शहरों में जलती हुई गाड़ियां, दुकानों में लूटपाट, सड़कों पर तोड़फोड़ और हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल... इतिहास, संस्कृति और विकास की झलक दिखाकर दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करने वाला यूरोप आज हिंसा की आग में जलता नजर आ रहा है। फ्रांस, इटली, स्विट्जरलैंड और जर्मनी जैसे देशों के युवा सड़कों पर हैं।
कहीं शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं, कहीं महंगाई और महंगे घरों को लेकर नाराजगी है, तो कहीं सरकारी नीतियों और सैन्य सेवा को लेकर विरोध हो रहा है। कई जगह शांतिपूर्ण प्रदर्शन हिंसक झड़पों में भी बदल गए हैं।
लेकिन सवाल है कि आखिर यूरोप के युवाओं को अपनी सरकारों से इतनी नाराजगी क्यों है? क्या यह सिर्फ महंगाई और बेरोजगारी का मुद्दा है या इसके पीछे पूरी पीढ़ी की भविष्य को लेकर चिंता छिपी है? आइए समझते हैं।
फ्रांस में हुई हिंसा तस्वीर। AP
जर्मनी में जेन जी सड़कों पर क्यों उतरी?
जर्मनी में 31 अक्टूबर को 'Gen Z regelt' यानी 'जेन जी संभाल लेती है' नाम के अभियान के तहत 34 शहरों में प्रदर्शन हुए। युवाओं की प्रमुख मांगें बेहतर शिक्षा व्यवस्था, जीवन-यापन का खर्च कम करना और सरकारी सेवाओं में निवेश बढ़ाना हैं। प्रदर्शनकारी अनिवार्य सैन्य सेवा की वापसी या विस्तार को लेकर भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि सरकार को युवाओं पर नई जिम्मेदारियां डालने के बजाय उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और भविष्य पर ध्यान देना चाहिए।
फ्रैंकफर्ट में प्रदर्शन के दौरान कुछ समूह हिंसक हो गए। दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं हुईं। पुलिस पर पत्थर और पेट्रोल बम फेंके जाने की भी खबर आई। हैम्बर्ग और कोलोन में भी पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। हालांकि, आयोजकों ने हिंसा से खुद को अलग बताया है।
जर्मनी के हैम्बर्ग में हुए विरोध प्रदर्शन की तस्वीर। AP
फ्रांस में प्रदर्शन की शुरुआत कैसे हुई?
फ्रांस में युवाओं का आंदोलन सितंबर 2026 में स्कूलों की खराब हालत और शिक्षकों की कमी के खिलाफ शुरू हुआ। छात्रों ने स्कूलों की जर्जर इमारतों, भीड़भाड़ वाली कक्षाओं और शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को लेकर आवाज उठाई। धीरे-धीरे इस आंदोलन में महंगाई, बेरोजगारी, महंगे घर, ईंधन की कीमतें और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार के खिलाफ नाराजगी जैसे मुद्दे भी जुड़ गए।
पेरिस में हिंसी के दौरान कई दुकानें लूट लिए गए। AP
17 अक्टूबर को फ्रांस में प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया। कई शहरों में दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट हुई। इसके बाद भी प्रदर्शन थमे नहीं। 31 अक्टूबर को लगातार तीसरे सप्ताह देशभर में रैलियां हुईं।
फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक, इस बार करीब 3.20 लाख लोग प्रदर्शन में शामिल हुए, जबकि 70 हजार पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। ज्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन कुछ जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं।
स्विट्जरलैंड में भी क्यों बिगड़े हालात?
स्विट्जरलैंड को आमतौर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों और स्थिर राजनीतिक व्यवस्था के लिए जाना जाता है, लेकिन 31 अक्टूबर की रात ज्यूरिख और बासेल में भी तनाव देखने को मिला। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ज्यूरिख में कई सौ लोग और बासेल में करीब 150 लोग बिना अनुमति प्रदर्शन करने के लिए जुटे। इन प्रदर्शनों को फ्रांस और यूरोप के दूसरे देशों में चल रहे युवा आंदोलनों से जोड़कर देखा गया।
ज्यूरिख में कुछ प्रदर्शनकारियों ने आगजनी और तोड़फोड़ की, जिसके बाद पुलिस ने वाटर कैनन का इस्तेमाल किया। बासेल में भी कचरे के कंटेनरों से बैरिकेड बनाए गए और उनमें आग लगा दी गई।
आखिर जेन जी की नाराजगी की असली वजह क्या है?
यूरोप में युवाओं के गुस्से के पीछे कोई एक वजह नहीं है। अलग-अलग देशों में मुद्दे अलग हैं, लेकिन कई समस्याएं एक जैसी हैं।
- महंगाई और खर्च: युवाओं के लिए रोजमर्रा का खर्च उठाना, किराया देना और घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है।
- रोजगार की चिंता: पढ़ाई पूरी करने के बाद भी अच्छी नौकरी और आर्थिक स्थिरता हासिल करना आसान नहीं है।
- शिक्षा व्यवस्था: स्कूलों में शिक्षकों की कमी, खराब इमारतें और शिक्षा पर कम निवेश युवाओं की नाराजगी बढ़ा रहे हैं।
- सरकारी नीतियां: युवाओं को लगता है कि सरकारें उनके भविष्य से जुड़े फैसलों में उनकी आवाज को पर्याप्त महत्व नहीं देतीं।
- पीढ़ियों के बीच अंतर: कई युवा मानते हैं कि सरकारी खर्च और नीतियों में बुजुर्ग आबादी की जरूरतों को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है, जबकि शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे पीछे छूट रहे हैं।
कई मुद्दों की वजह से सड़कों पर उतर आए यूरोप के जेन जी। AI IMAGE
क्या सोशल मीडिया भी आंदोलन को बढ़ा रहा है?
इन प्रदर्शनों को फैलाने में सोशल मीडिया की भूमिका भी अहम है। युवा ऑनलाइन अभियान, वीडियो और पोस्ट के जरिए अपनी मांगें साझा कर रहे हैं। एक देश में चल रहे प्रदर्शन की तस्वीरें और वीडियो दूसरे देशों के युवाओं तक पहुंच रहे हैं। हालांकि, यूरोप में जो हिंसा की आग लगी है, उसके पीछे सिर्फ Gen Z का गुस्सा नहीं है। इसके अलावा भी कई ऐसे कारण हैं, जिनकी चर्चा हो रही है।
इमिग्रेशन बना यूरोप के लिए सिरदर्द?
यूरोप में पिछले कई सालों से इमिग्रेशन एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। बड़ी संख्या में दूसरे देशों से लोग यूरोप पहुंचे हैं। इसके बाद कई देशों में सवाल उठने लगे कि नए लोगों को वहां की भाषा, कानून और संस्कृति के साथ कैसे जोड़ा जाए? इस मुद्दे पर समाज और राजनीति, दोनों में मतभेद हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इमिग्रेशन से देश की अर्थव्यवस्था और कार्यबल को फायदा मिलता है, जबकि आलोचकों का कहना है कि अगर नए लोगों का स्थानीय समाज में एकीकरण ठीक से नहीं हुआ, तो सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।
द कॉमन सेंस में प्रकाशित लेख में लेखक डगलस मरे लिखते हैं कि यूरोप में मौजूदा अशांति की एक बड़ी वजह प्रवासन और बाहरी लोगों को स्थानीय संस्कृति में शामिल करने को लेकर सरकारों की नीतियां हैं।
राष्ट्रीय पहचान का मुद्दा
यूरोप में एक बहस यह भी चल रही है कि आखिर किसी देश की अपनी संस्कृति, परंपराएं और पहचान कितनी अहम हैं? कुछ लोगों को लगता है कि सरकारें अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर पहले जैसी आत्मविश्वासी नहीं हैं। वहीं, दूसरी तरफ कई लोग बहुसांस्कृतिक समाज को यूरोप की ताकत मानते हैं। यानी लड़ाई सिर्फ प्रवासन की नहीं, बल्कि इस बात की भी है कि बदलते यूरोप की पहचान कैसी होनी चाहिए।
इस बात में कोई दोराय नहीं है कि यूरोप के कई देशों में आबादी और प्रवासन से जुड़ी चुनौतियां बढ़ रही हैं। ऐसे में सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन समस्याओं का संतुलित समाधान निकालने की है। हालांकि, हिंसा और तोड़फोड़ से इन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता।
