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लाल किले से ही क्यों होता है स्वतंत्रता दिवस का जश्न? जानिए कैसे बना आजादी का सबसे बड़ा प्रतीक

हर साल 15 अगस्त को भारत के प्रधानमंत्री लाल किले से तिरंगा फहराते हैं। लेकिन ये ऐतिहासिक किला देश के स्वतंत्रता दिवस की पहचान आखिर कैसे बन गया, आइए समझते हैं।

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आजादी के जश्न से लाल किले का क्या है खास रिश्ता?
Authored by: Pooja Kumari
Updated Aug 14, 2026, 15:01 IST
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हर साल 15 अगस्त को जब देश आजादी का जश्न मनाता है, तो सबकी नजरें दिल्ली के लाल किले पर टिकी होती हैं। प्रधानमंत्री इसी ऐतिहासिक किले से तिरंगा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि स्वतंत्रता दिवस के लिए लाल किले को ही क्यों चुना गया? इसका जवाब जुड़ा है भारत के इतिहास की उन घटनाओं से, जिन्हें सदियों तक इस किले की दीवारों ने करीब से देखा। आज का लाल किला सिर्फ दिल्ली की एक ऐतिहासिक इमारत नहीं है, बल्कि यह भारत की सत्ता, संघर्ष और स्वतंत्रता की यात्रा का प्रतीक बन चुका है।

लाल किला बना कैसे?

लाल किले का निर्माण 1638 से 1649 के बीच मुगल बादशाह शाहजहां ने करवाया था। करीब 11 साल में यह किला बनकर तैयार हुआ था। वैसे तो इस इमारत का नाम 'किला-ए-मुबारक' (Qila-e-Mubarak) था, लेकिन लाल बलुआ पत्थरों से बनी दीवारों के कारण इसे लाल किला कहा जाने लगा। यह किला सिर्फ एक शानदार इमारत नहीं थी, बल्कि मुगल साम्राज्य की ताकत का केंद्र था। जब यह किला बनकर तैयार हुआ, तब दिल्ली को मुगल साम्राज्य की राजधानी बनाया गया और 1857 तक दिल्ली ने यह दर्जा कायम रखा।

18वीं सदी में मराठों, जाटों, सिखों और गुर्जरों के हमलों ने मुगल साम्राज्य को बेहद कमजोर कर दिया। जिसका फायदा उठाकर 19वीं सदी में अंग्रेजों ने उत्तर भारत में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया और 1803 में उन्होंने दिल्ली पर कब्जा हासिल कर लिया। दिल्ली पर नियंत्रण पाने के बाद अंग्रेजों को यह समझ आ चुका था कि लाल किले का राजनीतिक महत्व कितना अधिक है। एक पुरानी कहावत थी—"जिसने दिल्ली पर राज किया, उसने भारत पर राज किया।" इस सोच के पीछे दिल्ली का ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व ही था। इतिहासकारों के अनुसार, लाल किला दिल्ली की सत्ता का सबसे प्रमुख प्रतीक था। इस कारण अंग्रेज भी इस जगह पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहते थे। यही वजह है कि बाद में लाल किला ब्रिटिश शासन की ताकत का प्रतीक भी बना। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

1857 की क्रांति ने बदल दी लाल किले की पहचान

1857 में अंग्रेजों की हुकूमत के खिलाफ पहला बड़ा जनआंदोलन छिड़ा। इसे 'सिपाही विद्रोह' या पहले स्वतंत्रता संग्राम के रूप में जाना जाता है। इसी विद्रोह के दौरान लाल किला आजादी की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बनकर उभरा। जब देश भर के विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुंचे, तो उन्होंने अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को अपना नेता घोषित किया। हालांकि अंग्रेजों ने इस विद्रोह को कुचल दिया और अपना बेहद क्रूर रूप दिखाया। अंग्रेजों ने बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर लिया और उनके बेटों की हत्या कर दी। बाद में उन्हें दिल्ली से दूर रंगून भेज दिया गया। इतना ही नहीं, 1857 के बाद अंग्रेजों ने लाल किले के बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचाया। कई इमारतों, शाही कमरों और दूसरे हिस्सों को तोड़ दिया गया। महल की कीमती चीजें, कलाकृतियां, पत्थर और गहने लूट लिए गए। इस तरह लाल किला भारतीयों के लिए सिर्फ मुगल सत्ता की निशानी नहीं रहा, बल्कि औपनिवेशिक शासन और उसके खिलाफ संघर्ष का बड़ा प्रतीक भी बन गया।

नेताजी और आजाद हिंद फौज का नारा "चलो दिल्ली"

आजादी की लड़ाई में एक और अहम मोड़ तब आया जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज (INA) ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए। इतिहासकारों के मुताबिक, नेताजी ने अपने मशहूर नारे "चलो दिल्ली" में लाल किले का जिक्र किया था, यानी इस नारे से उनका सीधा संदर्भ दिल्ली के लाल किले पर तिरंगा फहराने से था।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने INA के तीन बड़े अफसरों प्रेम सहगल, गुरबख्श सिंह ढिल्लों और शाहनवाज खान पर लाल किले के अंदर ही कोर्ट-मार्शल (मुकदमा) चलाया। इन अफसरों पर आरोप था कि उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अपनी वफादारी बदलकर ब्रिटिश ताज के खिलाफ जंग छेड़ी। इस ऐतिहासिक मुकदमे ने पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्से की एक नई लहर पैदा कर दी। जिसने उस दौर में आजादी की मांग को और भड़का दिया। इतिहासकार स्वप्ना लिडिल के अनुसार, आजादी के बाद यह बेहद जरूरी था कि जिस लाल किले को अंग्रेजों ने अपनी ताकत का प्रतीक बनाया था, उसे फिर से भारतीय जनता के सम्मान के लिए हासिल किया जाए।

नेहरू और वह ऐतिहासिक पल

1947 को जब देश आजाद हुआ, तो पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले पर लगे अंग्रेजी झंडे को हटाकर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया। इसी पल के साथ लाल किले का नाम हमेशा के लिए आधुनिक भारत के इतिहास में दर्ज हो गया। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि 15 अगस्त 1947 को नेहरू ने सबसे पहले तिरंगा लाल किले पर नहीं बल्कि, दिल्ली के प्रिंसेज पार्क (इंडिया गेट के पास) में फहराया था। इतिहासकारों के मुताबिक, अगले दिन यानी 16 अगस्त को लाल किले पर तिरंगा फहराया गया। उसके बाद से भारत के हर प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराने और भाषण देने की परंपरा को आगे बढ़ाया, जो आज तक कायम है।

लाल किला आज भी क्यों अहम है?

अगर लाल किले की पूरी कहानी को एक लाइन में समझा जाए, तो यह सत्ता से आजादी तक के भारत के सफर की कहानी है। शाहजहां के दौर में यह किला मुगल सत्ता का केंद्र था। 1857 में यह अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष से जुड़ गया। आजाद हिंद फौज के मुकदमों के दौरान यह स्वतंत्रता आंदोलन की बुलंद आवाज बना। 1947 के बाद यही ऐतिहासिक लाल किला स्वतंत्र भारत की संप्रभुता का प्रतीक बन गया। इसीलिए हर साल जब 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा लहराता है, तो वह सिर्फ एक झंडारोहण समारोह नहीं होता। वह भारत के उस लंबे सफर की याद दिलाता है, जिसमें साम्राज्य बदले, सत्ता बदली, संघर्ष हुए और आखिरकार देश ने अपनी आजादी हासिल की। यही वजह है कि लाल किला आज स्वतंत्रता दिवस का अटूट हिस्सा बन चुका है।

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