What is India Big Plan in UAE: भारतीय नागरिकों को एक परेशानी कर देने वाली आर्थिक सच्चाई का सामना करना पड़ रहा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई है। इस बीच शुक्रवार (15 मई, 2026) की सुबह, एयर इंडिया वन का एक विमान उड़ान पर निकला, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के लिए रवाना हुए।
हालांकि यह यात्रा पांच देशों के राजनयिक दौरे का शुरुआती चरण है, जिसमें नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली शामिल हैं, लेकिन अबू धाबी में चार घंटे का एक छोटा सा पड़ाव है, विशेषज्ञों की नजर में यह एक बेहद अहम और बड़ा राजनयिक मिशन है।
इस थोड़ी देर की यात्रा के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। दुनिया में ऊर्जा का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता होने के नाते, भारत इस समय एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ा है।
पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष अब स्थानीय झड़पों से बढ़कर एक पूर्ण समुद्री संकट का रूप ले चुका है, जो वैश्विक व्यापार की जीवन-रेखाओं के लिए ही खतरा बन गया है।
इसमें ही प्रधानमंत्री की UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ होने वाली मुलाकात, 1.4 अरब लोगों को आर्थिक संकट से बचाने का एक रणनीतिक मिशन है।
मोदी की UAE यात्रा इतनी महत्वपूर्ण क्यों?
इस यात्रा का कारण आज भारत के पेट्रोल पंपों पर साफ दिखाई दिया। जब 3 रुपये प्रति लीटर की तेल पर बढ़ोतरी हुई, जिससे आम जनता के खर्च में भारी वृद्धि होना तय है। वैसे अप्रैल 2022 से तेल के दामों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई, ऐसा दावा भाजपा की ओर से किया, लेकिन कम से चली आ रही कीमतों में स्थिरता का आज शानदार चार-वर्षीय दौर भी समाप्त हो गया।
सालों तक, सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs), इंडियन ऑयल कॉर्प, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्प और भारत पेट्रोलियम कॉर्प जनता के लिए एक 'शॉक एब्जॉर्बर' (झटका सहने वाले) के तौर पर काम करती रहीं, लेकिन आखिरकार वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव का बोझ इतना भारी हो गया कि उसे उठाना मुश्किल हो गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन OMC को कीमतें सीमित रखने के लिए हर दिन करीब 1,000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। दिल्ली में पेट्रोल की कीमतें 94.77 रुपये से बढ़कर 97.77 रुपये प्रति लीटर हो गईं, जबकि डीजल की कीमतें 87.67 रुपये से बढ़कर 90.67 रुपये प्रति लीटर हो गईं।
राजनीतिक विश्लेषकों ने कीमतों में इस बदलाव के समय पर भी ध्यान दिलाया। यह बढ़ोतरी तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे अहम राज्यों में विधानसभा चुनाव खत्म होने के ठीक बाद हुई है।
अब जब मतदाताओं को 'राजनीतिक सुरक्षा' देना कोई मुख्य बाधा नहीं रह गई है, तो सरकार को बाजार की ताकतों के हिसाब से ही खुदरा कीमतें तय करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
यह ऊर्जा संकट भारतीय रुपये की डांवाडोल स्थिति से भी जुड़ा हुआ है। बता दें कि बीचे दिन ही देश की मुद्रा अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। रुपया 0.2 प्रतिशत गिरकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.9575 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया।
इनसब से एक बुरा फीडबैक लूप बन जाता है: जैसे-जैसे रुपया कमजोर होता है, भारत को जरूरत वाले 90 प्रतिशत तेल और 50 प्रतिशत गैस का आयात करना बहुत ज्यादा महंगा होता जाता है।
इसका असर इस अप्रैल में थोक महंगाई के 42 महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचने के रूप में पहले ही दिख चुका है।
इन झटकों की आशंका में, मोदी ने 11 मई को देश को एक हैरानी भरा संबोधन दिया। उन्होंने संकेत दिया कि पश्चिम एशिया संकट के लिए 'नागरिकों की बहुत ज्यादा भागीदारी' की जरूरत होगी।
क्या भारत अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी से उतरने से बचा सकेगा?
उन्होंने आर्थिक आत्मनिर्भरता के सात स्तंभों की रूपरेखा पेश की और जनता से सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहनों के इस्तेमाल से ईंधन बचाने का आग्रह किया; यहां तक कि उन्होंने देश में ईंधन की खपत कम करने के लिए फिर से 'रिमोट वर्क' (घर से काम) शुरू करने का सुझाव भी दिया।
सबसे खास बात यह है कि उन्होंने नागरिकों से अनुरोध किया कि वे देश के घटते विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए एक साल तक सोने की खरीद और विदेश में होने वाली 'डेस्टिनेशन वेडिंग' को टाल दें।
UAE की इस नई आजादी से भारत को क्या होगा फायदा?
UAE 1 मई को सऊदी के नेतृत्व वाले OPEC+ समूह से आधिकारिक तौर पर अलग हो गया। यह अलग होना ही मौजूदा कूटनीतिक बातचीत को आगे बढ़ाने वाला एक शांत इंजन है।
सालों तक, अबू धाबी ने अपनी उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर 50 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) करने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया था, लेकिन OPEC द्वारा तय किए गए कोटे के कारण उसके उत्पादन को सीमित कर दिया गया।
'राष्ट्रीय हित सबसे पहले' की नीति अपनाते हुए और इस समूह को छोड़कर, UAE अब ऊर्जा बाजार में एक आजाद खिलाड़ी बन गया है। भारत के लिए यह कदम एक बड़ा फ़ायदा साबित हुआ है।
OPEC की कीमतों और उत्पादन की सीमाओं से आजाद होकर, UAE अब नई दिल्ली, जो उसका तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, तो वह भारत को आज बेहतर कीमतें और लंबे समय तक तेल की आपूर्ति की गारंटी देने की स्थिति में है।
भारत के लिए UAE से तेल के संदर्भ में कोई बड़ी डील होना एक बड़ी राहत होगी, क्योंकि खाड़ी क्षेत्र के पारंपरिक समुद्री रास्ते अब ख़तरनाक होते जा रहे हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य जो एक संकरा समुद्री रास्ता है और जिससे दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है , यह इस समय अमेरिका और इज़रायल के साथ ईरान के चल रहे टकराव के कारण पूरी तरह से ठप पड़ा हुआ है।
समुद्री क्षेत्र में इस अस्थिरता के कारण कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें $113 प्रति बैरल का आंकड़ा पार कर गई हैं और कुछ मौकों पर तो ये $126 तक भी पहुंच गई हैं। ऐसे माहौल में, UAE का फुजैरा बंदरगाह भारत के लिए एक ऊर्जा जीवनरेखा बनकर उभरा है।
चूंकि फुजैरा ओमान की खाड़ी में, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बाहर स्थित है, इसलिए यह भारतीय टैंकरों को सबसे खतरनाक समुद्री रास्तों से बचकर निकलने का अवसर देता है। मोदी की यात्रा का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय हितों के लिए इस 'होर्मुज बाईपास' को प्राथमिकता मिलती रहे।
सऊदी अरब और UAE के बीच बढ़ती दरार ने क्षेत्रीय समीकरणों में भी एक नया बदलाव ला दिया है। जहां एक ओर भारत का प्रतिद्वंद्वी, पाकिस्तान, रियाद के साथ रक्षा समझौता बनाए हुए है, वहीं दूसरी ओर नई दिल्ली ने रणनीतिक रूप से अबू धाबी की ओर अपना रुख किया है।
2015 के बाद से प्रधानमंत्री की यह UAE की आठवीं यात्रा है, जो उनके कार्यकाल से पहले के 34 वर्षों के लंबे अंतराल के बिल्कुल विपरीत है।
UAE में मोदी के क्या उद्देश्य?
भले ही यह यात्रा कम अवधि की है, लेकिन इसका एजेंडा तीन विशिष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण समझौतों से भरा हुआ है, जिन्हें भारतीय अर्थव्यवस्था को आर्थिक स्थिरता प्रदान करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
1. रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) का विस्तार
भारत वर्तमान में तीन भूमिगत भंडारण सुविधाओं का प्रबंधन करता है, जिनकी कुल क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) है। हालांकि, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में आ रही बाधाओं को देखते हुए, इसमें 6.5 MMT की अतिरिक्त क्षमता जोड़ने की योजना है।
2. LPG सुरक्षा
UAE पहले से ही भारत की 40 प्रतिशत लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की जरूरतों को पूरा करता है। वैश्विक कीमतों में अचानक बढ़ोतरी के कारण होने वाले युद्ध के झटकों से भारतीय परिवारों को बचाने के लिए, दोनों देशों के बीच 10 साल के LPG सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।
3. लोकल करेंसी सेटलमेंट (LCS) का विस्तार
एक मजबूत US डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी को देखते हुए, रुपया-दिरहम व्यापार व्यवस्था का विस्तार एक अहम प्राथमिकता है। एनर्जी पेमेंट्स के लिए डॉलर को दरकिनार करके, भारत एक्सचेंज रेट में होने वाले नुकसान में अरबों रुपये बचा सकता है। द्विपक्षीय व्यापार में 'डी-डॉलराइजेशन' की दिशा में उठाया गया यह कदम, लगातार हो रहे पोर्टफोलियो आउटफ्लो का सीधा जवाब है, जिसने भारत के कैपिटल बैलेंस पर दबाव डाला है।
विदेश मंत्रालय ने मोदी की पांच देशों की यात्रा की घोषणा करते हुए एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा था, 'UAE भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और पिछले 25 वर्षों में कुल मिलाकर निवेश का सातवां सबसे बड़ा स्रोत है।'
क्या भारत अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी से उतरने से बचा सकेगा?
ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों से पश्चिम एशिया में भड़का संघर्ष न केवल शिपिंग में बाधा डाल रहा है, बल्कि इसके चलते खाड़ी देशों पर सीधे हमले भी हुए हैं; जिसके कारण इस क्षेत्र में उच्च-स्तरीय राजनयिक दौरे बेहद दुर्लभ हो गए हैं।
ऐसे माहौल में भी मोदी की वहां जाने की तत्परता, ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला के अत्यंत महत्वपूर्ण स्वरूप को रेखांकित करती है। भारत सरकार इस समय लगातार तीसरे वर्ष भुगतान संतुलन घाटे का सामना कर रही है। केंद्रीय बैंक को मुद्रा की गिरावट को थामने के लिए कुछ दुर्लभ नियामक उपाय अपनाने और विदेशी मुद्रा भंडार को बेचने के लिए विवश होना पड़ा है। अब देखते हैं कि ये मोदी की यात्रा भारत के लिए क्या कुछ राहत लेकर आती है।
