तक काम और दिल्ली की हवा - उन्होंने हर वजह खोज ली, लेकिन डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं समझी। जब सीटी स्कैन हुआ तो पता चला कि फेफड़े में एक छोटा-सा नोड्यूल है। आगे की जांच में Lung Adenocarcinoma की पुष्टि हुई। इसमें भी सबसे हैरान करने वाली बात है कि रिया ने जीवन में कभी धूम्रपान नहीं किया था। यह कहानी आज हजारों भारतीय परिवारों की सच्चाई बनती जा रही है। आज विश्व लंग कैंसर दिवस के मौके पर हम आपको नॉन स्मोकिंग लंग कैंसर के बारे में विस्तार से समझाएंगे।

भारत में बदल रही है लंग कैंसर की तस्वीर

लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि लंग कैंसर केवल स्मोकर्स की बीमारी है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऑन्कोलॉजिस्ट एक अलग ट्रेंड देख रहे हैं। भारत के प्रमुख कैंसर केंद्रों और कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह सामने आया है कि Never Smokers, खासकर महिलाओं और अपेक्षाकृत कम उम्र के लोगों में Lung Adenocarcinoma के मामले बढ़ रहे हैं। भारतीय और एशियाई मरीजों में EGFR Gene Mutation पश्चिमी देशों की तुलना में अधिक पाया जाता है, जिससे इलाज की रणनीति भी बदल जाती है। यानी आज सवाल सिर्फ 'क्या आप स्मोकिंग करते हैं?' नहीं है, बल्कि 'आप किस तरह के वातावरण में रहते हैं?' ये भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।

डॉ. अक्षय बुधराजा के अनुसार, लंग कैंसर को केवल स्मोकर्स की बीमारी मानना एक बड़ी गलतफहमी है। आज भारत में ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है जिन्होंने जीवन में कभी धूम्रपान नहीं किया। इसके पीछे वायु प्रदूषण, पैसिव स्मोकिंग, घर के अंदर बायोमास ईंधन का धुआं, कुछ आनुवंशिक बदलाव और पर्यावरणीय जोखिम अहम कारण हो सकते हैं। लगातार तीन सप्ताह से अधिक खांसी, खून के साथ बलगम, सांस फूलना या बिना कारण वजन घटना जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर जांच और शुरुआती चरण में पहचान होने पर लंग कैंसर का इलाज पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी हो गया है। इसलिए केवल धूम्रपान न करने के आधार पर खुद को पूरी तरह सुरक्षित मानना सही नहीं है।"

किसे कहा जाता है 'Never Smoker'

मेडिकल परिभाषा के अनुसार, Never Smoker वह व्यक्ति होता है जिसने जीवनभर नियमित धूम्रपान नहीं किया या कुल मिलाकर 100 से कम सिगरेट पी हों। ऐसे लोगों में भी लंग कैंसर हो सकता है और इसके कारण पारंपरिक स्मोकिंग से अलग हो सकते हैं। जानें आसपास के तीन बड़े खतरे जो फेफड़ों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

1. पर्यावरणीय कारण (Environmental Risk)

भारत के कई शहरों में PM2.5 का स्तर लंबे समय तक सुरक्षित सीमा से ऊपर रहता है। ये सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई तक पहुंचकर लगातार सूजन और कोशिकीय क्षति पैदा कर सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी लंबे समय तक खराब वायु गुणवत्ता को फेफड़ों के कैंसर के जोखिम कारकों में शामिल किया है।

इनडोर एयर पॉल्यूशन

अक्सर लोग मानते हैं कि घर सबसे सुरक्षित जगह है, लेकिन कई घरों में हवा उतनी साफ नहीं होती जितना हम सोचते हैं। यहां जोखिम बढ़ाने वाले कुछ कारक मुख्य हैं।

  • खराब वेंटिलेशन
  • ठोस ईंधन (लकड़ी, कोयला, बायोमास) का धुआं
  • रसोई में लगातार तेल का धुआं
  • अगरबत्ती या धूप का अत्यधिक उपयोग
  • कुछ पेंट, फर्नीचर और क्लीनिंग प्रोडक्ट्स से निकलने वाले Volatile Organic Compounds (VOCs)
  • कुछ क्षेत्रों में भवनों के निचले हिस्सों में Radon Gas का जोखिम

2. जैविक कारण (Biological Risk)

EGFR Mutation इतना महत्वपूर्ण क्यों है, यदि आप भी यही सोच रहे हैं, तो आपको जान लेना चाहिए कि, Never Smokers में पाया जाने वाला सबसे चर्चित बदलाव EGFR (Epidermal Growth Factor Receptor) Gene Mutation है।

एक्सपर्ट्स के अनुसार, यह बदलाव एशियाई मरीजों में अपेक्षाकृत अधिक देखा जाता है। महिलाओं में इसकी संभावना कुछ अध्ययनों में अधिक पाई गई है। ऐसे मामलों में Targeted Therapy कई मरीजों के लिए बेहतर उपचार विकल्प बन सकती है। यानी हर लंग कैंसर एक जैसा नहीं होता और हर मरीज का इलाज भी समान नहीं होना चाहिए।

क्यों बढ़ रहा नॉन स्मोकिंग लंग कैंसर?

क्यों बढ़ रहा नॉन स्मोकिंग लंग कैंसर?

3. लाइफस्टाइल और एक्सपोजर

सेकेंड हैंड स्मोक, कार्यस्थल पर एस्बेस्टस, सिलिका या डीजल धुएं का संपर्क, लंबे समय तक खराब एयर क्वालिटी में रहना और परिवार में कैंसर का इतिहास ये कुछ कारण हैं, जो लंग कैंसर की एक वजह बन सकते हैं। डॉ. अक्षय बुधराजा कहते हैं कि 'आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लोग लंग कैंसर को केवल धूम्रपान से जोड़कर देखते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि प्रदूषण, सेकेंड हैंड स्मोक, आनुवंशिक बदलाव और पर्यावरणीय जोखिमों के कारण Never Smokers में भी लंग कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। यदि तीन सप्ताह से अधिक समय तक खांसी, सांस फूलना, सीने में दर्द या बार-बार फेफड़ों का संक्रमण हो रहा है तो स्वयं दवा लेने के बजाय विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। समय पर पहचान उपचार के परिणामों को काफी बेहतर बना सकती है।'

लक्षण जो बिल्कुल भी इग्नोर न करें

  • लगातार 3 सप्ताह से अधिक खांसी
  • खून वाली खांसी
  • सांस फूलना
  • सीने में दर्द
  • आवाज बैठ जाना
  • बिना वजह वजन कम होना
  • बार-बार निमोनिया
  • लगातार थकान

Chest X-Ray या Low-Dose CT- कौन-सी जांच कब कराएं?

जांचक्या पता चलता है?सीमा / ध्यान देने योग्य बात
Chest X-Rayफेफड़ों में बड़े बदलाव, संक्रमण या स्पष्ट असामान्यताओं का पता लगाने में मदद करता है।शुरुआती चरण के छोटे नोड्यूल या सूक्ष्म बदलाव छूट सकते हैं। सामान्य रिपोर्ट आने का मतलब हमेशा यह नहीं कि लंग कैंसर पूरी तरह खारिज हो गया है।
Low-Dose CT (LDCT)छोटे नोड्यूल और शुरुआती चरण के फेफड़ों के बदलाव पहचानने में Chest X-Ray की तुलना में अधिक संवेदनशील माना जाता है।यह सभी लोगों के लिए रूटीन स्क्रीनिंग टेस्ट नहीं है। इसकी आवश्यकता व्यक्ति के जोखिम, लक्षण और मेडिकल हिस्ट्री के आधार पर डॉक्टर तय करते हैं।

महत्वपूर्ण: यदि किसी व्यक्ति में लगातार लक्षण हैं, तो केवल सामान्य एक्स-रे सामान्य आने का मतलब यह नहीं कि हर स्थिति पूरी तरह खारिज हो गई। आगे की जांच की आवश्यकता डॉक्टर तय करते हैं।

लंग कैंसर से बचाव के लिए स्मार्ट Lung Health Habits

  1. AQI (Air Quality Index) पर रोज नजर रखें।
  2. AQI बहुत खराब होने पर आउटडोर एक्सरसाइज और लंबी गतिविधियों से बचें।
  3. HEPA Air Purifier का उपयोग करने पर विचार करें, खासकर उन शहरों में जहां लंबे समय तक वायु गुणवत्ता खराब रहती है।
  4. घर की वेंटिलेशन बेहतर रखें, किचन और कमरों में पर्याप्त एयर फ्लो सुनिश्चित करें।
  5. सेकेंड हैंड स्मोक (Passive Smoking) से दूरी बनाए रखें, क्योंकि यह भी फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है।
  6. लगातार तीन सप्ताह से अधिक रहने वाली खांसी या सांस संबंधी लक्षणों को एलर्जी या सामान्य संक्रमण मानकर नजरअंदाज न करें।
  7. यदि परिवार में लंग कैंसर का इतिहास है या आप लंबे समय से प्रदूषित वातावरण में रहते हैं, तो नियमित हेल्थ चेकअप और डॉक्टर की सलाह लें।
लंग हेल्थ के लिए स्मार्ट टिप्स

लंग हेल्थ के लिए स्मार्ट टिप्स

क्या सिर्फ हेल्दी खाना खाने से बचाव हो जाएगा?

यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि केवल अच्छी डाइट प्रदूषण से होने वाले आनुवंशिक बदलावों को रोक सकती है। हालांकि संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और धूम्रपान से दूरी आपकी समग्र सेहत और फेफड़ों की कार्यक्षमता को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं। लेकिन प्रदूषण और अन्य जोखिमों से बचाव के लिए पर्यावरणीय उपाय और समय पर जांच भी उतने ही जरूरी हैं।

अब सवाल सिर्फ स्मोकिंग का नहीं

भारत में लंग कैंसर की तस्वीर बदल रही है। Never Smokers के बढ़ते मामले यह बताते हैं कि बीमारी को केवल तंबाकू तक सीमित करके देखना अब पर्याप्त नहीं है। अगर लगातार खांसी, सांस फूलना या सीने में दर्द जैसे लक्षण बने रहें, तो उन्हें सामान्य संक्रमण समझकर महीनों न टालें। समय पर विशेषज्ञ से सलाह, सही जांच और जरूरत पड़ने पर जीन-आधारित परीक्षण मरीज के इलाज की दिशा बदल सकते हैं। आज की सबसे बड़ी जागरूकता यही है कि लंग कैंसर केवल स्मोकर्स की बीमारी नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए चिंता का विषय है जो जोखिम कारकों के संपर्क में है।

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