बच्चों के फेफड़ों के दुश्मन बने स्मॉग और प्रदूषण
Pollution Impact On Child Health: सुबह का वक्त है, दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर धुंध की मोटी परत जमी है। दूर से आती बसों की लाइट तक साफ नहीं दिख रही। आमौतर पर लोग इसे सुहानी सर्दी की धुंध कहते हैं, लेकिन वास्तव में सच्चाई ये है कि यह कोई रोमांटिक धुंध नहीं, बल्कि स्मॉग की जहरीली चादर है जो हम सबकी सांसों में घुल चुकी है। और सबसे ज्यादा अगर कोई इसकी मार झेल रहा है तो वो हैं हमारे छोटे-छोटे बच्चे, जो हर सुबह स्कूल बस में इस जहरीली हवा में सफर करते हैं, मैदान में खेलते हैं और खुलकर सांस लेने की कोशिश करते हैं। लेकिन अब वही सांस उनके शरीर के लिए जहर बनती जा रही है।
सीके बिड़ला हॉस्पिटल के पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. विकास मित्तल बताते हैं, दिल्ली-NCR जैसे शहरों में सर्दियों के मौसम में बच्चों में खांसी, घरघराहट, ब्रॉन्काइटिस और अस्थमा अटैक के मामले दोगुने हो चुके हैं। हैरानी की बात ये है कि ये असर सिर्फ कुछ दिनों का नहीं, बल्कि बच्चों के फेफड़ों की पूरी ग्रोथ पर पड़ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आने वाली पीढ़ी स्मॉग में पलने वाली पीढ़ी बन जाएगी? चलिए इसके बारे में एक्सपर्ट्स से ही जानते हैं...
डॉ. विकास मित्तल बताते हैं कि सर्दियों के मौसम में हवा ठंडी और भारी हो जाती है। इस वजह से हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 जैसे महीन प्रदूषण कण ऊपर जाने के बजाय जमीन के करीब जम जाते हैं। यही वो कण हैं जो हमारी सांस के साथ फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं।
सर्दियों में जब तापमान गिरता है और हवा ठहर जाती है, तो फैक्ट्रियों का धुआं, गाड़ियों से निकलने वाला कार्बन और पराली जलाने का धुआं मिलकर हवा को और जहरीला बना देता है। नतीजा यह होता है कि AQI (Air Quality Index) कई बार 400–500 के भी ऊपर चला जाता है, जो सीवियर यानी गंभीर कैटेगरी होती है। ऐसी स्थिति में बच्चों के लिए हर सांस जैसे धीरे-धीरे जहर लेने के बराबर है।
माधुकर रेनबो चिल्ड्रन हॉस्पिटल की पीडियाट्रिशियन डॉ. मेधा बताती हैं कि बड़ों के मुकाबले बच्चों की इम्यूनिटी सिस्टम और फेफड़ों का विकास (lung development) अभी पूरी तरह से नहीं हुआ होता। इस वजह से जब हवा में प्रदूषण बढ़ता है, तो बच्चों पर उसका असर बहुत जल्दी होता है। इसकी वजह से पिछले कुछ हफ्तों में बच्चों में कई तरह की समस्याएं बढ़ गई हैं,
डॉ. मेधा की बताता हैं कि जब कोई बच्चा प्रदूषित हवा में सांस लेता है, तो वो हवा सीधे उसके फेफड़ों में जाकर सूजन और जलन पैदा करती है। इससे सांस लेने में दिक्कत होती है, और समय के साथ फेफड़ों की क्षमता घटने लगती है। अगर ये हालात ऐसे ही रहे, तो आने वाले सालों में बच्चों की फेफड़ों की ग्रोथ पर स्थायी असर पड़ सकता है। इसका मतलब है कि बच्चे बड़े होने पर भी कमजोर लंग फंक्शन और बार-बार होने वाले रेस्पिरेटरी इंफेक्शन से जूझ सकते हैं।
इतना ही नहीं, डॉक्टरों के मुताबिक, स्मॉग में मौजूद नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और ओजोन जैसे तत्व बच्चों की आंखों और त्वचा पर भी असर डालते हैं, जिससे जलन और एलर्जी बढ़ जाती है।
ये बात अब साइंटिफिक रिसर्च से भी साबित हो चुकी है कि स्मॉग सिर्फ फेफड़ों का नहीं, दिमाग का भी दुश्मन है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से बच्चों का स्वास्थ्य कई तरह से प्रभावित होता है जैसे,
डॉ. मेधा और डॉ. मित्तल दोनों की यही सलाह है कि सर्दियों में बच्चों को बेवजह बाहर न जाने दें, खासकर जब AQI Poor या Severe हो। इसके अलावा कुछ जरूरी बातों का भी ध्यान रखें,
डॉ. विकास मित्तल कहते हैं कि जिन बच्चों को पहले से अस्थमा या एलर्जी जैसी बीमारी है, उन्हें इस मौसम में ज्यादा ध्यान रखने की जरूरत है, ऐसे में पेरेंट्स कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखें..
दवाइयां कभी न छोड़ें, और अगर लक्षण बढ़ जाएं तो डॉक्टर से सलाह लेकर इनहेलर या दवा की खुराक एडजस्ट कराएं।
ऐसे बच्चों को भीड़भाड़ वाले इलाकों, ट्रैफिक सिग्नल या खुले में कूड़ा जलने वाले स्थानों से दूर रखें।
स्कूलों को भी चाहिए कि जब प्रदूषण ज्यादा हो, तो आउटडोर एक्टिविटीज रोक दी जाएं और बच्चों को अंदर ही खेल के अवसर दिए जाएं।
डॉक्टर्स का मानना है कि प्रदूषण से बचाव की दिशा में सिर्फ मास्क और प्यूरिफायर से काम नहीं चलेगा। असली समाधान तभी होगा जब हम सब मिलकर प्रदूषण के स्रोतों पर काम करें जैसे पराली जलाने से रोकना, गाड़ियों के उत्सर्जन को कम करना, और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देना।
माता-पिता बच्चों को घर में संभाल सकते हैं, लेकिन जब तक बाहर की हवा साफ नहीं होगी, तब तक असली सुरक्षा संभव नहीं। यह समय है जब स्कूल, सोसाइटी और सरकार तीनों को मिलकर क्लीन एयर इनिशिएटिव को बढ़ावा देना होगा ताकि हर बच्चा बिना डर के खुलकर सांस ले सके।
जिस हवा में बच्चे हर दिन सांस ले रहे हैं, वही हवा उनके शरीर के अंदर बीमारी बो रही है। तो सोचकर देखिए किया क्या हम चाहते हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी इनहेलर पर पलने वाली पीढ़ी बने? हमें समझना होगा कि प्रदूषण कोई मौसम नहीं, बल्कि हमारी बनाई हुई समस्या है। अगर आज हमने मिलकर कदम नहीं उठाए तो कल हमारे बच्चों की हंसी, खेल और सपने सब इस धुएं में घुल जाएंगे।
आखिरकार, हर बच्चे को साफ हवा में सांस लेने का हक है। और यह हक तभी मिलेगा, जब हम सब अपनी जिम्मेदारी समझें चाहे वो गाड़ी कम चलाना हो, पेड़ लगाना हो, या दूसरों को जागरूक करना। क्योंकि बच्चों के लिए सबसे बड़ा तोहफा कोई खिलौना नहीं बल्कि साफ, सुरक्षित और सेहतमंद हवा है।
स्मॉग के इस दौर में बच्चों का बचाव सिर्फ डॉक्टरों की जिम्मेदारी नहीं, यह हर माता-पिता, हर नागरिक और हर संस्था की सामूहिक जिम्मेदारी है। अगर हम आज सावधानी नहीं बरतेंगे, तो कल की पीढ़ी को सांस लेने के लिए भी संघर्ष करना पड़ेगा।