कौन हैं रजा पहलवी? ईरान में बगावत के बीच क्यों हो रही क्राउन प्रिंस की वापसी की मांग
इन हिंसक प्रदर्शनों के पीछे एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान की माली हालत काफी खराब हो गई है। ईरानी मुद्रा रियाल अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। महंगाई चरम पर है और लोगों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। महंगाई और बेरोजगारी से लोगों का धैर्य जवाब दे गया है और वे खामनेई की सत्ता के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं।
- Written by: आलोक कुमार राव
- Updated Jan 9, 2026, 02:03 PM IST
Whos is Reza Pahlavi: ईरान में लोगों का हिंसक प्रदर्शन शांत नहीं हो रहा है बल्कि यह बढ़ता जा रहा है। खस्ताहाल अर्थव्यवस्था से आक्रोशित लोग सुप्रीम नेता अयातुल्ला खामनेई की खिलाफत और निर्वासित क्राउन प्रिंस रजा पहलवी की वापसी मांग कर रहे हैं। पहलवी ने भी अपने समर्थकों से सड़कों पर उतरने की अपील की है। उनके इस अपील के बाद हिंसक विरोध प्रदर्शनों में और तेजी आई है। राजधानी तेहरान सहित अन्य शहरों में उग्र प्रदर्शन हो रहे हैं। हालांकि, गुरुवार को तेहरान और ईरान के दूसरे सबसे बड़े शहर मशाब में शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए। इस दौरान सुरक्षाकर्मियों ने उग्र भीड़ के प्रदर्शन को नहीं रोका। हिंसक प्रदर्शनों में अब तक कम से कम 38 लोग मारे गए हैं, जबकि 2,200 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है। गुरुवार को हुए प्रदर्शन के बाद देश भर में इंटरनेट एवं फोन सेवाओं को निलंबित कर दिया गया है।
खस्ताहाल अर्थव्यवस्था, महंगाई से फूटा लोगों का गुस्सा
इन हिंसक प्रदर्शनों के पीछे एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान की माली हालत काफी खराब हो गई है। ईरानी मुद्रा रियाल अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। महंगाई चरम पर है और लोगों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। महंगाई और बेरोजगारी से लोगों का धैर्य जवाब दे गया है और वे खामनेई की सत्ता के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में पहली बार देशव्यापी स्तर पर उग्र प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रदर्शनों में शामिल कुछ लोग निर्वासन झेल रहे क्राउन प्रिंस रजा की वापसी की मांग कर रहे हैं। खास बात यह है कि लोगों के इस प्रदर्शन व्यापारी सहित अन्य वर्गों का समर्थन मिल रहा है।
कौन हैं रजा पहलवी
रजा पहलवी ईरान के शासक शाह के बेटे हैं। किंग शाह को अमेरिका और पश्चिमी देशों का समर्थक माना जाता था। शाह के समय ईरान के अमेरिका के साथ अच्छे रिश्ते थे। शाह के शासन के समय अमेरिका और इजरायल ने ईरान की काफी मदद की लेकिन 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति ने सब कुछ बदल दिया। इस क्रांति से पहले शाह को ईरान छोड़कर भागना पड़ा। शाह के जाने के बाद ईरान की सत्ता में चरमपंथी मौलवी हावी हो गए। पहलवी ईरान की पूर्व राजशाही के उत्तराधिकारी माने जाते हैं। उनका जन्म 31 अक्टूबर 1960 को तेहरान में हुआ था। 1967 में, केवल सात वर्ष की उम्र में, उन्हें आधिकारिक रूप से ईरान का क्राउन प्रिंस घोषित किया गया।
अमेरिका में रहते हैं रजा
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद जब शाह का शासन समाप्त हुआ, तब पहलवी को अपने परिवार के साथ ईरान छोड़ना पड़ा। इसके बाद से वे निर्वासन में रह रहे हैं और मुख्य रूप से अमेरिका में निवास करते हैं। उन्होंने अमेरिका में अपनी शिक्षा पूरी की और राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रूप से बोलते रहे हैं। रजा पहलवी प्रवासी ईरानियों के बीच एक प्रमुख राजनीतिक आवाज माने जाते हैं, लेकिन ईरान के भीतर उनकी भूमिका और प्रभाव को लेकर मतभेद भी मौजूद हैं।
दुकानें बंद कर लोगों का समर्थन कर रहे व्यापारी। तस्वीर-AP
क्राउन प्रिंस की ईरान की जनता से अपील
ईरान के लोगों को अपने संदेश में पहलवी ने कहा, 'महान राष्ट्र ईरान, दुनिया भर की आंखें इस समय आप लोगों पर हैं। आप सड़कों पर निकलें और एकजुट होकर अपनी आवाज उठाएं।' रजा ने ईरानी सरकार के लिए भी चेतावनी जारी की। उन्होंने कहा, 'मैं इस्लामी रिपब्लिक, इसके नेताओं और रिवोल्यूशनरी गार्ड को हिदायत देता हूं कि दुनिया और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करीबी से आप लोगों पर नजर रख रहे हैं। लोगों का दमन हुआ तो इसका जवाब मिलेगा।' रजा ने कहा है कि उनकी अपील पर जनता की प्रतिक्रिया देखने के बाद वह अपने अगले कदम की घोषणा करेंगे।
क्या थी 1979 की इस्लामिक क्रांति
ईरान पर शाह मोहम्मद का शासन था। अमेरिका और पश्चिमी देशों के समर्थक शाह ईरान में तेजी से सुधारों को लागू कर रहे थे। हालांकि इन सुधारों का लाभ समाज के एक छोटे वर्ग तक ही सीमित रहा। बढ़ती आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक दमन ने जनता में असंतोष पैदा कर दिया। धार्मिक नेतृत्व भी शाह की नीतियों से नाराज था। उन्हें लगता था कि पश्चिमी संस्कृति और प्रभाव से ईरान की इस्लामी पहचान कमजोर हो रही है। इस असंतोष के बीच आयतुल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी एक प्रभावशाली नेता के रूप में उभरे और उन्होंने शाह के खिलाफ आक्रोश एवं गुस्से को एक मंच प्रदान किया। खुमैनी ने जनता को संगठित करते हुए इस्लामिक क्रांति का आगाज किया। 1978 से देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन, हड़तालें और जुलूस शुरू हो गए। हालात इतने बिगड़ गए कि जनवरी 1979 में शाह को देश छोड़कर जाना पड़ा। 1 फरवरी 1979 को आयतुल्लाह खुमैनी ईरान लौटे और कुछ ही हफ्तों में राजशाही का पूरी तरह अंत हो गया। अप्रैल 1979 में हुए जनमत संग्रह में ईरान को आधिकारिक रूप से इस्लामिक गणराज्य घोषित किया गया।
फिर शत्रु देश बन गए अमेरिका-इजरायल
1979 की इस्लामिक क्रांति ईरान ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के राजनीतिक इतिहास की एक निर्णायक घटना थी। इस घटना ने ईरान को तो पूरी तरह से बदल दिया। ईरान की सत्ता की असली चाबी सुप्रीम नेता के हाथों में आ गई। ईरान में लोकतांत्रिक आवाजों के लिए जगह नहीं रही। देश की नीतियां, नियुक्तियां और नेतृत्व सभी सुप्रीम नेता ही तय करने लगे। इसके बाद ईरान हर मोर्चे पर अमेरिका, इजरायल और पश्चिमी देशों का विरोध करने और इन्हें अपना शत्रु बताने लगा।
प्रदर्शनकारियों के समर्थन में ईरान में दुकानें बंद हैं। तस्वीर-AP
खासकर, अमेरिका और इजरायल को ईरान अपने सबसे बड़े शत्रु के रूप में देखता है। इजरायल पर 7 अक्टूबर 2023 को हमास का जो हमला हुआ, माना जाता है कि उस साजिश के पीछे भी ईरान का हाथ था। लेबनान में हिज्बुल्ला के खिलाफ कार्रवाई के खिलाफ ईरान ने जब मिसाइलों से इजरायल को निशाना बनाया तो यहूदी देश ने इसका पलटवार किया। जून 2025 में इजरायल ने ईरान के खिलाफ 'ऑपरेशन राइजिंग लॉयन' शुरू किया। इस ऑपरेशन के तहत ईरान के परमाणु एवं ऊर्जा संयंत्रों को निशाना बनाया गया। इसी दौरान अमेरिका ने भी 'ऑपरेशन हैमर मिडनाइट' लॉन्च कर ईरान के तीन सबसे बड़े परमाणु संयंत्रों फोर्दो, नतांज और इस्फहान पर बम गिराए।
