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Explainer: तैयारी की कमी या खोटी किस्मत, FIFA World Cup क्यों नहीं खेल पाता भारत?

भारतीय फुटबॉल का इतिहास 19वीं सदी के मध्य से शुरू होता है, जब ब्रिटिश शासन के दौरान यह खेल देश में आया। उस समय फुटबॉल सिर्फ ब्रिटिश सेना और नौसेना के अधिकारियों के बीच खेला जाता था, जो भारत में तैनात थे। आज फुटबॉल की लोकप्रियता भारत में धीरे-धीरे बढ़ रही है लेकिन, भारतीय फुटबॉल टीम कभी फीफा वर्ल्ड कप में हिस्सा नहीं ले पाई है। इस साल 11 जून से 19 जुलाई तक फीफा वर्ल्ड कप खेला जाएगा।

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भारत ने कभी नहीं खेला है फीफा वर्ल्ड कप।
Authored by: Umesh Kumar
Updated May 11, 2026, 19:56 IST

FIFA World Cup And India: दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल फुटबॉल जब अपने महाकुंभ 'फीफा वर्ल्ड कप' के साथ आता है तो 140 करोड़ की आबादी वाले भारत में एक ही सवाल गूंजता है- 'हम कब फीफा वर्ल्ड कप खेलेंगे?' भारत जैसे विशाल देश के लिए यह एक कड़वा सच है कि हम अब तक केवल एक बार फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई ((1950 में) कर पाए थे, लेकिन वहां भी नहीं खेल सके। आखिर इसके पीछे के असली कारण क्या हैं? आइए इस पर एक विस्तृत नजर डालते हैं।

सबसे पहले इतिहास की बात

भारतीय फुटबॉल का इतिहास 19वीं सदी के मध्य से शुरू होता है, जब ब्रिटिश शासन के दौरान यह खेल देश में आया। उस समय फुटबॉल सिर्फ ब्रिटिश सेना और नौसेना के अधिकारियों के बीच खेला जाता था, जो भारत में तैनात थे। 1870 के दशक में इस खेल ने धीरे-धीरे भारतीय समाज में प्रवेश करना शुरू किया। माना जाता है कि 1872 में भारत का पहला फुटबॉल क्लब, कलकत्ता एफसी, स्थापित हुआ था। हालांकि, कुछ रिपोर्टों के अनुसार, यह क्लब पहले एक रग्बी क्लब के रूप में शुरू हुआ और फिर 1894 में फुटबॉल क्लब में बदल दिया गया।

भारतीय फुटबॉल को सही दिशा में लाने का श्रेय नागेंद्र प्रसाद सर्वाधिकारी को जाता है, जिन्हें भारतीय फुटबॉल का जनक भी कहा जा सकता है। सर्वाधिकारी ने कोलकाता और बंगाल में कई फुटबॉल क्लब स्थापित किए, जिससे इस खेल की लोकप्रियता में जबरदस्त इजाफा हुआ। यही कारण है कि कलकत्ता (अब कोलकाता) और बंगाल को भारतीय फुटबॉल का गढ़ माना जाता है, जहां इस खेल ने अपनी जड़ें मजबूती से जमा लीं।

1956 Olympics.

1956 Olympics.

उन्होंने 1889 में मोहन बागान, 1891 में मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब और 1920 में ईस्ट बंगाल की स्थापना की। ये तीनों क्लब आज भी मौजूद हैं। सर्वाधिकारी ने खुद भी कई क्लब स्थापित किए, जिनमें से एक था सोवाबाजार क्लब। यह क्लब 1892 में ट्रेड्स कप जीतने वाला पहला भारतीय क्लब था। उन्होंने ईस्ट सरे रेजिमेंट को हराकर यह जीत हासिल की। इस जीत ने लगभग दो दशक बाद मोहन बागान की ऐतिहासिक IFA शील्ड जीतने की नींव रखी।

1893 में, सर्वाधिकारी ने भारतीय फुटबॉल एसोसिएशन (IFA) की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। IFA भारत में फुटबॉल के लिए गर्वनिंग बॉडी के रूप में कार्य करता था, जब तक कि 1937 में ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) की स्थापना नहीं हुई थी। साल 1899 में, त्रिशूर, केरल में आरबी फर्ग्यूसन फुटबॉल क्लब या यंग मेन्स फुटबॉल क्लब की स्थापना हुई। यह दक्षिण भारत का पहला फुटबॉल क्लब था। इस क्लब ने केरल में फुटबॉल को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। केरल के साथ-साथ बंगाल और हैदराबाद भारत में फुटबॉल के प्रमुख केंद्र बन गए। डूरंड कप, जो आज एशिया का सबसे पुराना सक्रिय फुटबॉल टूर्नामेंट है, यह 1888 में शुरू किया गया था। संतोष ट्रॉफी, भारत की राज्य स्तरीय फुटबॉल चैंपियनशिप, 1941 से आयोजित की जा रही है।

भारतीय फुटबॉल का स्वर्ण युग

आजादी के बाद भारतीय फुटबॉल टीम का पहला आधिकारिक मिशन 1948 का लंदन ओलंपिक था। अंतरराष्ट्रीय मंच पर टीम ने पहली बार भारतीय तिरंगे के तले टीम ने मैच खेले। टीम की कप्तानी तालीमेरेन एओ ने की और कोच बलेदास चटर्जी थे। 31 जुलाई 1948 को ईस्ट लंदन के क्रिकलफील्ड स्टेडियम में 17,000 दर्शकों के सामने फ्रांस के खिलाफ टीम ने मैच खेला। भारत को ओलंपिक में अपने डेब्यू फुटबॉल मैच में 2-1 से हार मिली, जिसमें सरंगापानी रमन ने मैच में स्वतंत्र भारत का पहला अंतरराष्ट्रीय गोल किया। इस मैच में भारत के 8 खिलाड़ी नंगे पैर खेले।

भारत ने लगातार तीन ओलंपिक खेल- हेल्सिंकी 1952, मेलबर्न 1956 और रोम 1960 में हिस्सा लिया। मेलबर्न 1956 में भारतीय फुटबॉल टीम, इतिहास रचते हुए सेमीफाइनल में पहुंचने वाली पहली एशियाई टीम बन गई। उन्होंने क्वार्टरफाइनल में मेजबान ऑस्ट्रेलिया को हराया। हालांकि, सेमीफाइनल में यूगोस्लाविया और कांस्य पदक मैच में बुल्गारिया से हारने के कारण सैमार बनर्जी की अगुवाई वाली टीम पदक से चूक गई। वास्तव में, 1948 से 1970 के बीच का दौर भारतीय फुटबॉल के स्वर्ण युग के रूप में माना जाता है।

इस दौरान, भारतीय फुटबॉल टीम ने दो एशियन गेम्स गोल्ड मेडल (1951 और 1962) और एक कांस्य (1970) जीते। भारत ने 1964 में अपने AFC एशियन कप की शुरुआत की और उपविजेता बने। यह टूर्नामेंट में अब तक की उनकी सबसे बेहतरीन उपलब्धि है। भारत 1950 के फीफा वर्ल्ड कप के लिए ब्राजील में क्वालीफाई कर गया था, लेकिन AIFF ने टीम भेजने से मना कर दिया। कारण था ‘टीम चयन पर असहमति और अपर्याप्त अभ्यास समय’। यह पहली और आखिरी बार था जब फीफा वर्ल्ड कप खेलने वाली टीमों में भारत का नाम था। इसके बाद से भारत फुटबॉल वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई नहीं कर सका।

ऐतिहासिक मौका और 'नंगे पैर' का मिथक

भारत के 1950 में फीफा वर्ल्ड कप में ना खेल पाने की कई कहानियां हैं। इनमें से एक है कि फीफा ने खिलाड़ियों को नंगे पैर खेलने की अनुमति नहीं दी थी। क्योंकि उस वक्त था भारतीय फुटबॉल टीम के ज्यादातर खिलाड़ी नंगे पांव खेलना पसंद करते थे। लेकिन यह आधा सच है। असल कारण कुछ और थे। उस समय भारत के लिए फुटबॉल वर्ल्ड कप से कहीं अधिक ओलंपिक महत्वपूर्ण था। दूसरा कारण यह भी माना जाता है कि ब्राजील तक की लंबी समुद्री यात्रा का खर्च उठाना तत्कालीन फुटबॉल फेडरेशन (AIFF) के लिए मुश्किल था।

अभी तक क्यों नहीं आया वो पल

1950 के उस ऐतिहासिक पल के बाद आज 76 साल हो गए हैं। इस बीच कितने ही फीफा वर्ल्ड कप आयोजित हुए लेकिन भारत कभी क्वालिफाई नहीं कर सका। इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन जो प्रमुख कारण हैं उनमें ग्रासरूट लेवल पर कमी, मैदानों की खराब हालत, क्रिकेट की दीवानगी और व्यावसायिक निवेश की कमी मानी जा सकती है। भारत ने फुटबॉल के बुनियादी ढांचे का अभाव है। भारत के पास विश्व स्तरीय फुटबॉल अकादमियों की कमी है। बड़े शहरों को छोड़ दें, तो आज भी बच्चों के पास खेलने के लिए सही मैदान और कोचिंग सुविधाएं नहीं हैं।

Match.

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क्रिकेट की दीवानगी

भारत में क्रिकेट केवल एक खेल नहीं, एक धर्म की तरह है। युवाओं के लिए क्रिकेट में करियर बनाना और शोहरत पाना ज्यादा आसान और सुरक्षित विकल्प नजर आता है। हालांकि, ISL (Indian Super League) ने इसे बदलने की कोशिश की है, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। फुटबॉल में फंडिंग की कमी है। जितने स्पॉन्सर और कॉर्पोरेट जगत का निवेश क्रिकेट में है, उतना फुटबॉल में नहीं है। हालांकि, जॉन अब्राहम, अभिषेक बच्चन और रणवीर सिंह जैसे बॉलीवुड अभिनेता ग्राउंड लेवल पर आकर फुटबॉल को बढ़ावा दे रहे हैं।

यूरोपीय और अफ्रीकी खिलाड़ियों की तुलना में भारतीय खिलाड़ियों को अपनी स्ट्रेंथ और स्टैमिना पर अभी बहुत काम करने की जरूरत है। भारतीय खिलाड़ियों को विदेशी क्लबों में खेलने का मौका कम मिलता है, जिससे वे वर्ल्ड-क्लास फुटबॉल की बारीकियों को नहीं समझ पाते।

क्वालीफिकेशन का मुश्किल सफर

एशिया (AFC) से वर्ल्ड कप में जाना बेहद चुनौतीपूर्ण है। जापान, दक्षिण कोरिया, ईरान और सऊदी अरब जैसी टीमें पहले से ही वर्ल्ड क्लास लेवल पर हैं। भारत की वर्तमान रैंकिंग (136वीं, 1 अप्रैल 2026 को जारी रैंकिंग के हिसाब से) बताती है कि हमें इन दिग्गजों को हराने के लिए अपने खेल के स्तर को कई गुना बढ़ाना होगा। भारत फीफा रैंकिंग में मात्र पांच बार 100वीं रैंकिंग ( 1993- 99वीं, 1996- 94वें, 2017-2018, 96वीं, 2023 में 99वीं रैंक) के नीचे आ सका है। फीफा वर्ल्ड कप 2026 क्वालिफायर्स में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा, जहां दूसरे राउंड में टीम बाहर हो गई।

उम्मीद

AIFF ने भारतीय फुटबॉल के पुनरुद्धार के लिए 'विजन 2047' रोडमैप तैयार किया है। U-17 और U-20 टीमें अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। साथ ही युवाओं में अब मैनचेस्टर यूनाइटेड या रियाल मैड्रिड के साथ-साथ अपनी घरेलू टीमों के प्रति भी क्रेज बढ़ा है। बाईचुंग भूटिया के बाद सुनील छेत्री ने भारतीय फुटबॉल को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है। फुटबॉल का क्रेज भी अब भारत में धीरे-धीरे बढ़ रहा है। ऐसे में उम्मीद है कि आने वाले सालों में भारतीय टीम फीफा वर्ल्ड कप में खेलते हुए दिखाई दे।

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