बांग्लादेश में फिर अशांति का दौर शुरू, भारत के लिए कितना बड़ा संकट?
बांग्लादेश में हिंसा 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनावों से कुछ ही महीने पहले घटी है। ऐसी आशंकाएं हैं कि इस अशांति का इस्तेमाल चुनावों को स्थगित करने के बहाने के रूप में किया जा सकता है। बांग्लादेश में बिगड़ती कानून-व्यवस्था का इस्तेमाल चुनावों को असुरक्षित बताने और इस तरह चुनावों में देरी करने के लिए किया जा सकता है।
- Authored by: अमित कुमार मंडल
- Updated Dec 21, 2025, 02:30 PM IST
युवा नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद बांग्लादेश में हिंसक प्रदर्शनों के कारण एक बार फिर तनाव का माहौल है। भारत के मुखर आलोचक 32 वर्षीय हादी की गुरुवार (18 दिसंबर) की रात सिंगापुर के एक अस्पताल में मौत हो गई थी। ढाका में नकाबपोश हमलावरों द्वारा गोली मारे जाने के कुछ दिनों बाद हादी की सिंगापुर में मौत हुई। उसकी मौत की खबर के बाद तनाव बढ़ने पर भारत का पक्ष लेने के आरोपी दो प्रमुख समाचार पत्रों को शुक्रवार (19 दिसंबर) को भीड़ ने निशाना बनाया। पिछले साल अगस्त में बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद से दक्षिण एशियाई देश में भारत विरोधी भावनाएं बढ़ रही हैं। इस ताजा हिंसा का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा? आइए एक नजर डालते हैं।
बांग्लादेश में प्रदर्शनों का निशाना भारत
उस्मान हादी की मौत की खबर फैलने के बाद बांग्लादेश में गुरुवार की रात को नए सिरे से अशांति फैल गई। ढाका में हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए, जमकर हिंसा मचाई और भारी आगजनी की। मीडिया और मीडियाकर्मियों को निशाना बनाया गया। प्रथम आलो और द डेली स्टार के दफ्तरों को फूंक दिया गया। ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग और बांग्लादेश भर में स्थित सहायक उच्चायोगों को भी धमकियों का सामना करना पड़ा। इनके सामने उग्र प्रदर्शन हुए और हमले की धमकियां दी गईं। चटगांव, राजशाही, खुलना और सिलहट में भारत के सहायक उच्चायोग हैं।
हादी की मौत और भारत विरोधी प्रदर्शन
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, बांग्लादेश पुलिस द्वारा हादी को गोली मारने वाले दो नकाबपोश लोगों की पहचान करने और यह मानने के बाद कि हमलावर सीमा पार करके भारत भाग गए हैं, भारत विरोधी प्रदर्शन भड़क उठे। हादी एक युवा नेता था जिन्होंने 2024 में छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन में भाग लिया था जिसके बाद हसीना को सत्ता से बेदखल किया गया था। वह फरवरी में होने वाले संसदीय चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने वाला था। हादी की मौत से एक दिन पहले प्रदर्शनकारियों ने ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग की ओर मार्च किया और हसीना को बांग्लादेश वापस लाने की मांग की। इसके चलते भारतीय दूतावास को बांग्लादेशी नागरिकों के लिए अपना वीजा आवेदन केंद्र एक दिन के लिए बंद करना पड़ा।
हसीना पिछले साल अगस्त में ढाका से भागने के बाद से दिल्ली में रह रही हैं। हसीना के दिल्ली भागने के बाद से भारत और बांग्लादेश के संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं और ढाका ने बार-बार नई दिल्ली से उनके प्रत्यर्पण की मांग की है। चटोग्राम में भारतीय उप उच्चायोग के आवास और कार्यालय पर पत्थरबाजी और हमलों की खबरें सामने आईं।
प्रोथोम आलो और द डेली स्टार के कार्यालयों को फूंका
हादी के हमलावरों के भारत भाग जाने के दावे ने उनके समर्थकों में आक्रोश पैदा कर दिया है। इससे उन्हें बांग्लादेश में भारतीय दूतावासों को निशाना बनाने का मौका मिला है। गुस्से में आए प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश के दो प्रमुख समाचार पत्रों को भी निशाना बनाया है और उन पर भारत का पक्ष लेने का आरोप लगाते हुए उन्हें शेख हसीना का मददगार बताया है। गुरुवार रात प्रदर्शनकारियों ने बांग्लादेश के सबसे बड़े दैनिक समाचार पत्र प्रोथोम आलो और द डेली स्टार के कार्यालयों में तोड़फोड़ की और आग लगा दी। द डेली स्टार के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने अखबार और प्रोथोम आलो पर हादी की हत्या की भूमि तैयार करने का आरोप लगाया।
अखबार के कार्यालय पर हमले के दौरान, प्रदर्शनकारियों ने "दिल्ली या ढाका; ढाका, ढाका", "चापलूसी या आंदोलन; आंदोलन, आंदोलन", "हमने खून बहाया है; हम और बहाएंगे" के नारे लगाए और हादी के हत्यारों को सजा देने की मांग की। दोनों समाचार पत्रों ने भारत या हसीना का पक्ष लेने के आरोपों को खारिज कर दिया है। दरअसल, उन्होंने पिछले साल हसीना विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन किया था और इसे एक नई सुबह बताया था।
घटनाक्रम पर भारत की नजरें क्यों टिकीं?
बांग्लादेश में हिंसा 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनावों से कुछ ही महीने पहले घटी है। ऐसी आशंकाएं हैं कि इस अशांति का इस्तेमाल चुनावों को स्थगित करने के बहाने के रूप में किया जा सकता है। बांग्लादेश में बिगड़ती कानून-व्यवस्था का इस्तेमाल चुनावों को असुरक्षित बताने और इस तरह चुनावों में देरी करने के लिए किया जा सकता है। इससे कट्टरपंथी तत्वों को जमीनी स्तर पर समर्थन जुटाने का समय मिल जाएगा। बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) के महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने हालिया हिंसा को अगले साल होने वाले आम चुनावों से पहले देश को अस्थिर करने की साजिश बताया है।
चुनाव स्थगित होने को लेकर नई दिल्ली की चिंता नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार द्वारा हसीना की सरकार के पतन के बाद से चुनावों की घोषणा करने में लिए गए लंबे समय से उपजी है। बांग्लादेश ने हसीना की अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया है। अगर पूर्व प्रधानमंत्री की पार्टी को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जाती है, तो भारत और बाकी अंतरराष्ट्रीय समुदाय चुनावों की विश्वसनीयता पर कड़ी नजर रखेंगे।
संसदीय स्थायी समिति ने जताई क्या चिंता?
बांग्लादेश के मौजूदा हालात लगातार बिगड़ रहे हैं जो भारत के लिए चिंता की बड़ी बात है। हाल ही में कांग्रेस सांसद शशि थरूर के नेतृत्व वाली विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने भी भारत-बांग्लादेश के रिश्तों को लेकर चिंता जताई है। संसदीय स्थायी समिति ने बांग्लादेश में हो रहे राजनीतिक बदलाव को भारत के लिए 1971 के मुक्ति संग्राम के बाद की सबसे गंभीर रणनीतिक चुनौती बताई। शशि थरूर के नेतृत्व वाली समिति ने एक रिपोर्ट पेश की जिसमें राजनीतिक बदलावों, चीन-पाकिस्तान के बढ़ते प्रभाव और पीढ़ीगत दूरी को लेकर गहरी चिंता जाहिर की। समिति ने सरकारी अधिकारियों और गैर-सरकारी विशेषज्ञों के बयानों के आधार पर कहा कि बांग्लादेश का चल रहा राजनीतिक बदलाव भारत की सुरक्षा व विदेश नीति को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है। रिपोर्ट में एक विशेषज्ञ के हवाले से कहा गया, 1971 की चुनौती मानवीय संकट और एक नए राष्ट्र के जन्म से जुड़ी थी, लेकिन वर्तमान संकट इससे ज्यादा गंभीर है जिसमें राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव और भारत से दूर रणनीतिक पुनर्गठन शामिल है।
सवालों के घेरे में यूनुस का शासनकाल
यूनुस के शासनकाल में कानून व्यवस्था की स्थिति सवालों के घेरे में आ गई है। भारतीय राजनेताओं ने ईशनिंदा के आरोपों पर हाल ही में एक हिंदू युवक, दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या किए जाने की घटना की निंदा की है। अपनी सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए भारत अपने पड़ोस में अस्थिरता और बांग्लादेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में छात्र निकाय चुनावों में दक्षिणपंथी इस्लामी पार्टी, जमात-ए-इस्लामी के बढ़ते प्रभाव से नाखुश होगा। अगले साल बांग्लादेश में होने वाले चुनावों के चलते नई दिल्ली बांग्लादेश में चल रही अशांति पर पैनी नजर रखे हुए है। पश्चिम बंगाल में अगले साल अप्रैल-मई में चुनाव होने की संभावना है। ऐसे में बांग्लादेश का संकट यहां चुनाव पर भी असर डाल सकता है।
