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क्या है चेनाब-ब्यास टनल प्रोजेक्ट जिसे लेकर पाकिस्तान की उड़ी नींद, भारत के लिए कितना फायदेमंद?

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने घोषणा की थी कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखा जाएगा। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि "खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते"।

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चेनाब-ब्यास प्रोजेक्ट बना पाकिस्तान की मुसीबत (AI Image)
Authored by: अमित कुमार मंडल
Updated Jun 8, 2026, 15:03 IST
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Chenab–Beas Tunnel Project: भारत द्वारा चेनाब-ब्यास परियोजना पर काम शुरू करने की घोषणा के बाद से ही पाकिस्तान आशंकित है। पाकिस्तान ने दावा किया है कि इस परियोजना के पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक परिणाम होंगे और यह सिंधु जल संधि का उल्लंघन कर सकती है। दरअस, इस चेनाब-ब्यास सुरंग प्रोजेक्ट ने पाकिस्तान को हिलाकर रख दिया है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने घोषणा की थी कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखा जाएगा। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि "खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते"। कुल मिलाकर, पाकिस्तान को आतंकवाद फैलाने की सजा अब भुगतनी पड़ रही है। ये नया घटनाक्रम क्या है जिसे लेकर पाकिस्तान आशंकित है, इससे पाकिस्तान क्यों घबरा गया है? आइए विस्तार से जानते हैं।

क्या चिनाब-ब्यास टनल प्रोजेक्ट?

चिनाब-ब्यास लिंक सुरंग परियोजना चिनाब नदी से जुड़ी एक इंफ्रास्ट्रक्चर योजना है। जीके टुडे के अनुसार, इसका निर्माण हिमाचल प्रदेश में लगभग 2,532 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से किया जाएगा। न्यूज18 के अनुसार, इसे लिंक-3 परियोजना (Link-3 Project) के नाम से भी जाना जाता है। इसमें चिनाब बेसिन से अतिरिक्त पानी को ब्यास नदी में मोड़ने के लिए 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग शामिल है। यह सिंधु नदी प्रणाली से जुड़ी है, जिसमें चिनाब, झेलम, रावी, ब्यास और सतलुज नदियाँ शामिल हैं।

चंद्र नदी पर 19 मीटर ऊंचा बांध भी शामिल होगा

परियोजना के पहले चरण में चंद्र नदी पर 19 मीटर ऊंचा बांध भी शामिल होगा। यह बांध हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में कोक्सर गांव के पास स्थित है। साउथ एशिया डैम, रिवर्स एंड ब्लॉग ( South Asia Network on Dams, Rivers and People blog) के अनुसार, 10,300 फीट की ऊंचाई पर बनने वाला 19 मीटर ऊंचा कंक्रीट का बांध और जल निकासी बेसिन, नदी के ऊपरी हिस्से में बनी प्लास्टिक कंक्रीट की खाई और नदी के किनारे मजबूत बिजली आपूर्ति संरचनाओं के ऊपर बनाया जाएगा। 8.7 किलोमीटर लंबी जल मोड़ सुरंग पीर पंजाल पर्वतमाला से होकर गुजरेगी और निर्माण के दौरान क्षैतिज प्रवेश सुरंगों द्वारा समर्थित होगी, जिन्हें बाद में स्थायी कंक्रीट के प्लग से सील कर दिया जाएगा। यह जल सुरंग रोहतांग दर्रे पर अटल सुरंग के पास होगी।

यह परियोजना राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) द्वारा चलाई जा रही है। इससे हिमाचल प्रदेश में 4,000 मेगावाट अतिरिक्त जलविद्युत का उत्पादन होगा। परियोजना पर काम 1 अगस्त, 2026 से शुरू होने वाला है। केंद्र सरकार इसे 31 जुलाई, 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रख रही है। भारत ने सलल बांध पर एक नई गाद प्रबंधन सुरंग को भी मंजूरी दे दी है। यह 268 करोड़ रुपये की परियोजना, जिसे एनएचपीसी द्वारा ही चलाया जाएगा, जम्मू और कश्मीर में सलाल जलविद्युत परियोजना पर लागू होगी।

हिमालय से चेनाब नदी द्वारा लाई गई भारी मात्रा में गाद के कारण सलाल जलाशय दशकों से गंभीर गाद जमाव की समस्या से जूझ रहा है। इंजीनियरों का कहना है कि इससे भंडारण क्षमता कम हो गई है, टरबाइन की दक्षता प्रभावित हुई है और वर्षों से जल प्रवाह प्रबंधन जटिल हो गया है। उनका कहना है कि यह परियोजना आवश्यकता पड़ने पर पानी को मोड़ेगी और एक बाईपास तंत्र के जरिए जलाशय से जमा हुई गाद को भी हटाएगी।

पाकिस्तान का क्या कहना है?

पाकिस्तान ने इन परियोजनाओं को लेकर भारत को निशाने पर लिया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा, भारत ने इन परियोजनाओं के बारे में न तो आधिकारिक तौर पर कोई सूचना दी है और न ही कोई नोटिस जारी किया है। ये परियोजनाएं इस बात की पुष्टि करती हैं कि भारत जल का दुरुपयोग हथियार के रूप में करना चाहता है; इससे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इस्लामाबाद ने दावा किया कि यह परियोजना सिंधु जल संधि का उल्लंघन करती है।

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा, हमने यह मीडिया रिपोर्ट और भारत सरकार द्वारा चेनाब-ब्यास लिंक परियोजना के लिए जारी किया गया सार्वजनिक निविदा दस्तावेज देखा है, जिसका उद्देश्य चेनाब नदी से ब्यास नदी में 1.9 मिलियन एकड़-फीट पानी स्थानांतरित करना है। इस तरह की अंतर-बेसिन परियोजना सिंधु जल संधि का गंभीर उल्लंघन है। मंत्रालय ने सलल बांध परियोजना को बेहद चिंताजनक घटनाक्रम बताया।

पाकिस्तान क्यों घबराया?

पाकिस्तान ने मूल रूप से भारत पर सिंधु जल संधि का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। भारत और पाकिस्तान ने 19 सितंबर, 1960 को सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत सिंधु बेसिन की छह नदियों का दोनों देशों के बीच विभाजन हुआ था। इसके प्रावधानों के अनुसार, पूर्वी तीन नदियां, रावी, ब्यास और सतलुज, भारत को दी गईं, जबकि पश्चिमी तीन नदियां, जिनमें सिंधु, झेलम और चिनाब शामिल हैं, पाकिस्तान को सौंपी गईं। इस विभाजन के बाद भारत को बेसिन के लगभग 20 प्रतिशत जल पर और पाकिस्तान को लगभग 80 प्रतिशत जल पर नियंत्रण हासिल हुआ। विभाजन के बावजूद, भारत ने पश्चिमी नदियों पर सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन और नौवहन जैसे गैर-उपभोक्ता उपयोगों के लिए सीमित अधिकार बरकरार रखे। पाकिस्तान ने पश्चिमी नदियों पर भारत के बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं पर अक्सर आपत्ति जताई है, और अपनी जल सुरक्षा पर संभावित प्रतिकूल असर का हवाला दिया है। फिलहाल, पहलगाम हमलों के बाद सिंधु जल संधि निलंबित है। इसने पाकिस्तान की मुश्किलों में और इजाफा किया है।

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