Times Now Navbharat
live-tv
Premium

क्या दिल्ली में इस बार बढ़ेगा BRICS का कुनबा? ये देश चाहते हैं इसमें शामिल होना, जानें सदस्यता की क्या है प्रक्रिया

ब्रिक्स की स्थापना के बाद से यह उसकी 18वीं वार्षिक बैठक है। इस बार बैठक की अध्यक्षता भारत कर रहा है। अपनी स्थापना के बाद से ब्रिक्स लगातार मजबूत और इसका विस्तार हुआ है। ब्रिक्स आज दुनिया का एक महत्वपूर्ण मंच और आवाज बन चुका है। दुनिया की करीब 49 प्रतिशत आबादी इन देशों में रहती है।

Image
Photo : PTI
12-13 सितंबर को नई दिल्ली में ब्रिक्स की बैठक।
Written by: आलोक कुमार राव
Updated Sep 3, 2026, 13:44 IST
Follow on Google News

BRICS Summit 2026: युद्ध, संघर्ष और संकट के इस दौर में दुनिया भर में नए-नए मोर्चे और ब्लॉक बन रहे हैं। नए समीकरणों एवं हालात की वजह से भू-राजनीति (जिओपॉलिटिक्स) बदल रही है। इसे देखते हुए पहले से स्थापित गुट और समूह खुद को ज्यादा प्रभावी, प्रासंगिक एवं अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए नए सिरे से रणनीतिक दांव चल रहे हैं। ऐसे में वैश्विक हालातों की पृष्ठभूमि में होने वाली बड़े देशों की बैठकें अत्यंत महत्पूर्ण हो जाती हैं। ऐसी ही एक बड़ी बैठक अगले सप्ताह यानी 12-13 सितंबर को दिल्ली में होने जा रही है। यह बैठक है ब्रिक्स की जिसमें भारत, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील सहित इसके सदस्य एवं अन्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल होंगे।

पुतिन-जिनपिंग के अलावा जुटेंगे इन देशों के नेता

ब्रिक्स की स्थापना के बाद से यह उसकी 18वीं वार्षिक बैठक है। इस बार बैठक की अध्यक्षता भारत कर रहा है। अपनी स्थापना के बाद से ब्रिक्स लगातार मजबूत और इसका विस्तार हुआ है। ब्रिक्स आज दुनिया का एक महत्वपूर्ण मंच और आवाज बन चुका है। दुनिया की करीब 49 प्रतिशत आबादी इन देशों में रहती है। विश्व का कुल सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी और कुल कारोबार में ब्रिक्स की हिस्सेदारी क्रमश: 39 और 23 प्रतिशत है। इस बार की समिट में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अलावा अफ्रीका, पश्चिम एशिया एवं लैटिन अमेरिका के कई नेताओं के शामिल होने की बात कही जा रही है। चूंकि अमेरिका और पश्चिमी देश ब्रिक्स के उद्देश्यों को लेकर असहज रहते हैं और यह बैठक भी संयुक्त राष्ट्र महासभा के सलाना सत्र से ठीक पहले हो रही है। ऐसे में दोनों गुटों के साथ संतुलन बनाकर रखना पीएम मोदी के लिए एक कठिन चुनौती मानी जा रही है। इस बार यूएनजीए की बैठक में शामिल होने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न्यूयॉर्क जा सकते हैं।

क्या BRICS का दायरा और बढ़ेगा?

भारत ने 2026 में BRICS की अध्यक्षता के लिए आधिकारिक थीम 'लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण' चुनी है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह व्यापक थीम 'मानवता प्रथम' की सोच पर आधारित जन-केंद्रित विदेश नीति के दृष्टिकोण से जुड़ी है। दो दिवसीय शिखर सम्मेलन में राष्ट्राध्यक्षों के बीच महत्वपूर्ण कार्यकारी सत्र होंगे। हालांकि, यह बैठक पूरे साल चली कूटनीतिक तैयारियों का अंतिम चरण होगी। 1 जनवरी से भारत की अध्यक्षता में देश ने 25 से अधिक शहरों में 350 से ज्यादा मंत्रिस्तरीय बैठकों, कार्य समूह सत्रों, बिजनेस फोरम और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की मेजबानी की है। इनमें बेंगलुरु जैसे तकनीकी केंद्रों से लेकर वाराणसी और जयपुर जैसे सांस्कृतिक शहर शामिल रहे।

brics

brics

तैयारियां 3 प्रमुख स्तंभों पर केंद्रित

वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, आतंकवाद-रोधी प्रयासों, साइबर सुरक्षा ढांचे और शांतिपूर्ण विवाद समाधान पर संवाद को मजबूत करना।

स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटान, आपस में जुड़े डिजिटल भुगतान नेटवर्क, सीमा-पार सप्लाई चेन की मजबूती और छोटे एवं मध्यम उद्यमों (SMEs) के लिए वित्तीय पहुंच को बढ़ावा देना।

अकादमिक साझेदारी, युवा शिखर सम्मेलन, नागरिक समाज संवाद तथा विज्ञान, प्रौद्योगिकी और आपदा प्रबंधन में संयुक्त पहलों को बढ़ावा देना।

नई दिल्ली में होने वाली बैठक का रणनीतिक महत्व मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के कारण और बढ़ गया है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों के कारण वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों में सप्लाई चेन की समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं और पश्चिमी देशों के प्रतिबंध वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में BRICS सदस्य देशों के लिए आर्थिक जोखिम कम करने और कूटनीतिक समन्वय का एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभर रहा है।

क्या BRICS में और देशों के शामिल होने की उम्मीद है?

नई दिल्ली एजेंडे के प्रमुख मुद्दों में से एक सदस्यता विस्तार के भविष्य के मानदंड तय करना और एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका तथा पूर्वी यूरोप के 30 से अधिक देशों से प्राप्त औपचारिक आवेदनों का मूल्यांकन करना होगा। कई प्रमुख मध्यम-शक्ति वाले देशों ने 2026 के शिखर सम्मेलन में पूर्ण सदस्यता या आधिकारिक Partner Country का दर्जा हासिल करने के लिए औपचारिक आवेदन किया है या आधिकारिक रुचि जताई है।

तुर्किये

नाटो का सदस्य होने के साथ-साथ यूरोप और एशिया के बीच स्थित तुर्किये की BRICS में शामिल होने की कोशिश ऐतिहासिक महत्व रखती है। अंकारा की BRICS सदस्यता की इच्छा इस बात को दर्शाती है कि मध्यम शक्तियां पश्चिमी सैन्य गठबंधनों के साथ संबंध बनाए रखते हुए ग्लोबल साउथ के आर्थिक नेटवर्क से जुड़कर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाना चाहती हैं।

दक्षिण-पूर्व एशियाई देश-मलेशिया, वियतनाम और थाईलैंड

इंडोनेशिया के साथ गहरे होते संबंधों के बाद दक्षिण-पूर्व एशिया BRICS के भीतर अगला बड़ा विकास केंद्र बनकर उभर रहा है। मलेशिया और थाईलैंड ने अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने और वैकल्पिक व्यापार वित्त तक पहुंच हासिल करने के लिए पूर्ण सदस्यता की दिशा में अपनी कोशिशें तेज की हैं।

अफ्रीकी देश-नाइजीरिया, अल्जीरिया और जिम्बाब्वे

अफ्रीका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक नाइजीरिया और ऊर्जा उत्पादक अल्जीरिया ने BRICS के साथ करीबी एकीकरण की कोशिश की है। इसका उद्देश्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) से ऋण हासिल करना और विदेशी मुद्रा पर निर्भरता को संतुलित करना है।

लैटिन अमेरिकी देश-कोलंबिया और वेनेजुएला

दक्षिण अमेरिकी देश कृषि और खनिज उत्पादों के निर्यात के लिए गैर-डॉलर व्यापार माध्यमों का विस्तार करने के उद्देश्य से BRICS की ओर तेजी से देख रहे हैं।

नए देशों के BRICS में शामिल होने के क्या मानदंड हैं?

सदस्यता के लिए बढ़ती मांग के बावजूद BRICS के भीतर इस बात पर मतभेद हैं कि संगठन का विस्तार कितनी तेजी से किया जाए। मेजबान देश भारत ने ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के समर्थन से तेजी से और बिना स्पष्ट नियमों के विस्तार के बजाय एक व्यवस्थित, मानदंड-आधारित प्रक्रिया अपनाने की वकालत की है। नई दिल्ली की आम सहमति आधारित सोच मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर केंद्रित है:

पहले मौजूदा विस्तार को मजबूत करना: 2024-2025 में शामिल किए गए नए सदस्यों और पार्टनर देशों को पूरी तरह संगठन में एकीकृत करने के बाद ही नए बड़े विस्तार की शुरुआत करना।

स्पष्ट संचालन मानक: नए देशों के लिए आर्थिक पारदर्शिता, गुटनिरपेक्षता और शांतिपूर्ण विवाद समाधान जैसे सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित करना।

संस्थागत एकजुटता बनाए रखना: आंतरिक वैचारिक मतभेदों को निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करने से रोकना।

क्या BRICS अमेरिकी डॉलर को चुनौती देने की तैयारी कर रहा है?

18वें BRICS शिखर सम्मेलन के सबसे ज्यादा निगरानी वाले मुद्दों में से एक अंतरराष्ट्रीय सीमा-पार वित्तीय प्रणाली में बदलाव होगा। लगातार लगाई जा रही अटकलों के विपरीत, BRICS फिलहाल अमेरिकी डॉलर की जगह लेने के लिए एक साझा मुद्रा शुरू करने की कोशिश नहीं कर रहा है। सदस्य देशों के केंद्रीय बैंकों ने भी माना है कि अलग-अलग व्यापक आर्थिक नीतियों और पूंजी नियंत्रणों के कारण ऐसी व्यवस्था को लागू करना व्यावहारिक रूप से बेहद मुश्किल होगा। इसके बजाय संगठन सीमा-पार व्यापार को आसान बनाने के लिए तकनीक आधारित व्यावहारिक विकल्पों पर ध्यान दे रहा है।

स्थानीय मुद्रा में व्यापार

BRICS देश ऐसे द्विपक्षीय व्यापार समझौतों का विस्तार कर रहे हैं, जिनके तहत सदस्य देश अपने आयात और निर्यात का भुगतान सीधे अपनी-अपनी स्थानीय मुद्राओं में कर सकें, जैसे रुपया, रियल, युआन, दिरहम और रूबल। इससे डॉलर में बीच की मुद्रा के रूप में होने वाले रूपांतरण को कम करने और विदेशी मुद्रा की लागत घटाने में मदद मिल सकती है।

आपस में जुड़े CBDC नेटवर्क

BRICS देश अपने केंद्रीय बैंकों द्वारा विकसित डिजिटल मुद्राओं—जैसे भारत का Digital Rupee और चीन का e-CNY—के बीच इंटरऑपरेबिलिटी की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं। इसका उद्देश्य तेज और कम लागत वाले सीमा-पार डिजिटल भुगतान को सक्षम बनाना है।

वैकल्पिक पेमेंट मैसेजिंग सिस्टम

संगठन ऐसे सुरक्षित मैसेजिंग चैनल स्थापित करने पर भी काम कर रहा है, जो बाहरी दबावों के बावजूद व्यापारिक भुगतान को सुरक्षित और निर्बाध बनाए रखने में मदद करें। इससे खाद्य, ईंधन और दवाइयों जैसी आवश्यक वस्तुओं के व्यापार को सुचारू रखा जा सकता है।

न्यू डेवलपमनेंट बैंक का विस्तार

शंघाई मुख्यालय वाला न्यू डेवलपमनेंट बैंक (NDB) स्थानीय मुद्राओं में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए ऋण देने की अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं को वैकल्पिक परियोजना वित्त उपलब्ध हो सकता है, जो पारंपरिक ब्रेटॉन वुड्स संस्थानों से जुड़े ढांचागत सुधार कार्यक्रमों से अलग होगा।

brics

brics

BRICS की स्थापना आखिर क्यों हुई थी?

BRICS अपने गठन के 20 वर्ष पूरे कर रहा है और इसकी मूल मांग आज भी वही है। 20वीं सदी में बनाए गए अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में व्यापक संरचनात्मक सुधार, ताकि वे 21वीं सदी की भू-राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित कर सकें। 2025 के रियो शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाए गए संस्थान-जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन (WTO)-आधुनिक वैश्विक संकटों से प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम नहीं हैं, जब तक कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान प्रतिनिधित्व नहीं मिलता।

नई दिल्ली में भारत की अध्यक्षता में होने वाला सम्मेलन तीन प्रमुख सुधारों पर संयुक्त घोषणा की दिशा में आगे बढ़ सकता है:

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार

अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया जैसे कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों को स्थायी सदस्यता देने की मांग, ताकि सुरक्षा परिषद की वैश्विक विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बहाल हो सके।

IMF और विश्व बैंक में कोटा व मतदान अधिकारों में बदलाव

विकासशील देशों की वास्तविक आर्थिक ताकत और जनसंख्या के अनुरूप उनके मतदान अधिकारों और हिस्सेदारी में बदलाव करना।

WTO विवाद निपटान व्यवस्था की बहाली

एकतरफा व्यापार बाधाओं और संरक्षणवादी शुल्कों के खिलाफ खुले, गैर-भेदभावपूर्ण और निष्पक्ष वैश्विक व्यापार नियमों की रक्षा करना। 12-13 सितंबर को जब राजनयिक, प्रतिनिधि और विश्व नेता नई दिल्ली में शिखर सम्मेलन के लिए जुटेंगे, तब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर होगी कि क्या यह विस्तारित BRICS अपने आंतरिक मतभेदों के बावजूद एकजुट होकर काम कर पाएगा और अपनी विशाल जनसंख्या व आर्थिक ताकत को वैश्विक सुधारों की प्रभावी ताकत में बदल पाएगा।

End of Article